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Friday, 8 June 2018

फतहे_मक्का

2018 रमजान

मक्के में अबू सुफियान बहुत बेचैन था,"आज कुछ होने वाला है"( वो बड़बड़ाया) उसकी नज़र आसमान की तरफ बार बार उठ रही थी-
उसकी बीवी"हिन्दा" जिसने हज़रत अमीर हम्ज़ा का कलेजा चबाया था उसकी परेशानी देखकर उसके पास आ गई थी,
क्या बात है? क्यूं परेशान हो?
हूं? अबू सुफियान चौंका - कुछ नहीं- तबीयत घबरा रही है मैं ज़रा घूम कर आता हूं,वो ये कहकर घर के बैरूनी दरवाज़े से बाहर निकल गया मक्के की गलियों में घूमते घूमते वो उसकी हद तक पहुंच गया, अचानक उसकी नज़र शहर से बाहर एक वसी मैदान पर पड़ी,
       हज़ारों मशालें रौशन थीं, लोगों की चहल पहल उनकी रौशनी में नज़र आ रही थीं और भिनभिनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ों लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे हों उसका दिल धक से रह गया था- उसने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जाकर देखेगा कि ये कौन लोग हैं, इतना तो वो समझ ही चुका था कि मक्के के लोग तो ग़ाफीलों की नींद सो रहे हैं और ये लश्कर यक़ीनन मक्के पर चढ़ाई के लिए ही आया है
वो जानना चाहता था कि ये कौन हैं?
वो आहिस्ता आहिस्ता ओट लेता उस लश्कर के काफी क़रीब पहुंच चुका था,
कुछ लोगों को उसने पहचान लिया था,ये उसके अपने ही लोग थे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे,उसका दिल डूब रहा था,वो समझ गया था कि ये लश्कर मुसलमानों का है,
      और यक़ीनन" मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم" अपने जां निसारों के साथ मक्का आ पहुंचे थे- वो छुप कर हालात का जायज़ा ले ही रहा था कि उक़ब से किसी ने उसकी गरदन पर तलवार रख दी,उसका ऊपर का सांस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया था, लश्कर के पहरेदारों ने उसे पकड़ लिया था,और अब उसे बारगाहे मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में लेजा रहे थे,उसका एक एक क़दम कई मन का हो चुका था,हर क़दम पर उसे अपने करतूत याद आ रहे थे,जंगे बद्र,उहद,खन्दक,खैबर सब उसकी आंखों के सामने नाच रही थीं,उसे याद आ रहा था कि उसने कैसे सरदाराने मक्का को इकट्ठा किया था "मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को क़त्ल करने के लिए" कैसे नजाशी के दरबार में जाकर तक़रीर की थी कि -
ये मुसलमान हमारे गुलाम और बाग़ी हैं इनको हमें वापस दो,
कैसे उसकी बीवी हिन्दा ने अमीर हम्ज़ा को अपने ग़ुलाम हब्शी के ज़रिए शहीद करवा कर उनका सीना चाक करके उनका कलेजा निकाल कर चबाया और नाक और कान काट कर गले में हार बना कर डाले थे,और अब उसे उसी मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के सामने पेश किया जा रहा था उसे यक़ीन था कि- उसकी रिवायात के मुताबिक़ उस जैसे "दहशतगर्द" को फौरन तहे तेग़ कर दिया जाएगा-

