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Saturday, 11 December 2021

10 Dec मानव अधिकार दिवस .

 इंसानी अधिकारों को पहचान देने और वजूद को अस्तित्व में लाने के लिए, अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्‍ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानी यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे मनाया जाता है. पूरी दुनिया में मानवता के खिलाफ हो रहे जुल्मों-सितम को रोकने, उसके खिलाफ संघर्ष को नई परवाज देने में इस दिवस की महत्वूपूर्ण भूमिका है.
जिसके उद्देश्य नौकरशाही पर रोक लगाना, मानव अधिकारों के हनन को रोकना तथा लोक सेवक द्वारा उनका शोषण करने में अंकुश लगाना। मानवाधिकार की सुरक्षा के बिना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी खोखली है मानवाधिकार की लड़ाई हम सभी की लड़ाई है। विश्वभर में नस्ल, धर्म, जाति के नाम मानव द्वारा मानव का शोषण हो रहा है। अत्याचार एवम जुल्म के पहाड़ तोड़े जा रहे हैं। हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् धर्म एवम जाति के नाम पर भारतवासियों को विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है। आदमी गौर हो या काला, हिन्दू हो या मुस्लमान, सिख हो या ईसाई, हिंदी बोले या कोई अन्य भाषा सभी केवल इंसान हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित मानवाधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार है। मानव अधिकार का मतलब ऐसे हक़ जो हमारे जीवन और मान-सम्मान से जुड़े हैं। ये हक़ हमें जन्म से मिलते हैं, हम सब आज़ाद हैं। साफ़ सुथरे माहौल मैं रहना हमारा हक़ है । हमें इलाज़ की अच्छी सहूलियत मिले। हमें और हमारे बच्चों को पढाई-लिखाई की अच्छी सहूलियत मिले। पीने का पानी साफ मिले। जाति, धर्म, भाषा-बोली के कारण हमारे साथ भेदभाव न हो। हमें हक़ है की हम सम्मान के साथ रहें। कोई हमें अपना दस या गुलाम नहीं बना सके। प्रदेश में हम कहीं भी बेरोकटोक आना-जाना कर सकते हैं। हम बेरोकटोक बोल सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने से किसी के मान-सम्मान को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। हमें आराम करने का अधिकार है। हमें यह तय करने का अधिकार है की हमारे बच्चे को किस तरह की शिक्षा मिले। हर बच्चे को जीने का अधिकार है, उसे अच्छी तरह की शिक्षा मिले। यदि हमें हमारा हक़ दिलाने मैं सरकारी महकमा हमारी मदद नहीं कर रहा है तो हम मानव अधिकार आयोग में शिकायत कर सकते हैं। आयोग में सीधे अर्जी देकर शिकायत कर सकते हैं।इसके लिए वकील की जरूरत नहीं है। शिकायत किसी भी भाषा या बोली में कर सकते हैं हिंदी में हो तो अच्छा है। शिकायत लिखने के लिए कैसे भी कागज़ का इस्तेमाल करें, स्टैम्प पेपर की कोई जरूरत नहीं होती। आयोग के दफ्तर में टेलीफोन नम्बर पर भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
आपको यह जानकर खुशी होगी कि मानव अधिकार की टीम लगातार समाज से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य कर रही है जिनमें से प्रमुख हैं-
1.    सभी गरीब बच्चों, महिला, बुजुर्ग व विक्लांग व्यक्तियों के लिऐ समान शिक्षा, मुफ्त  स्वास्थ्य जांच कैम्प लगाना और दवाईयां तथा उपकरण उपलब्ध कराना।
2.    सामाजिक बुराई के खिलाफ पहल करना और बुलंद आवाज उठाना तथा पीड़ितों  को बुराई से निज़ात दिलाना।
3.    बाल व बन्धुआ मजदूरी के अत्याचार से मुक्ति दिलाना।
4.    बच्चों, महिलाओं तथा बुजुर्गो की रक्षा के लिये काम करना।
5.    समाज के लिये योगदान करने वाली हस्तियों को समय-समय पर पुरूस्कृत करके  उनका सम्मान करना।
6.    समाज व हर वर्ग के लोगो के साथ मिलकर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करना।
7.    जनता तथा पुलिस के बीच में सहयोग का पुल बनाना तथा पीड़ितों को न्याय दिलाना।
8.    नए शिक्षा संस्थान, अस्पताल व अनाथ आश्रम खोलना और अन्य आश्रमों की देख-रेख करना।
9.    भ्रूण हत्या पर हर सम्भव रोक लगाना व उनके खिलाफ आवाज उठाना।
10.  हर वर्ग के कमज़ोर व्यक्ति को समाज में न्याय दिलाना।

