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Saturday, 11 December 2021
10 Dec मानव अधिकार दिवस .
Thursday, 9 December 2021
ગ્રામ પંચાયતોની સામાન્ય ચૂંટણી-૨૦૨૧ ચૂંટણીમાં ૬૨ ગ્રામ પંચાયત. સંપૂર્ણ બિનહરિફ (સમરસ)
Friday, 3 December 2021
जानें पहाड़ तोड़ने वाले शख्स दशरथ मांझी के बारे में.
दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज़्बे और जुनून की मिसाल है. वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया. जानें मांझी के बारे में:
दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज़्बे और जुनून की मिसाल है. वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया.
जिसने रास्ता रोका, उसे ही काट दिया:
बिहार में गया के करीब गहलौर गांव में दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी का ज़िक्र किए बिना अधूरा है. गहलौर और अस्पताल के बीच खड़े जिद्दी पहाड़ की वजह से साल 1959 में उनकी बीवी फाल्गुनी देवी को वक़्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो चल बसीं. यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम.
22 साल की मेहनत:
पत्नी के चले जाने के गम से टूटे दशरथ मांझी ने अपनी सारी ताकत बटोरी और पहाड़ के सीने पर वार करने का फैसला किया. लेकिन यह आसान नहीं था. शुरुआत में उन्हें पागल तक कहा गया. दशरथ मांझी ने बताया था, 'गांववालों ने शुरू में कहा कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन उनके तानों ने मेरा हौसला और बढ़ा दिया'.
अकेला शख़्स पहाड़ भी फोड़ सकता है!
साल 1960 से 1982 के बीच दिन-रात दशरथ मांझी के दिलो-दिमाग में एक ही चीज़ ने कब्ज़ा कर रखा था. पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेना. और 22 साल जारी रहे जुनून ने अपना नतीजा दिखाया और पहाड़ ने मांझी से हार मानकर 360 फुट लंबा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा रास्ता दे दिया.
दुनिया से चले गए लेकिन यादों से नहीं!
दशरथ मांझी के गहलौर पहाड़ का सीना चीरने से गया के अतरी और वज़ीरगंज ब्लॉक का फासला 80 किलोमीटर से घटकर 13 किलोमीटर रह गया. केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. साल 2007 में जब 73 बरस की उम्र में वो जब दुनिया छोड़ गए, तो पीछे रह गई पहाड़ पर लिखी उनकी वो कहानी, जो आने वाली कई पीढ़ियों को सबक सिखाती रहेगी.
social active foundation SAFTEAM GUJ.
Thursday, 2 December 2021
आचार संहिता क्या होता है?
आचार संहिता क्या होता है (What is a code of conduct)?
आचार संहिता को भारतीय चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है | आचार संहिता चुनाव समिति द्वारा बनाया गया वो दिशानिर्देश होता है, जिसे सभी राजनीतिक पार्टियों को मानना अनिवार्य है | आचार संहिता का अर्थ (Meaning of aachar sanhita in hindi) उन नियमो से है जो उस समय अस्तित्व में आते है और उनके द्वारा ही पार्टियों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखी जाती है |
आचार संहिता के नियम कानून व प्रावधान (Code of Conduct Rules)
- आचार संहिता लागू होने के बाद सार्वजनिक धन के प्रयोग पर रोक लगा दी जाती है, जिससे किसी राजनीतिक दल या राजनेता को चुनावी लाभ न प्राप्त हो सके |
- चुनाव प्रचार के लिए सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले का प्रयोग नहीं किया जा सकता है |
- मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए किसी भी तरह की सरकारी घोषणाओं, लोकार्पण, शिलान्यास पर रोक लगा दी जाती है |
- पुलिस की अनुमति के बिना कोई भी राजनीतिक रैली नहीं की जा सकती है |
- धर्म के नाम पर वोट की मांग नहीं की जा सकती है |
- इस दौरान सरकारी खर्च से किसी भी प्रकार का ऐसा आयोजन नहीं किया जाता है जिससे किसी भी दल विशेष को लाभ प्राप्त हो सके | राजनीतिक दलों के आचरण और क्रियाकलापों पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक (Observer) नियुक्त करता है |
आचार संहिता कब लगती है | Duration of Code of Conduct
चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग के द्वारा की जाती है, इसके साथ ही आचार संहिता लागू कर दी जाती और यह चुनाव के परिणाम के साथ ही समाप्त हो जाती है | चुनाव के शुरू होने से पहले यह ECI द्वारा चुनावी क्षेत्र में लगा दी जाती है|
आचार संहिता से क्या होता है?
