Followers

Tuesday, 14 February 2017

भारतीय मुस्लिम आरक्षण मोर्चा पार्त+1

🌙 *भारतीय मुस्लिम अारक्षण मोर्चा* 🌙
⏩⏩⏩ *BMAB आरक्षण मुहीम*⏪⏪⏪
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

*अबतक के मेरे अनुभव के बाद अब हम भारत देशके आम मुस्लमानो मे कीस तरहा का काम करे जीस्से उम्मत मे बेदारी हो अोर उम्मत मुत्तहीद हो इसके लीये अब 🌙 *भारतीय मुस्लिम आरक्षण मोर्चा* 🌙 *के नाम से काम करेंगे,*

⚜⚜⚜⚜⚜ *जिसका मकस्द*⚜⚜⚜⚜⚜⚜

👉🏻 *मुस्लिम समाज को बेदार करना अपने हक्क अोर अधीकार के लीये अोर अपना वुजिद बाकी रखने के लीये तय्यार करना रहेगा*

👉🏻 *मुस्लिम समाजको अपसी जगरे भुलाकर समजदार अोर फिकरबंद,अोर जानकार लोगोको इस पेलेट फोर्म मे जुरने की कोसिस करना अोर उन्को मुत्तहीद करना*

👉🏻 *मुस्लिम समाज को मिलने वाले हक्क अोर अधिकार से कीस तरहा दुर कीया गया अोर कीस तरहा पलानके साथ दलीत से बत्तर बनाया गयाहे इस की मालुमात उनतक पोहचाना अोर अपने समाजके पर्ती अवाज बुंद करने का होसला पेदा करना हे*

👉🏻 *BMAM आरक्षण मुहीम मे जागरुत युवअो को सबसे पेहले वोटसअोप, अोर फेशबुक मे जोरेंगे अोर इसबात की चरचा करते हुये इसको गांव गांव सहर सहर ले जाकर इस मुहीम को आगे बरहाने की कोसीस लगातार करते रहेंगे* इन्साअल्लाह

💪🏻 *🌙 भारतीय मुस्लिम आरक्षण मोर्चा 🌙 इस मुहीम  मे हमे जानकार अोर समजदार ,जागरुत, अोर कायदे कानुन के जानकार अोर संवीधान  कानुन के अभीयासी लोगो की सखत जरुरत हे जो साथी ये चाहते हे के मुस्लिम समाजको आरक्षण मिले अोर मुस्लिम समाज मुत्तहुिद हो अोर मुस्लिम समाजकी छोतीबरी मदत करने का काम या ज्जबा रखते हे अेसे साथी इसके बारे मे ज‍गरुत्ता रखते हे वो इस मुहीम मे जलद से जलद जुर जाये अोर अपने मुस्लिम समाजको बेदार करने अोर समाजके लीये अवाज बुंद करने मे अपना रोल पै करे अोर फर्ज अदा करे*

*हमे जरुरत हे मुस्लिम वकिलकी, पोर्फेसरकी, इसकोलरकी,दीनी अोर कायदे कानुन के मालुमात रखने वाले अोर अभियास करने वाले जीम्मेदार लोगो की,*

⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩⏩

👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇🏼👇👇

*इस मुहीम को आगे बरहाने के लीये हमे आपके साथ अोर सहकार की बहोत जरुत हे इसके लीेये सब से पेहले
हम वोटसआोप मे इसको आगे बरहाने की कोसीस करेंगे जिस्मे आप अपना रोलपै करे समाज पर्ती अपना फर्ज अदाकरे*

👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆🏼👆👆

*BMAM आरक्षण मुहीम* नाम से गुरुप बनाया हे *मुहीम* मे आप सामील हो सकते हे

जीसके लीये आप को नीचे दीये नंबर पर अपना नंबर अोर पता देना रहेगा ,

🗓14/02/17 मंगलवार  टा‍इम:-11:00am
*आयोजक*
*हुजैफा पटेल*
🌙 *भारतीय मुस्लिम आरक्षण मोर्चा* 🌙
*गुजरात भरुच*
वोटसअोप के लीेये संपर्क करे 👉*9898335767*