हमारी समाज के हर व्यक्ति से अपील व प्रार्थना है कि-

आइये, हमारे साथ जुड़िये और समाज सेवा का हिस्सा बनिये। हम और हमारी टीम हर वक्त, हर समय आपकी सेवा में तत्पर है और हम सबके सहयोग के साथ काम करेगें। हमारा हर सम्भव प्रयास रहेगा कि हर वर्ग का व्यक्ति भय एवं भूख से मुक्त होकर सुख शांती और सम्मान से जी सके। यही मानव अधिकार है।
www.nhrsjc.org

National Human right's social justice commission 
National secretary  (minority cell)
Alamgeer A.R.RAHMANI.





Thursday, 9 December 2021

ગ્રામ પંચાયતોની સામાન્ય ચૂંટણી-૨૦૨૧ ચૂંટણીમાં ૬૨ ગ્રામ પંચાયત. સંપૂર્ણ બિનહરિફ (સમરસ)

 ગ્રામ પંચાયતોની સામાન્ય ચૂંટણી-૨૦૨૧  ભરૂચ જિલ્લાની ૪૮૩ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૬૨ ગ્રામ પંચાયત. સંપૂર્ણ બિનહરિફ (સમરસ)

ભરૂચ તાલુકામાં સૌથી વધુ ૧૨ ગ્રામ પંચાયત સમરસ 
આગામી તા.૧૯મી ડીસેમ્બરે ભરૂચ જિલ્લાના નવ તાલુકાઓમાં કુલ ૪૮૩ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણી યોજાનાર છે. જિલ્લામાં ૬૨ ગ્રામ પંચાયત સંપૂર્ણ બિનહરિફ (સમરસ) થયેલ ગ્રામ પંચાયતોની વિગત નીચે મુજબ છે. 
    ભરૂચ જિલ્લાના ઝઘડીઆ તાલુકામાં ૭૪ ગ્રામ પંચાયતોની ચૂંટણીમાં ૭ ગામ સમરસ થયેલ છે જેમાં વંઠેવાડ, મોટાવાસણા, નાનાવાસણા, ઉચ્છબ, ધારોલી, ઓર-પટાર ગૃપ, જેશપોર ગૃપ ગામોનો સમાવેશ થાય છે. 
અંકલેશ્વર તાલુકામાં ૪૩ ગ્રામ પંચાયતોની ચૂંટણીમાં ૮ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં અમૃતપરા, ખરોડ, હરીપુરા, પારડીઇદ્રીસ, મોતવાણ, ભાદી, છાપરા, કરમાલી ગામોનો સમાવેશ થાય છે.
હાંસોટ તાલુકાની ૩૬ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૯ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં ધમરાડ, અલવા, જેતપોર, વઘવાણ, વાલનેર, દંત્રાઇ, આંકલવા, કુદાડરા, ડુંગરા ગામોનો સમાવેશ થાય છે. 
વાગરા તાલુકાની ૬૦ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૧૧ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં ગંધાર, બદલપુરા, નાંદરખા, સુતરેલ, પખાજણ, મોસમ, વોરાસમની, અંભેલ, વિછીયાદ, સાચણ, સારણ ગામોનો સમાવેશ થાય છે.