आचार संहिता का उद्देश्य पार्टियों के बीच मतभेद टालने, शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष चुनाव कराना होता है | इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी, केंद्रीय या राज्य की अपने आधिकारिक पदों का चुनावों में लाभ लेने हेतु गलत प्रयोग न कर सके | इस प्रकार मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट का माध्यम से चुनाव का समापन उचित प्रकार से करा लिया जाता है |
यहाँ पर आपको आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) क्या होता है, ये कब लगती है, Rules, अवधि के विषय में जानकारी दी गयी है | इस प्रकार की अन्य जानकारी के लिए आप http://hindiraj.com पर विजिट कर सकते है | अगर आप दी गयी जानकारी के विषय में अपने विचार या सुझाव अथवा प्रश्न पूछना चाहते है, तो कमेंट बॉक्स के माध्यम से संपर्क कर सकते है |
Tuesday, 30 November 2021
पहले आम चुनाव की कहानी... इस तरह हुई थी खुदमुख्तारी के सफर शुरुआत
WD |
आज हम अपनी चुनाव प्रणाली और लोकतंत्र की चाहे जितनी खामियां निकालें, लेकिन जब अतीत में लौटकर विचार करते हैं तो इसे अविश्वसनीय उपलब्धि के रूप में पाते हैं। हम अपनी सरकार खुद चुन सकते हैं, यह भाव तब रोमांच पैदा करने वाला रहा होगा। वास्तव में आजादी के बाद हमारा पहला आम चुनाव इसी रोमांचकता के सामूहिक मनोविज्ञान मे संपन्न हुआ था। उस समय के समाचारों, नेताओं के भाषणों आदि को देखें तो इस मनोविज्ञान का अहसास हो जाएगा।
नवस्वतंत्र देश का लोकतंत्रीकरण यानी पूरा उत्सव का माहौल! खुदमुख्तारी के भाव से सराबोर समूचा भारतीय समाज मानो अंग्रेजों को झुठलाने तथा दुनिया को लोकतंत्र के लिए अपनी काबिलियत साबित कर रहा हो। वह समाज जिसे अंग्रेजों ने ऐसा समाज कहा था जो लोकतंत्र को न पचा पाएगा, न इसे संभालकर आगे बढ़ा पाएगा। लोकसभा की 497 तथा राज्य विधानसभाओं की 3283 सीटों के लिए भारत के 17 करोड़ 32 लाख 12 हजार 343 मतदाताओं का निबंधन हुआ। इनमें से 10 करोड़ 59 लाख लोगों ने, जिनमें करीब 85 फीसद निरक्षर थे, अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करके पूरे विश्व को आश्चर्य में डाल दिया।
25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक यानी करीब चार महीने चली उस चुनाव प्रक्रिया ने भारत को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया। यह अंग्रेजों द्वारा लूटा-पीटा, अनपढ़ बनाया गया कंगाल देश जरूर था, लेकिन इसके बावजूद इसने स्वयं को विश्व के घोषित लोकतांत्रिक देशों की कतार में खड़ा कर दिया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश और डॉ. लोहिया के नेतृत्व वाली सोशलिस्ट पार्टी को 12, आचार्य कृपलानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी को नौ, हिंदू महासभा को चार, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ को तीन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी को तीन और शिड्यूल कास्ट फेडरेशन को दो सीटें मिलीं।
कांग्रेस ने कुल 4,76,65,951 यानी 44.99 वोट हासिल किए। उस वक्त एक निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक सीटें भी हुआ करती थीं, लिहाजा 489 स्थानों के लिए 401 निर्वाचन क्षेत्रों में ही चुनाव हुआ। 1960 से इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। एक सीटों वाले 314 निर्वाचन क्षेत्र थे। 86 निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटें और एक क्षेत्र में तीन सीटें थीं। दो सदस्य आंग्ल-भारतीय समुदाय से नामांकित हुए।
जवाहरलाल नेहरू ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत 40 हजार किमी की यात्रा की एवं करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों को संबोधित किया। यह तब असाधारण एवं अभूतपूर्व कार्य था। हालांकि विपक्षी पार्टियों के लिए काम करने के अवसर थे, उनके पास तेजस्वी नेता भी थे, लेकिन उनके पास संगठन, संसाधन और कार्यकर्ता ऐसे नही थे कि इतना व्यापक अभियान चला सके। उस समय मीडिया का भी इतना विस्तार नहीं था कि उसके माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकें।
तब भी अलग-अलग क्षेत्रों और राज्यों मे कांग्रेस से इतर पार्टियां आजाद भारत के पुनर्निर्माण, जीवन यापन, आम नागरिकों के अधिकार, राजनीतिक पार्टियों के ढांचे, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति आदि मुद्दों को लेकर जनता के बीच गईं। इसी का परिणाम था कि करीब 31 फीसद वोट इन पार्टियों को मिले।