#इधर-
    बारगाहे रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में असहाब जमा थे और सुबह के इक़दामात के बारे में मशावरत चल रही थी कि किसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ्तारी की खबर दे दी "अल्लाहु अकबर" खैमा में नारा ए तकबीर बलंद हुआ अबू सुफियान की गिरफ्तारी एक बहुत बड़ी खबर और कामयाबी थी,खैमे में मौजूद उमर इब्ने ख़त्ताब उठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतिहाई जोश के आलम में बोले-
उस बदबख्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फसाद की जड़ यही रहा है,
       चेहरा ए मुबारक रहमतुल्लिल आलमीन صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर तबस्सुम नमूदार हुआ, और उनकी दिलों में उतरती हुई आवाज़ गूंजती
" बैठ जाओ उमर- उसे आने दो"
उमर इब्ने खत्ताब आंखों में गैज़ लिए हुक्मे रसूल صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की इताअत में बैठ तो गए लेकिन उनके चेहरे की सुर्खी बता रही थी कि उनका बस चलता तो अबू सुफियान के टुकड़े टुकड़े कर डालते इतने में पहरेदारों ने बारगाहे रिसालत صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم में हाज़िर होने की इजाज़त चाही, इजाज़त मिलने पर अबू सुफियान को रहमतुल्लिल आलमीन के सामने इस हाल में पेश किया गया कि उसके हाथ उसके अमामे से उसकी पुश्त पर बंधे हुए थे, चेहरे की रंगत पीली पड़ चुकी थी,और उसकी आंखों में मौत के साए लहरा रहे थे,
लबहाए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم को जुंबिश हुई और असहाब किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم ने एक अजीब जुमला सुना-
इसके हाथ खोल दो,और इसको पानी पिलाओ,बैठ जाओ अबू सुफियान-!!
      अबू सुफियान हारे हुए जुवारी की तरह गिरने के अंदाज़ में खैमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गया-पानी पीकर उसको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठाकर खैमे में मौजूद लोगों की तरफ देखा,उमर इब्ने खत्ताब की आंखें ग़ुस्से से सुर्ख थीं, अबूबक्र इब्ने क़ुहाफा की आंखों में उसके लिए अफसोस का तास्सुर था,उस्मान बिन अफ्फान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की हमदर्दी और अफसोस का मिला जुला तास्सुर था अली इब्न अबी तालिब का चेहरा सपाट था,इसी तरह बाक़ी तमाम असहाब के चेहरों को देखता देखता आखिर उसकी नज़र मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के चेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई, जहां जलालत व रहमत के खूबसूरत इम्तिज़ाज (मिलावट) के साथ कायनात की खूबसूरत तरीन मुस्कुराहट थी,
            कहो अबू सुफियान? कैसे आना हुआ??
अबू सुफियान के गले में जैसे आवाज़ ही नहीं रही थी, बहुत हिम्मत करके बोला- मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं??
उमर इब्न खत्ताब एक बार फिर उठ खड़े हुए " या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم " ये शख्स मक्कारी कर रहा है,जान बचाने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना चाहता है, मुझे इजाज़त दीजिए, मैं आज इस दुश्मने अज़ली का खात्मा कर ही दूं, उनके मुंह से कफ जारी था-
बैठ जाओ उमर- रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने नरमी से फिर फ़रमाया: बोलो अबू सुफियान! क्या तुम वाक़ई इस्लाम क़ुबूल करना चाहते हो?
जी या रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم - मैं इस्लाम क़ुबूल करना चाहता हूं मैं समझ गया हूं कि आप और आपका दीन भी सच्चा है और आपका ख़ुदा भी सच्चा है,उसका वादा पूरा हुआ- मैं जान गया हूं कि सुबह मक्का को फतह होने से कोई नहीं बचा सकेगा-