    ભરૂચ તાલુકાની ૭૭ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૧૨ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં ભુવા, વડવા, મહેગામ, એકસાલ, અમલેશ્વર, કેસરોલ, નવેઠા, શેરપુરા, થામ, દહેગામ, મહુધલા, દેરોલ ગામોનો સમાવેશ થાય છે. 
    આમોદ તાલુકાની ૪૪ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૭ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં ફુરચણ, ઓચ્છણ, કરેણા, અડવાલા, સીમરથા, કોલવણા, ઈખર ગામોનો સમાવેશ થાય છે. 
જંબુસર તાલુકાની ૬૯ ગ્રામ પંચાયતની ચૂંટણીમાં ૮ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે જેમાં આસનવડ, વડદલા, સામોજ, આસરસા, કપુરીયા, રૂનાડ, નહાર અને થનાવા ગામનો સમાવેશ થાય છે.
ભરૂચ જિલ્લાના વાલીયા તાલુકામાં ૪૫ ગ્રામ પંચાયત અને નેત્રંગ તાલુકામાં ૩૫ ગ્રામ પંચાયતમાં એક પણ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ નથી. જિલ્લામાં કુલ ૬૨ ગ્રામ પંચાયત સમરસ થયેલ છે એમ જિલ્લા ચૂંટણીતંત્ર ધ્વારા જણાવાયું છે.

Friday, 3 December 2021

जानें पहाड़ तोड़ने वाले शख्‍स दशरथ मांझी के बारे में.




दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज्‍़बे और जुनून की मिसाल है. वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया. जानें मांझी के बारे में:


दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज्‍़बे और जुनून की मिसाल है. वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया.



जिसने रास्ता रोका, उसे ही काट दिया:
बिहार में गया के करीब गहलौर गांव में दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी का ज़िक्र किए बिना अधूरा है. गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक्‍़त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं. यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम. 



22 साल की मेहनत:
पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया. लेकिन यह आसान नहीं था. शुरुआत में उन्हें पागल तक कहा गया. दशरथ मांझी ने बताया था, 'गांववालों ने शुरू में कहा कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन उनके तानों ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया'.



अकेला शख़्स पहाड़ भी फोड़ सकता है!
साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था. पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना. और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया.



दुनिया से चले गए लेकिन यादों से नहीं!
दशरथ मांझी के गहलौर पहाड़ का सीना चीरने से गया के अतरी और वज़ीरगंज ब्लॉक का फासला 80 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह गया. केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी.





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Thursday, 2 December 2021

आचार संहिता क्या होता है?



चुनाव के समय आचार संहिता (Code of Conduct) लागू की जाती है जिसे चुनाव आचार संहिता भी कहते है, अधिकतर लोगों को आचार संहिता के विषय में जानकारी नहीं होती है, जिससे वह इसका उलंघन करते है | भारत (India) में जब भी चुनाव का आयोजन होता है, वहां पर आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) को लगाया जाता है | चुनाव की तारीखों के साथ ही इसकी घोषणा कर दी जाती है | यह नतीजे आने तक जारी रहती है | इस समय राजनीतिक दलों और राजनेताओं को कुछ विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है | इन व्यापक धारा के लगने से दंगे व झगड़े जोकि चुनावी माहौल में बहुत ही आम बात है, नियंत्रण में कर लिया जाता है | इलेक्शन कमिशन ऑफ़ इंडिया (ECI) मॉडल कॉड ऑफ़ कंडक्ट के नियमो को बड़ी सख्ती से पालन कराता है और किसी भी प्रकार की अनियमितता देखने पर तुरंत कार्यवाही करने का आदेश उस क्षेत्र के अधिकारी को देता है | यह सुनिश्चित भी करता है कि चुनाव सही प्रकार से सम्पन्न हो |

आचार संहिता क्या होता है (What is a code of conduct)?

आचार संहिता को भारतीय चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है | आचार संहिता चुनाव समिति द्वारा बनाया गया वो दिशानिर्देश होता है, जिसे सभी राजनीतिक पार्टियों को मानना अनिवार्य है | आचार संहिता का अर्थ (Meaning of aachar sanhita in hindi) उन नियमो से है जो उस समय अस्तित्व में आते है और उनके द्वारा ही पार्टियों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखी जाती है |


आचार संहिता के नियम कानून व प्रावधान (Code of Conduct Rules)

