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Sunday, 10 November 2019

गुजरात के मुस्लिम समाजमे पोलिटिकली बदलाव हो सकता है?

गुजरात के मुस्लिम समाजमे क्या पोलिटिकली बदलाव हो सकता है ???
जिधर की हवा चली उधर को चल दिये ना सोचा ना समजा बस नारे लगा दिये..


नोंध :-आजका लेख खास गुजरात के मुसलमानो को लेकर है.👇👇👇

السَّلاَمُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ
_तारिख:- ऑक्टोबर 29,2019_

✒ Huzaifa Patel (Dedicated Worker)

आजका विषय ओर हमारा ये आर्टिकल मुस्लिम समाजकी वर्तमान पोलिटिकल प्रतिनिधित्व में परिवर्तन ओर बदलाव को लेकर हमारा अभ्यास ओर एनालिसिस है, हो सकता है विषय के अनुसार आजका ये हमारा लेख लंबा हो आपका कीमती समय निकाल कर पूरा परहे।

किसीभी समाजकी सामाजिक शक्ति (ग्राउंड लेवल से मजबूती) ओर बेहतरीन  रणनीति के बगेर वो समाज भारत जैसे विशार देशमें पोलिटिकली बदलाव नही "ला" सकता है, _सोश्यल एम्पावर के बगेर आप पोलिटिकली प्रतिनिधित्व में पावर हासिल नही कर सकते है,_ सबसे पहले मुस्लिम समाजको इस बातको बहोत गहराई से समजने की जरूरत है, ओर वोभी उनको जो आज कल बहोत जोरो से सोशियल मीडियामें पोलिटिकली बदलाव और परिवर्तन की बात करते है.

हमारे देश के हालात को लेकर ओर खास कर मुस्लिम समाजकी पोलिटिकल प्रतिनिधित्व को लेकर मुस्लिम  समाजके कुछ चिंतित लोग आज जिस तरहा सोशियल मीडियाके माध्यमसे समाजके सामने अपने कूच विच्चार रखते है,मुस्लिम समजको  अब पोलिटिकल बदलाव की जरूरत है, ओर हमारे पास ऐसा नेता है जिसके लीडरशिप में हम बहोत आसानी से बदलाव ला सकते है, वो लोग हमारे सर्वे के अनुसार  बहोत हदतक खुदको ओर समजको वर्तमान सच्चाई से दूर करने की ओर वर्तमान हक्कीत के परिस्थियो से गुमराह कर रहे है, सबसे पहले ये समजना ओर मानना पड़ेगा हमारे भारत देशमे तमाम समुदाई में अगर किसी समाजकी पोलिटिकली प्रतिनिधित्व की परिस्तिथि का अभ्यास करें तो इसमे सबसे ऊपर के लेवल पर कमजोर समाज मुस्लिम समाज है, जिसको समाजका कोइभी समजदार ओर हालात का इल्म रखने वाला बखूबी  जानता है.

अब सच्चाई की तरफ एक कदम उठाकर करते है, भारत देशकी वर्तमान राजनीति और तमाम परिस्तिथियों जैसे देशका मीडिया, सरकारी प्रसासन ओर समाजकी लीडरशीप ओर वैचारिक गुलामी, के बाद क्या मुस्लिम समाज सिर्फ नारे बाजी ओर  ओर जुलूस बाजी ओर खास किसी एक व्यक्ति को लेकर आसानी से इतने गम्भीर समयमे बदलाव ला सकते है?? अगर आप ये सोचते है के हम किसी खास एक व्यक्ति ओर कूच नारे बाजी जनूनी बातों और बयानों, भाषणों से समाजमे बदलाव ला सकते है,तो  हमारा अनुमान केहता है आप गलत दिशामे जा रहे है, मुस्लिम समाजकी ग्राउंड रियलटी ओर मॉनसिक गुलामी एक ऐसा विषय है जिस को समजें बगेर कोइभी ओर कितना भी बड़ा व्यक्ति ओर समूह, संस्था, संगठन कभी बदलाव नही ला सकता है, कूच लोग पिछेले कुछ सालों से हालात को लेकर कूच लोंगोंकी बातों ओर भाषणों से प्रभावित होकर पूरे समाजको प्रभावित करने की बात करते है,और बिना सोश्यल एम्पोवर मजबूत किये बगैर पोलतिकली बदलाव और परिवर्तन की बात करते हैं..


हमारा मानना है, गुजरात के मुस्लिम समाजकी जो पोलतिकली प्रतिनिधित्व को लेकर समस्या है, वो दूसरे स्टेट से बहोत अलग है, जिसमे बहोत बड़ा अभ्यास ओर समाजके संघर्ष और ग्राउंड रियलिटी के अनुभवी ओर सक्रिय लोगो की बहोत बड़ी प्रकिया कार्य रणनीति के बाद ओर बहोत सारे लंबे समय के बाद कूच हदतक सफलता मिल सकती है, लेकिन पिछले कूच समयसे सोशियल मीडिया ओर कुछ मीटिंगों,प्रोगामो के माध्यमसे जो बातें चल रही है, हमारा 100% दावा है इस मे बहोत से युवाओं का समय और बहोत से लोगोके साथ समाजका बहोत से प्रोग्राम ओर कूच लोंगोंकी शक्ति लगाने के बादभी 10% सफलता प्राप्त कर नही सकते है,  अगर हमारे दावा आपको लगता है के गलत है आप निस्चित रूप से हमारा संपर्क कर कसते है, लेकिन दल्ली ओर ग्राउंड रियलटी के अनुभव के बगेर हमार संपर्क ना करे।