          चेहरा ए रिसालत मआब صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم पर मुस्कुराहट फैली-
ठीक है अबू सुफियान- तो मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं और तुम्हारी दरख्वास्त क़ुबूल करता हूं जाओ तुम आज़ाद हो, सुबह हम मक्का में दाखिल होंगे इंशा अल्लाह
मैं तुम्हारे घर को जहां आज तक इस्लाम और हमारे खिलाफ साज़िशें होती रहीं,जाए अमन क़रार देता हूं,जो तुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है,
अबू सुफियान की आंखें हैरत से फटती जा रही थीं
" और मक्का वालों से कहना- जो बैतुल्लाह में दाखिल हो गया उसको अमान है,जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया,उसको अमान है, यहां तक कि जो अपने घरों में बैठा रहा उसको अमान है,
जाओ अबू सुफियान! जाओ और जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो, और कहना मक्का वालों से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहर नहीं निकल होगी,हमारा कोई तीर तरकश से बाहर नहीं होगा, हमारा कोई नेज़ा किसी की तरफ सीधा नहीं होगा जब तक कि कोई हमारे साथ लड़ना ना  चाहे"
       अबू सुफियान ने हैरत से मुहम्मद صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ،की तरफ देखा और कांपते हुए होंठों से बोलना शुरू किया-
" اشھد ان لاالہٰ الا اللہ و اشھد ان محمّد عبدہُ و رسولہُ "
सबसे पहले उमर इब्ने खत्ताब आगे बढ़े- और अबू सुफियान को गले से लगाया,"मरहबा ऐ अबू सुफियान" अब से तुम हमारे दीनी भाई हो गए,तुम्हारी जान,माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम हो गया जैसा कि हर मुसलमान का दूसरे पर हराम है,तुमको मुबारक हो कि तुम्हारी पिछली सारी खताएं मुआफ कर दी गईं और अल्लाह तबारक व तआला तुम्हारे पिछले गुनाह मुआफ फरमाए,अबू सुफियान हैरत से खत्ताब के बेटे को देख रहा था,ये वही था कि चंद लम्हे पहले जिसकी आंखों में उसके लिए शदीद नफरत और गुस्सा था और जो उसकी जान लेना चाहता था,अब वही उसको गले से लगा कर भाई बोल रहा था?
      ये कैसा दीन है?
      ये कैसे लोग हैं?
सबसे गले मिलकर और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم के हाथों पर बोसा देकर अबू सुफियान खैमे से बाहर निकल गया,
वो दहशतगर्द अबू सुफियान कि जिसके शर से मुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामती से गुज़रता हुआ जा रहा था, जहां से गुज़रता,उस इस्लामी लश्कर का हर फर्द,हर जंगजू,हर सिपाही जो थोड़ी देर पहले उसकी जान के दुश्मन थे अब आगे बढ़ बढ़ कर उससे मुसाहफा कर रहे थे,खुश आमदीद कह रहे थे-

         #अगले_दिन:-
         ‌‌
            मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़े थे उनमें सबसे नुमाया अबू सुफियान था, मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवार, किसी एक नेज़े की अनी, किसी एक तीर की नोक पर  खून का एक क़तरा भी नहीं था, लश्करे इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थी,
किसी के घर में दाख़िल मत होना
किसी की इबादतगाह को नुक़सान मत पहुंचाना
किसी का पीछा मत करना
औरतों और बच्चों पर हाथ ना उठाना
किसी का माल ना लूटना
बिलाल हब्शी आगे आगे ऐलान करते जा रहे थे
"मक्का वालों ! रसूल ए खुदा صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की तरफ से- आज तुम सबके लिए आम मुआफी का ऐलान है-
किसी से उसके साबिक़ा आमाल की बाज़पुर्श नहीं की जाएगी,
जो इस्लाम क़ुबूल करना चाहे वो कर सकता है
जो ना करना चाहे वो अपने साबिक़ा दीन पर रह सकता है,
सबको उनके मज़हब के मुताबिक़ इबादत की खुली इजाज़त होगी
सिर्फ मस्जिदे हराम और उसकी हुदूद के अंदर बुत परस्ती की इजाज़त नहीं होगी
किसी का ज़रीया ए मआश छीना नहीं जाएगा
किसी को उसकी ज़मीन व जायदाद से महरूम नहीं किया जाएगा
ग़ैर मुसलमानों की जान माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगे
ऐ मक्का के लोगो-!!"
हिन्दा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी लश्कर इस्लाम को गुज़रते देख रही थी
उसका दिल गवाही नहीं देंगी रहा था कि "हज़रत हम्ज़ा" का क़त्ल उसको मुआफ कर दिया जाएगा,
लेकिन अबू सुफियान ने तो रात यहीं कहा था कि-
"इस्लाम क़ुबूल कर लो सब ग़ल्तियां मुआफ हो जाएंगी"
#मक्का_फतह_हो_चुका_था
बिना ज़ुल्मो तशद्दुद, बिना खून बहाए, बिना तीरो तलवार चलाए,
लोग जौक़ दर जौक़ उस आफाक़ी मज़हब को इख्तियार करने और अल्लाह की तौहीद और रसूलल्लाह صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم की रिसालत का इक़रार करने मस्जिद हराम के सहन में जमा हो रहे थे,
और तभी मक्का वालों ने देखा-
"उस हुज़ूम में हिन्दा भी शामिल थी"
ये हुआ करता था इस्लाम- ये थी उसकी तालीमात- ये सिखाया था रहमते आलम صلی اللّٰہ تعالیٰ علیہ واٰلہٖ وسلّم ने.....