  • आचार संहिता लागू होने के बाद सार्वजनिक धन के प्रयोग पर रोक लगा दी जाती है, जिससे किसी राजनीतिक दल या राजनेता को चुनावी लाभ न प्राप्त हो सके |
  • चुनाव प्रचार के लिए सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले का प्रयोग नहीं किया जा सकता है |
  • मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए किसी भी तरह की सरकारी घोषणाओं, लोकार्पण, शिलान्यास पर रोक लगा दी जाती है |
  • पुलिस की अनुमति के बिना कोई भी राजनीतिक रैली नहीं की जा सकती है |
  • धर्म के नाम पर वोट की मांग नहीं की जा सकती है |
  • इस दौरान सरकारी खर्च से किसी भी प्रकार का ऐसा आयोजन नहीं किया जाता है जिससे किसी भी दल विशेष को लाभ प्राप्त हो सके | राजनीतिक दलों के आचरण और क्रियाकलापों पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक (Observer) नियुक्त करता है |

आचार संहिता कब लगती है | Duration of Code of Conduct

चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग के द्वारा की जाती है, इसके साथ ही आचार संहिता लागू कर दी जाती और यह चुनाव के परिणाम के साथ ही समाप्त हो जाती है | चुनाव के शुरू होने से पहले यह ECI द्वारा चुनावी क्षेत्र में लगा दी जाती है|


आचार संहिता से क्या होता है?

आचार संहिता का उद्देश्य पार्टियों के बीच मतभेद टालने, शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष चुनाव कराना होता है | इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टीकेंद्रीय या राज्य की अपने आधिकारिक पदों का चुनावों में लाभ लेने हेतु गलत प्रयोग न कर सके | इस प्रकार मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट का माध्यम से चुनाव का समापन उचित प्रकार से करा लिया जाता है |

यहाँ पर आपको आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) क्या होता है, ये कब लगती है, Rules, अवधि के विषय में जानकारी दी गयी है | इस प्रकार की अन्य जानकारी के लिए आप http://hindiraj.com पर विजिट कर सकते है | अगर आप दी गयी जानकारी के विषय में अपने विचार या सुझाव अथवा प्रश्न पूछना चाहते है, तो कमेंट बॉक्स के माध्यम से संपर्क कर सकते है |












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Tuesday, 30 November 2021

पहले आम चुनाव की कहानी... इस तरह हुई थी खुदमुख्तारी के सफर शुरुआत


15 अगस्त 1947 को जब भारत बरतानवी हुकूमत की दासता से आजाद हुआ था तब किसने कल्पना की होगी कि संसदीय लोकतंत्र अपनाकर हम दुनिया की सबसे बड़ी चुनाव प्रक्रिया वाला देश बन जाएंगे। 16वीं लोकसभा के चुनाव के लिए करीब 81 करोड़ मतदाताओं का निबंधन समूची दुनिया को सुखद आश्चर्य मे डालने वाला है। लगभग हर आम चुनाव के समय हम सबसे बड़े मतदाता समूह और चुनावी ढांचा वाले देश के रूप में चिन्हित किए जाते हैं।
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आज हम अपनी चुनाव प्रणाली और लोकतंत्र की चाहे जितनी खामियां निकालें, लेकिन जब अतीत में लौटकर विचार करते हैं तो इसे अविश्वसनीय उपलब्धि के रूप में पाते हैं। हम अपनी सरकार खुद चुन सकते हैं, यह भाव तब रोमांच पैदा करने वाला रहा होगा। वास्तव में आजादी के बाद हमारा पहला आम चुनाव इसी रोमांचकता के सामूहिक मनोविज्ञान मे संपन्न हुआ था। उस समय के समाचारों, नेताओं के भाषणों आदि को देखें तो इस मनोविज्ञान का अहसास हो जाएगा।

नवस्वतंत्र देश का लोकतंत्रीकरण यानी पूरा उत्सव का माहौल! खुदमुख्तारी के भाव से सराबोर समूचा भारतीय समाज मानो अंग्रेजों को झुठलाने तथा दुनिया को लोकतंत्र के लिए अपनी काबिलियत साबित कर रहा हो। वह समाज जिसे अंग्रेजों ने ऐसा समाज कहा था जो लोकतंत्र को न पचा पाएगा, न इसे संभालकर आगे बढ़ा पाएगा। लोकसभा की 497 तथा राज्य विधानसभाओं की 3283 सीटों के लिए भारत के 17 करोड़ 32 लाख 12 हजार 343 मतदाताओं का निबंधन हुआ। इनमें से 10 करोड़ 59 लाख लोगों ने, जिनमें करीब 85 फीसद निरक्षर थे, अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करके पूरे विश्व को आश्चर्य में डाल दिया।