समाजकी तमाम परिस्थितियों में बदलाव के लिये जनून, जज्बात, ओर सिर्फ विरोध विरोध से बदलाव की उम्मीद रखने वाले हमारे हिसाब से समाजकी वर्तमान समस्या से हल करने के बजाये कूच लोगो की सोशियल मीडिया में कूच एक्टिविटी ओर कुछ ग्राउंड एक्टिविटी ओर बिना आयोजन ओर रणनीति से सफलता प्राप्त नही कर सकते, समाजके चिंतीत अनुभवी संघर्ष करने की सोच के बगेर ओर हमेशा सक्रियता में कोई बदलाव नही हो सकता है चाहे आप देशका कितना बड़ा मुस्लिम समाजका  चेहरा समाजके सामने कुछ प्रोग्राम ओर जलसों जुलूस के बड़े बड़े स्टेज ओर नारों से बदलाव नही ला सकते है, समाजको कुछ हदतक बिना समजें बदलाव की उम्मीद रखना खुदको ओर समाजको गुमराह ओर नुकसान करने के बराबर है...


समाज के युवाओं और चिंतीत लोंगोको समाजके लिये तैयार करना जरूरी है, चुनाव से पेहले 2-3 या फिर ज्यादा से ज्यादा 5 महीने पेहले ओर कूच छोटे छोटे कार्यो से बदलाव की उम्मीद करना, हमारी बहोत  बड़ी बेवकूफी ओर समजको बहोत बड़ा नुकसान कर सकता है,गोरे के पुतले पर सवार होकर आप एक जगाह से दूसरी जगाह पर नही जा सकते है, सिर्फ आप गोरे पर बैठे होने का एहसास कर सकते है या फिर मजा ले सकते है, लेकिन बिना असली जानदार गोर के ऊपर सवार किये बगैर आप अपना सफर कामयाब नही कर सकते है, गोरे के पुतले की सवारी से उतरकर असली गोर को सवारी करने में अपने आपको लगाये ऐसी उम्मीद करते हैं।

इस विषय मे आगे और मजीद बात करेंगे अगर आजके विषय को लेकर लेखमें लिखी गई बातों में कूच कड़वाहट है, हमारे कूच साथियो के लिये तो माफी चाहते हैं हमारे मकसद कभी आपके हौसलों को पस्त करने का नही है, लेकिन जो बात आप दिमाग से सोचते हो और बदलाव लाना चाहते हो उसकी बिना तैयारी के उम्मीद रखना बेवकूफी है...

अगर बदलाव लाना है तो पहले खुदमे बदलाव लाने का प्रयास करे और इसकी कूच बाटे में नीचे बता रहा हु, उम्मीद है इस पर बादमे बात करेंगे.

आज मुस्लिम समाजको क्या जरूरत है???
👉 _मशल्क नही मकसद चाहिये,_
👉 _फिरकापरस्ती नही फिरासत चाहिये,_
👉 _जातिवाद नही जिम्मेदारी चाहिये,_

बुलंद इरादों को लेकर चल साथमे कुरबानी देते चल,
मिल्लत (समाज) मे उम्मीद देते चल..
खुद तेरा मददगार होगा इसबात पर विश्वास करते चल,

इस मैसेज को मुस्लिम समाजके समजदार युवा और चिंतीत वडिलो तक शेर जरूर करे,
         SAF🤝Team Bharuch Guj.

                      Mo.9898335767

Tuesday, 14 August 2018

ए मेरे वतन के लोगो जरा याद करो कुरबानी

ऐ मेरे वतन के लोगो, तुम खूब लगा लो नारा
ये शुभ दिन है हम सब का, लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर, वीरों ने है प्राण गंवाए
कुछ याद उन्हें भी कर लो, कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर न आए, जो लौट के घर न आए। ..
ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको, इसलिए सुनो ये कहानी
जो शहीद हुए हैं, उनकी, जरा याद करो कुरबानी...
जब घायल हुआ हिमालय, ख़तरे में पड़ी आज़ादी
जब तक थी सांस लड़े वो... जब तक थी सांस लड़े वो, फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा, सो गए अमर बलिदानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली
जब हम बैठे थे घरों में... जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो अपने, थी धन्य वो उनकी जवानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई सिख कोई जाट मराठा,
कोई गुरखा कोई मदरासी, कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पर मरनेवाला... सरहद पर मरनेवाला, हर वीर था भारतवासी
जो खून गिरा पर्वत पर, वो खून था हिंदुस्तानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी...
थी खून से लथ - पथ काया, फिर भी बंदूक उठाके
दस - दस को एक ने मारा, फिर गिर गए होश गंवा के
जब अंत समय आया तो.... जब अंत-समय आया तो, कह गए के अब मरते हैं
खुश रहना देश के प्यारो... खुश रहना देश के प्यारो
अब हम तो सफ़र करते हैं।.. अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने, क्या लोग थे वो अभिमानी
जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुरबानी
तुम भूल न जाओ उनको, इसलिए कही ये कहानी
जो शहीद हुए हैं, उनकी जरा याद करो कुरबानी
जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद की सेना... जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद की सेना..
जय हिंद, जय हिंद जय हिंद, जय हिंद जय हिंद, जय हिंद...

7/11 मुंबई विस्फोट: यदि सभी 12 निर्दोष थे, तो दोषी कौन ❓

सैयद नदीम द्वारा . 11 जुलाई, 2006 को, सिर्फ़ 11 भयावह मिनटों में, मुंबई तहस-नहस हो गई। शाम 6:24 से 6:36 बजे के बीच लोकल ट्रेनों ...