Saturday, 2 June 2018

इण्टरनेट की बुरी लत

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*इण्टरनेट की बुरी लत*
✍ सृष्टि
http://ahwanmag.com/archives/7129
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कम्प्यूटर और इण्टरनेट के आने के बाद वैश्विक क्रिया व्यापार वैसा नहीं रहा जैसा उसके पहले था, चाहे वह क्षेत्र आर्थिक हो या ज्ञानात्मक। एक तरफ मनुष्यों के बीच की हज़ारों मीलों की दूरी को सेकेण्डों तक सीमित करके इसने मानवीय मेल-जोल के नये आयाम खोले हैं वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर के ज्ञान के सूचनात्मक आयाम को सिर्फ एक क्लिक पर मानव की सेवा में हाज़िर कर दिया। *विज्ञान के इस माध्यम ने जहाँ नयी सम्भावनाओं को जन्म दिया है वहीं “संस्कृति उद्योग” से जुड़ने के कारण इसने जिस आभासी दुनिया का निर्माण किया है उसके बहुविध खतरे भी हैं। पूँजीवाद की मरणशील संस्कृति ने सभ्यता के सम्मुख  एक  संकट उपस्थित किया है। लूट के लिये बर्बर सौदों ने बड़ी आबादी से न सिर्फ उनकी जीविका छीनी है बल्कि उसे मानवीय सारतत्व से वंचित भी किया।* वहीं दूसरी तरफ दूसरी आबादी जिसके सामने जीविका का प्रश्न मुँह बाये खड़ा नहीं है, उसे भी आत्मिक सम्पदा से रिक्त, आत्ममोहग्रस्त, आत्मकेन्द्रित और समाजविमुख बनाया है। ऐसे में इण्टरनेट का इस्तेमाल करने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा इस आभासी दुनिया के मोहपाश में एकाकीपन और अलगाव के कारण   बँधता जा रहा है और आज कई लोगों में यह एक मानसिक बीमारी का रूप ले चुकी है। लेकिन इण्टरनेट पर यह निर्भरता लत या इण्टरनेट एडिक्शन डिसऑडर के रूप में भी सामने आ रही है। यह आज विश्व स्तर पर सोचने, विचारने और बहस का मुद्दा बन चुका है। ‘अमेरिकन सोसाएटी ऑफ एडिक्शन मेडीसिन’ ने एडिक्शन की नई परिभाषा देते हुए कहा कि एडिक्शन एक गम्भीर दिमागी रोग है जो एक पदार्थ तक सीमित नहीं है। इण्टरनेट एक मादक पदार्थ हिरोइन का काम कर रहा है। समाज का शायद ही कोई ऐसा वर्ग होगा जो इस इलेक्ट्रानिक हिरोइन के असर से बचा हो। खास करके मध्यवर्गीय आबादी, विद्यार्थियों और नौजवानों में इसका असर सबसे अधिक है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार 13 से 17 वर्ष की आयु वर्ग में हर 4 में  से 3, 18-24 वर्ग में से 71 प्रतिशत और 34-44 के आयु वर्ग का आधा इण्टरनेट की लत का शिकार है। एक और सर्वेक्षण के अनुसार यह तथ्य सामने आया है कि किशोर अवस्था में दाखिल हुए बच्चे इसका सबसे अधिक शिकार हो रहे हैं। इसके अनुसार चीन के 11 प्रतिशत, यूनान के 8 प्रतिशत, कोरिया के 18.4 प्रतिशत और अमेरीका के 8.2 प्रतिशत नौजवान इण्टरनेट के गुलाम हैं। किशोर अवस्था मनुष्य की ज़िन्दगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इस उम्र में इंसान के विचार एक दिशा लेते हैं और उसकी शख्सियत एक रूप लेती है। लेकिन *मौजूदा मुनाफा आधारित पूँजीवादी व्यवस्था के फलस्वरूप समाज में फैल रही बेगानगी से बचने के लिये नौजवान सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ऑनलाइन वीडियो गेमिंग से राहत की उम्मीद करते हैं जो उन्हें डरपोक और निर्बल बना देती है।