25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक यानी करीब चार महीने चली उस चुनाव प्रक्रिया ने भारत को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया। यह अंग्रेजों द्वारा लूटा-पीटा, अनपढ़ बनाया गया कंगाल देश जरूर था, लेकिन इसके बावजूद इसने स्वयं को विश्व के घोषित लोकतांत्रिक देशों की कतार में खड़ा कर दिया।


25 अक्टूबर, 1951 को जैसे ही पहला वोट हिमाचल प्रदेश की चिनी तहसील में पड़ा, नए युग की शुरुआत हो गई। आजादी के संघर्ष के कारण देश के आम जनमानस में तो कांग्रेस का ही नाम बैठा था। इसलिए कांग्रेस ने 364 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश और डॉ. लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी को 12, आचार्य कृपलानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी को नौ, हिंदू महासभा को चार, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ को तीन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को तीन और शिड्‌यूल कास्ट फेडरेशन को दो सीटें मिलीं।

कांग्रेस ने कुल 4,76,65,951 यानी 44.99 वोट हासिल किए। उस वक्त एक निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक सीटें भी हुआ करती थीं, लिहाजा 489 स्थानों के लिए 401 निर्वाचन क्षेत्रों में ही चुनाव हुआ। 1960 से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। एक सीटों वाले 314 निर्वाचन क्षेत्र थे। 86 निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटें और एक क्षेत्र में तीन सीटें थीं। दो सदस्य आंग्ल-भारतीय समुदाय से नामांकित हुए।

जवाहरलाल नेहरू ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत 40 हजार किमी की यात्रा की एवं करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों को संबोधित किया। यह तब असाधारण एवं अभूतपूर्व कार्य था। हालांकि विपक्षी पार्टियों के लिए काम करने के अवसर थे, उनके पास तेजस्वी नेता भी थे, लेकिन उनके पास संगठन, संसाधन और कार्यकर्ता ऐसे नही थे कि इतना व्यापक अभियान चला सके। उस समय मीडिया का भी इतना विस्तार नहीं था कि उसके माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकें।

तब भी अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों मे कांग्रेस से इतर पार्टियां आजाद भारत के पुनर्निर्माण, जीवन यापन, आम नागरिकों के अधिकार, राजनीतिक पार्टियों के ढांचे, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति आदि मुद्दों को लेकर जनता के बीच गईं। इसी का परिणाम था कि करीब 31 फीसद वोट इन पार्टियों को मिले।


आज इस बात की कल्पना करना कठिन है कि लोकसभा और विधानसभाओं के लिए पहला आम चुनाव सम्पन्न कराना कितना बड़ा कार्य था। घर-घर जाकर मतदाताओं का निबंधन करना ही अपने आपमें इतिहास बनाना था। बहुमत मतदाता की निरक्षरता का ध्यान रखते हुए ही पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए चुनाव चिन्ह की व्यवस्था की गई। किंतु आज की तरह मतदान पत्र पर नाम और चिन्ह नहीं थे, हर पार्टी के लिए अलग-मतपेटी थी, जिन पर उनके चुनाव चिन्ह अंकित कर दिए गए थे। इसके लिए लोहे की दो करोड़ बारह लाख मतपेटियां बनाई गई थीं और करीब 62 करोड़ मतपत्र छापे गए थे।

इन मतपेटियों और मतपत्रों को संबंधित मतदान केन्द्रों तक पहुंचाना भी उस समय एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। पहाड़ों, जंगलों, मैदानी इलाकों में नदी-नालों को पार करते हुए, पगडंडियों से गुजरते हुए नियत स्थान तक पहुंचने के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। इस सबके दौरान कई लोग बीमार पड़ गए, कुछ की मृत्यु भी हो गई, कुछ लूट के शिकार हुए।