इन मतपेटियों और मतपत्रों को संबंधित मतदान केन्द्रों तक पहुंचाना भी उस समय एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। पहाड़ों, जंगलों, मैदानी इलाकों में नदी-नालों को पार करते हुए, पगडंडियों से गुजरते हुए नियत स्थान तक पहुंचने के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। इस सबके दौरान कई लोग बीमार पड़ गए, कुछ की मृत्यु भी हो गई, कुछ लूट के शिकार हुए।
कहा जाता है कि पूर्वोत्तर में म्यांमार की सीमा से लगे मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में तो स्थानीय लोगों को यह कहकर तैयार किया गया कि आप इसे पहुंचाने मे मदद करें, बदले में आपको एक-एक कंबल तथा बंदूक का लाइसेंस दिया जाएगा। इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके अपनाए गए।
उस समय सुकुमार सेन मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे। मतदाता निबंधन से लेकर, दलों के चुनाव चिन्ह का निर्धारण एवं साफ सुथरा चुनाव कराने के लिए योग्य अधिकारियों के चयन का काम उन्होंने बखूबी किया। वे सरकारी खजाने के पैसे की कितनी चिंता करते थे इसका उदाहरण था मतपेटियों को सुरक्षित रखना। उन्होंने जितना संभव हुआ मतपेटियों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की और 1957 के दूसरे आम चुनाव में इस कारण करीब साढ़े चार करोड़ रुपए खजाने के बचाए।
कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि जिस चुनावी ढांचे के जरिए संसदीय लोकतंत्र का जो लंबा सफर हमने अभी तक तय किया है उसके लिए स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही नहीं बल्कि स्वाधीनता के बाद भी लाखों लोगों इसमें अपना योगदान दिया।
इसके अलावा जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल के ही दो पूर्व सहयोगियो ने भी कांग्रेस के खिलाफ दो पार्टियों की शुरुआत कर दी थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी तो डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन को पुनर्जीवित कर दिया था, जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी के नाम से जाना गया। वरिष्ठ स्वाधीनता सेनानी आचार्य जीवतराम भगवानदास (जेबी) कृपलानी ने किसान मजदूर प्रजा परिषद का गठन कर लिया था। भारतीय क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी, बोल्शेविक पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक के दो समूह, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, हिंदू महासभा, अखिल भारतीय रामराज्य परिषद आदि। चुनाव मे कुल 53 पार्टियों ने भाग लिया जिनमें 14 राष्ट्रीय स्तर की और बाकी राज्य स्तर की पार्टियां थीं।
आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भी अपना स्थान था। अपने-अपने क्षेत्रों में पूर्व राजाओं, जमीदारों, स्थानीय नेताओं आदि का भी सम्मान कायम था। इस कारण 38 स्थानों से 47 निर्दलीय जीते तो 10 स्थानों परनिर्विरोध निर्वाचन भी हुआ। उस समय निर्वाचित होने वालो में काका साहब कालेलकर भी थे, जो पहले पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बने।
लालबहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नंदा, मोरारजी भाई देसाई, जीवी मावलंकर, हुमायूं कबीर, ए. के. गोपालन रफी अहमद किदवई, केशवदेव मालवीय, सुभद्रा जोशी, चौधरी ब्रह्मप्रकाश आदि नेताओं को पहले आम चुनाव ने ही संसद सदस्य बनाया। बाद में इनमें से पहले तीन नेता देश के प्रधानमंत्री बने। मावलंकर पहले लोकसभा के अध्यक्ष बने। इस चुनाव में डॉ. आंबेडकर बॉम्बे सुरक्षित सीट से कांग्रेस के नारायण साबोदा से पराजित हो गए।
Thursday, 21 October 2021
भारत के सांसद मे 43% दागी नेता जाने पुरी रिपोर्ट .
एडीआर रिपोर्ट : इस बार संसद में 43 फीसदी सांसद दागी और 88 फीसदी करोड़पति
17वीं लोकसभा के लिए चुनकर संसद पहुंचने वाले 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसद दागी छवि के हैं। 2009, 2014 व 2019 के आमचुनाव में जीते आपराधिक मामलों में शामिल सांसदों की संख्या में 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। चुनाव विश्लेषण संस्था एडीआर ने शनिवार को लोकसभा चुनाव परिणाम संबंधी अध्ययन रिपोर्ट जारी की।
रिपोर्ट की मुख्य बातें : यंहा क्लिक करे.
Thursday, 14 October 2021
राजनाथ सिंह ने कहा कि सावरकर ने माफीनामा गांधी जी के कहने पर लिखा था
कच्छ Demolition 2026 Riport।
कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों, इस रिपोर्ट को तैयार करने का...