* फेसबुक और इंस्टाग्राम  का इस्तेमाल सबसे अधिक होता है। 13-17 वर्ष के किशोरों में 71 प्रतिशत फेसबुक और 52 प्रतिशत इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करते हैं।  पूना यूनीवर्सिटी की दूसरे वर्ष की छात्रा आकांक्षा साहनी बताती है कि मुझे इंस्टाग्राम की आदत नहीं है लेकिन मैं इसके साथ जुड़ी हुई हूँ। यहाँ तक कि प्रतिदिन की जानकारी बहुत जीवन्त लगती है जब उसको फोटो खींच कर अपलोड किया जाता है। मैं फोटो को अलग-अलग तरह ऐडिट करके उसकी खूबसूरती बढ़ा कर छोटे-छोटे सिरलेखों के साथ अपलोड करती हूँ। जब उसे पूछा गया कि किस चीज़ की फोटो खींच कर अपलोड करती है तो वह कहती है कि यह बहुत फज़ूल लगेगा पर मैं हर चीज़ की और मुझे दिलचस्प लगने वाली हर जगह की फोटो खींचती हूँ। सुबह की अपनी चाय के कप से बारिश के बाद पार्क में मिट्टी के किनारे तक की फोटो खींचती हूँ। मुझे इन सारी चीज़ों को अपने फोन में रखना अच्छा लगता है। इससे भी ज़रूरी, जब मेरे फोन की बत्ती जलती है तो वहाँ मुठ्ठी भर नोटीफिकेशन होती हैं जो बताती हैं कि 23 लोगों ने मेरी फोटो को पसन्द किया है और एक बहुत खूबसूरत टिप्पणी भी की है तो मैं बहुत उत्साहित महसूस करती हूँ। अन्य नशों की तरह ही इण्टरनेट का इस्तेमाल दिमाग में डोपामाइन की मात्रा बढ़ाती है और मनुष्य खुशी महसूस करता है। एक इण्टरनेट छुड़ाओ केन्द्र में इलाज़ करा रहा 21 वर्षीय नौजवान बताता है कि: “मैं महसूस करता हूँ कि यह तकनीक मेरी ज़िन्दगी में बहुत खुशियाँ लेकर आयी है और कोई भी काम मुझे इतना उत्तेजित नहीं करता और आराम नहीं देता जितना कि यह तकनीक देती है। जब मैं उदास होता हूँ तो मैं खुद को अकेला करने और दुबारा खुश होने के लिये इस तकनीक का इस्तेमाल करता हूँ। जो नौजवान वर्ग ‘नये’ जैसे प्यारे शब्द को जिन्दा रखता है, जिनके पास नये कल के सपने, नये संकल्प, नयी इच्छाएँ, नया प्यार और नये विश्वास होते हैं वही नौजवान आज बेगानगी और अकेलेपन से दुखी होकर आभासी यथार्थ की राहों पर चल रहे हैं जिसका अन्त अत्यन्त बेगानगी में होता है।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स के बाद नौजवानों में प्रचलित चीज़ है ऑनलाइन वीडियो गेमिंग। दशक 1970-80 में सामने आने के बाद वीडियो गेम इण्डस्ट्री ने 2002 तक 10.3 बिलियन डालर कमाये। वीडियो गेमों की तरफ लोगों का बढ़ता रुझान भी आज वीडियो गेम लत (एडिक्शन) का रूप धारण कर चुका है। एक मैगज़ीन में छपी खोज के अनुसार 3034 बच्चों में से 9 प्रतिशत बच्चे ऑनलाइन वीडियो गेम एडिक्शन के शिकार हैं और 4 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो 50 घण्टे प्रति सप्ताह की औसत से इसका इस्तेमाल करते हैं।