कहा जाता है कि पूर्वोत्तर में म्यांमार की सीमा से लगे मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में तो स्थानीय लोगों को यह कहकर तैयार किया गया कि आप इसे पहुंचाने मे मदद करें, बदले में आपको एक-एक कंबल तथा बंदूक का लाइसेंस दिया जाएगा। इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके अपनाए गए।

उस समय सुकुमार सेन मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे। मतदाता निबंधन से लेकर, दलों के चुनाव चिन्ह का निर्धारण एवं साफ सुथरा चुनाव कराने के लिए योग्य अधिकारियों के चयन का काम उन्होंने बखूबी किया। वे सरकारी खजाने के पैसे की कितनी चिंता करते थे इसका उदाहरण था मतपेटियों को सुरक्षित रखना। उन्होंने जितना संभव हुआ मतपेटियों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की और 1957 के दूसरे आम चुनाव में इस कारण करीब साढ़े चार करोड़ रुपए खजाने के बचाए।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि जिस चुनावी ढांचे के जरिए संसदीय लोकतंत्र का जो लंबा सफर हमने अभी तक तय किया है उसके लिए स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही नहीं बल्कि स्वाधीनता के बाद भी लाखों लोगों इसमें अपना योगदान दिया।
चुनाव मैदान में राजनीतिक पार्टियां : पहले आम चुनाव के समय कांग्रेस की सर्वोच्चता अवश्य थी, उसकी स्वीकार्यता भी व्यापक थी, लेकिन विपक्ष भी वजूद में आ चुका था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तो पहले से थी ही, जयप्रकाश नारायण डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्टों का धड़ा भी कांग्रेस से बाहर आकर सोशलिस्ट पार्टी बना चुका था।

इसके अलावा जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल के ही दो पूर्व सहयोगियो ने भी कांग्रेस के खिलाफ दो पार्टियों की शुरुआत कर दी थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी तो डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शेड्‌युल्ड कास्ट फेडरेशन को पुनर्जीवित कर दिया था, जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी के नाम से जाना गया। वरिष्ठ स्वाधीनता सेनानी आचार्य जीवतराम भगवानदास (जेबी) कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा परिषद का गठन कर लिया था। भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी, बोल्शेविक पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक के दो समूह, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, हिंदू महासभा, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद आदि। चुनाव मे कुल 53 पार्टियों ने भाग लिया जिनमें 14 राष्ट्रीय स्तर की और बाकी राज्य स्तर की पार्टियां थीं।

कौन-कौन नेता थे उस परिदृश्य में : पहले आम चुनाव में जवाहरलाल नेहरू का कद जरूर बड़ा था, उनके मर्मस्पर्शी मोहक नेतृत्व के चलते उनकी लोकप्रियता भी खूब थी लेकिन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो रहे जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया की भी विपक्षी नेताओं के रूप में प्रतिष्ठा थी।

आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भी अपना स्थान था। अपने-अपने क्षेत्रों में पूर्व राजाओं, जमीदारों, स्थानीय नेताओं आदि का भी सम्मान कायम था। इस कारण 38 स्थानों से 47 निर्दलीय जीते तो 10 स्थानों परनिर्विरोध निर्वाचन भी हुआ। उस समय निर्वाचित होने वालो में काका साहब कालेलकर भी थे, जो पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बने।

लालबहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नंदा, मोरारजी भाई देसाई, जीवी मावलंकर, हुमायूं कबीर, ए. के. गोपालन रफी अहमद किदवई, केशवदेव मालवीय, सुभद्रा जोशी, चौधरी ब्रह्मप्रकाश आदि नेताओं को पहले आम चुनाव ने ही संसद सदस्य बनाया। बाद में इनमें से पहले तीन नेता देश के प्रधानमंत्री बने। मावलंकर पहले लोकसभा के अध्यक्ष बने। इस चुनाव में डॉ. आंबेडकर बॉम्बे सुरक्षित सीट से कांग्रेस के नारायण साबोदा से पराजित हो गए।






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Thursday, 21 October 2021

भारत के सांसद मे 43% दागी नेता जाने पुरी रिपोर्ट .

एडीआर रिपोर्ट : इस बार संसद में 43 फीसदी सांसद दागी और  88 फीसदी करोड़पति

17वीं लोकसभा के लिए चुनकर संसद पहुंचने वाले 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसद दागी छवि के हैं। 2009, 2014 व 2019 के आमचुनाव में जीते आपराधिक मामलों में शामिल सांसदों की संख्या में 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। चुनाव विश्लेषण संस्था एडीआर ने शनिवार को लोकसभा चुनाव परिणाम संबंधी अध्ययन रिपोर्ट जारी की। 




रिपोर्ट की मुख्य बातें : यंहा क्लिक करे.


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Thursday, 14 October 2021

राजनाथ सिंह ने कहा कि सावरकर ने माफीनामा गांधी जी के कहने पर लिखा था


Date:14 Oct 2021 SAFTEAMGUJ.

आखिर आरएसएस और बीजेपी की ऐसी क्या मजबूरी है जो वे हमेशा वीर सावरकर का बचाव करते हैं? इस सच को जानना बहुत जरूरी है। राजनाथ सिंह ने कहा कि सावरकर ने माफीनामा गांधी जी के कहने पर लिखा था और भागवत ने कहा कि सावरकर को बदनाम किया जा रहा है

राजनाथ सिंह ने सावरकर के माफीनामा को लेकर जो बात कही है, वह पूर्ण सत्य नहीं है। 1919 में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों ने कैदियों की रिहाई की थी। सावरकर बंधु इससे पहले भी अपनी माफी की अर्जी भेज चुके थे। महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने भी उनकी अर्जी पर सुनवाई करने की सिफारिश की

गांधीजी ने अंग्रेज सरकार से कहा कि आप सावरकर को छोड़ दें। सावरकर लिख के यह दे ही रहे हैं कि वह अंग्रेज सरकार के वफादार बने रहेंगे, आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लेंगे और किसी भी ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे जो अंग्रेजों के खिलाफ होगी

गांधी जी ने यह भी लिखा कि सावरकर हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे। अगर अंग्रेजों को उनकी बात पर यकीन नहीं है तो उन्हें काला पानी से रिहा कर कर भारत में ही नजर बंद कर दिया जाए। अंग्रेजों ने यही किया

लेकिन अब जरा सच्चाई का दूसरा पहलू देखिए कि महात्मा गांधी ने कभी अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी। नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद इन्होंने अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी। सिर्फ सावरकर ने मांगी

सावरकर को नजरबंदी से तब आजाद किया जब 1937 में वह हिंदू राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्र का मामला गर्म करना चाहते थे। इसी समय उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को इंग्लैंड से वापस बुलाया। सावरकर ने हिंदू राष्ट्र और जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र की मांग कर अखंड भारत के सपनों को चूर कर दिया

1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ा तब सावरकर के सामने अपनी देशभक्ति दिखाने का पूरा मौका था, लेकिन उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया बल्कि इसका विरोध किया। यह भारत की आजादी की जगह अंग्रेजों की तरफदारी कर रहे थे

महात्मा गांधी की हत्या सावरकर के शिष्य नाथूराम गोडसे ने की। गांधीजी के मुकदमे की फाइल पढ़ लीजिए पता चलेगा की गोडसे को विजयी भव का आशीर्वाद सावरकर ने दिया था। सावरकर की रिहाई के लिए चंदा जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी जुटा रहे थे

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी से स्पष्ट शब्दों में कहा था कि उन्हें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आर एस एस और हिंदू महासभा ने जिस तरह की परिस्थितियां देश में उत्पन्न होती हैं उसके कारण ही महात्मा गांधी की हत्या हुई है

अगर कोई यह याद दिलाए कि सावरकर देशभक्ति के कारनामों के लिए ही जेल गए थे तो मैं उससे सहमत होऊंगा। लेकिन जेल से छूटने के बाद उन्होंने हर काम वही किया जो अंग्रेजों के फायदे में गया। जो पहले देश के साथ हो और बाद में दुश्मन के साथ मिल जाए, उसे देशभक्त नहीं गद्दार कहते हैं

Via : piyush babele @BabelePiyush




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