आज वीडियो गेम मनोरंजन से कहीं दूर होकर घातक चीज के नज़दीक पहुँच चुका है। कोरीयन मीडिया द्वारा दी गयी एक खबर के अनुसार एक जोड़े ने, जो प्रतिदिन 12 घण्टे कम्प्यूटर पर ‘वर्चुअल’ (आभासी) बच्चे का पालन-पोषण करता था, अपनी 3 महीने की बच्ची को नज़रअन्दाज़ किया और कुपोषण के कारण जिसकी मौत हो गयी। वहीं ज्यादातर वीडियो गेम हिंसात्मक होते हैं ; यह बच्चों और युवाओं में जीत की अंधी लालासा ‘विन एट एनी कास्ट’ की प्रवृत्ति भरते हैं। इस तरह के गेम ऐसी मानसिकता का निर्माण करते हैं जिसमेंं सहजीवन और सहअस्तित्व की भावना की बजाय खुद के लिये जीने और स्वार्थ की भावना बढ़ती है। यह घटना बखूबी दिखाती है कि आज इंसान में बेगानगी की भावना इतनी गहरी हो चुकी है कि असली इंसानों को अनदेखा करके अपनी ऊर्जा उस दुनिया पर लगाती है जो आभासी है । इण्टरनेट की लत का दिमागी रोग जितना आस-पास के लिये घातक है, इससे भी कहीं ज़्यादा यह उस इंसान के लिये खतरनाक है जो इसका शिकार है। चीन के एक नौजवान को जब यह एहसास हुआ कि उसको इण्टरनेट की आदत हो चुकी है तो उसने इससे पीछा छुड़ाने की कोशिश की। पर असफल होने पर उसने अपना बायाँं हाथ यह सोच कर काट लिया कि हाथ नहीं रहेगा तो इण्टरनेट इस्तेमाल भी नहीं कर सकेगा। इण्टरनेट की लत आज एक गम्भीर समस्या है। नौजवानों को इसकी जकड़ से बचाने के लिये दुनिया भर में अलग-अलग तरीके अपनाये जा रहे हैं। चीन में इण्टरनेट छुड़ाओ शिविर चलाए जा रहे हैं जहाँ 1500 के करीब शिक्षित निर्देशक हैं जो नौजवानों की इण्टरनेट छुड़वाने में मदद करते हैं। ‘वैब जंकीज़’ नामक दस्तावेजी इन शिविरों की एक तस्वीर पेश करती है। कोरिया के स्कूलों में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम में इण्टरनेट के इस्तेमाल के बारे सही जानकारी जैसे विषय शामिल किये गये हैं। 3-3 वर्ष के बच्चों से भी इस बारे बात की जाती है। सवाल यह है कि इसका दोषी कौन है? क्या वे नौजवान इसके दोषी हैं जो इसके सन्ताप में जी रहे हैं या विज्ञान द्वारा समाज को भेंट की यह तकनीक इसकी दोषी है। इसके लिये दोषी न तो तकनीक है ना ही वह नौजवान। इसकी जड़ मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था में है। विज्ञान जो मनुष्य की सेवा के लिये सृजित किया जाता है जब मुनाफे की जकड़ में आता है तो अपने विपरीत में बदल जाता है। मानव द्वारा विकसित विज्ञान मानव को ही गुलाम बना लेता है। इण्टरनेट की आदत का दूसरा और मुख्य कारण समाज में फैल रही बेगानगी है जो इस व्यवस्था का अभिन्न अंग है। सड़-गल रही पूँजीवादी व्यवस्था से मिली आत्मिक कंगाली और बेगानगी नौजवानों को इण्टरनेट का सहारा लेने के लिये मज़बूर करती है और इसके परिणाम आज हमारे सामने हैं। पूँजीवाद में कोई भी आविष्कार पूँजी की जकड़बन्दी में उपभोक्तावाद को बढ़ावा देता है।  इण्टरनेट मात्र लोगों के जुड़ने के लिये वर्चुअल स्पेस और सूचना संजाल का स्थान नहीं है, बल्कि पूँजी निवेश, मुनाफ़ा कमाने के स्थल के साथ लोगों को पूँजी की संस्कृति का गुलाम बनाने की पाठशाला भी है। इसके माध्यम से पोर्न इंडस्ट्री, हैकिंग, सूचना चोरी, जैसे तमाम कारोबार किये जाते हैं। जहाँ एक और श्रम की लूट द्वारा लोगों की जिन्दगी को कोल्हू का बैल बनाकर पूँजीवाद ने उनके सामाजिक सरोकार के वक्त और सामाजिक दायरे को सिकोड़ दिया है वहीं दूसरी तरफ रहे-सहे वक्त को जो लोग सार्वजनिक जीवन और परिवेश से सीधा सम्बन्ध बनाने, उसे जानने और बदलने की प्रक्रिया में लगा सकते है; उसे इण्टरनेट की नशाखोरी ने ग्रस लिया है। अनायास नहीं है कि रिलायंस जियो ने फ्री इण्टरनेट की मुहिम चलायी जिससे उसने न सिर्फ इससे अरबों रूपये कमायी बल्कि हमारे युवाओं के बेशकीमती वक्त को इस आभासी दुनिया में खर्च करने का नशा भी परोसा, हमारी सूचनाओं तक में उसने सेंधमारी भी की। इण्टरनेट की लत का शिकार व्यक्ति इस विभ्रम में रहता है कि वह ग्लोबल ज्ञान और सूचना तक पहुँच रहा है परन्तु प्राप्त सूचनाओं का वह एक विशुद्ध उपभोक्ता होता है और वह भी ऐसा उपभोक्ता जिसकी विश्लेषण क्षमता और आत्मिक सम्पदा का उपभोग हो चुका होता है। वैश्विक जानकारी के विभ्रम में वह निरन्तर आत्मविस्मृत, समाजविमुख, एकाकी तथा अलगावग्रस्त कूपमण्डूक बनाता जाता है। राहत शिविर, दवाइयाँ, मनोवैज्ञानिक हल कुछ राहत तो दे सकते हैं लेकिन अन्तिम रूप में इस समस्या को खत्म नहीं कर सकते। इण्टरनेट की आदत जैसे मानसिक रोगों का निदान मुनाफ़ा केन्द्रित व्यवस्था में नहीं वरन उस व्यवस्था में हो सकता है जिसके केन्द्र में मनुष्य हो।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-अगस्‍त 2017 अंक में प्रकाशित
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राजनीति से अलग रहने वाले लोग

तारीख-02/06/2018 शनिवार

राजनीति से अलग रहने वाले लोग
🖊 By - Kavita Krishnapallavi

कुछ भलेमानस नागरिक अक्सर हमें यह समझाने की कोशिश करते हैं  कि एक ईमानदार, नेक युवा भी यदि राजनीति में जाता है तो बेरहम और काँइयाँ हो जाता है। यदि मानवीय संवेदना बचाये  रखनी हो तो राजनीति से दूर ही रहना चाहिए। यानी अच्‍छे लोगों को राजनीति से दूर रहना चाहिए और राजनीति का क्षेत्र छंटे हुए बदमाशों और हरामियों के लिए छोड़ देना चाहिए।
लेकिन *समाज के संचालन की सारी नीतियां राजनीति के दायरे में ही तय होती हैं। शिक्षा कैसी हो, सभी लोगों को स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं कैसे मिले, सबको रोज़गार कैसे मिले, विकास का स्‍वरूप कैसा हो  --  ये सारे अर्थनीति के प्रश्‍न राज्‍यसत्‍ता में बैठे लोग तय करते हैं। राज्‍यसत्‍ता पर राजनीति करने वाले ही काबिज होंगे।*
राजनीति को गाली देकर अराजनीतिक हो जाने वाले लोग सबसे भ्रष्‍ट और गंदे-कमीने लोगों के चाकर बनकर, अपने आस-पास के अनाचार से आंखें मूंदकर पेट पालते हैं।
राजनीति  से आप भाग नहीं सकते। *राजनीति दो प्रकार की होती है* -  लूट, शोषण और अन्‍याय के तंत्र को चलाने वाली राजनीति और इस तंत्र को तोड़कर न्‍याय और समानता पर आधारित तंत्र बनाने की राजनीति। एक शासकवर्गीय राजनीति है दूसरी जनपक्षीय राजनीति है। एक यथास्थिति की राजनीति है, दूसरी आमूल बदलाव की राजनीति है। एक पूंजी की राजनीति है, दूसरी श्रम की राजनीति है। एक संसदीय चुनावों की राजनीति है, दूसरी जनक्रांति की राजनीति है। *राजनीति से भागने के बजाय आपको दो राजनीतियों में से एक को चुनना ही होगा। जब आप तटस्‍थ होते हैं तो ग़लत राजनीति के पक्ष में खड़े होते हैं।*

कच्छ Demolition 2026 Riport।

कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों,  इस रिपोर्ट को तैयार करने का...