Wednesday, 8 February 2017

मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी का राजनीतिक अर्थशास्त्र

Date :- 06/02/17 taim 12:00am

मोदी सरकार द्वारा नोटबन्दी का राजनीतिक अर्थशास्त्र

शिशिर
📱इस दस्‍तावेज का ऑनलाइन लिंक - http://dishasandhaan.in/archives/1584

👇पूरा टेक्‍सट नीचे दिया है👇

8 नवम्बर की आधी रात से मोदी सरकार ने अपने अचानक लिये फ़ैसले में 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों का प्रचलन बन्द करने का एेलान किया। यह एेलान नोटों के प्रचलन के बन्द होने के मात्र 4 घण्टे पहले किया गया। इसके बाद से पूरे देश में जो अफ़रा-तफ़री मची वह अभी तक जारी है। इस तानाशाहाना फ़रमान के बाद से मोदी सरकार ने नोटबन्दी के ही विषय में कई सर्कुलर जारी किये हैं, जिन्होंने इस अफ़रा-तफ़री को बढ़ावा ही दिया है। मसलन, पुराने नोटों को बदलने की सीमा को घटाते जाने और साप्ताहिक नक़द निकासी पर सीमा निर्धारित करना आदि। अपने इस फ़रमान को सही ठहराने के लिए मोदी सरकार ने जो तर्क पेश किये वे इस प्रकार थे : इस प्रकार अचानक नोटबन्दी से काले धन की अर्थव्यवस्था पर एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गयी है; नक़ली नोटों का लेन-देन इस नोटबन्दी की वजह से बन्द हो जायेेगा; चूँकि नक़ली नोटों का प्रयोग आतंकवाद समेत तमाम किस्म की आपराधिक गतिविधियों में होता है, इसलिए इन गतिविधियों को चलाने वाले संगठनों/व्यक्तियों के वित्त की भी कमर टूट जायेेगी; जो काला धन लौटकर सरकार के पास आयेगा उससे सरकार अवसंरचना का विकास करेगी जिससे कि निवेश बढ़ेगा और रोज़गार पैदा होंगे। ये सरकार के दावे थे। अभी हम उन अफ़वाहों की बात नहीं कर रहे हैं जो कि फ़ासीवादी मोदी सरकार के तलवे चाटने वाले कॉरपोरेट मीडिया ने नोटबन्दी के बाद फैलायी। मसलन, एक अग्रणी समाचार चैनल ‘आज तक’ ने इस विषय पर एक घण्टे का कार्यक्रम पेश किया कि नये नोटों में कोई चिप लगा हुआ है, जिससे सभी नोटों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से ट्रैक किया जा सकेगा। वैसे तो ऐसी अफ़वाहों और झूठी ख़बरों के लिए इन चैनलों पर मुक़दमा किया जाना चाहिए क्यों‍कि जनता को गुमराह करके ये मीडिया की बुनियादी नैतिकता और निष्पक्षता के उसूलों का उल्लंघन कर रहे हैं। लेकिन यहाँ हम केवल सरकार के दावों और हक़ीक़त पर अपनी बात केन्द्रित करेंगे और इस प्रक्रिया में दिखलाने का प्रयास करेंगे कि नोटबन्दी के राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्या मायने हैं। नोटबन्दी भारतीय इतिहास में पहली बार नहीं की गयी है। इससे पहले 1946 में सरकार ने 1000 और 10000 के नोटों का प्रचलन बन्द किया था। और उसके बाद मोरारजी देसाई की सरकार ने जनवरी 1978 में 1000, 5000 और 10000 के नोटों पर पाबन्दी लगायी थी। लेकिन उस समय और आज की नोटबन्दी में एक फ़र्क़ है। पहले जो नोटबन्दी हुई थी, उसमें वे नोट बन्द हुए थे जिन्हें आमतौर पर 80 फ़ीसदी जनता कभी देखती भी नहीं है, या कम-से-कम छू तो कभी नहीं पाती। 1946 में 1000 रुपये एक बहुत बड़ी रक़म थी जिसे देश के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग कभी देखते भी नहीं थे। 1978 में 1000 रुपये से आप जो कुछ ख़रीद सकते थे, उसे ख़रीदने के लिए आपको आज 25000 रुपयों की आवश्यकता होगी। ज़ाहिर है, आज अगर 25,000 रुपये का कोई नोट होता तो वह धन्नासेठों की तिजोरियों में ही पाया जाता क्योंकि देश की 77 फ़ीसदी आबादी की पारिवारिक मासिक आय 5000 रुपये से कम बैठती है। ऐसे में, 1978 में हुई नोटबन्दी या 1946 में हुई नोटबन्दी से आम मेहनतकश अवाम और मध्यवर्ग के निम्नवर्ती संस्तरों पर कोई विशेष असर नहीं पड़ा था। 1978 में रिज़र्व बैंक के गवर्नर आई. जी. पटेल ने तभी कहा था कि ”इस प्रकार की कवायद से बिरले ही कोई नतीजा निकलता है…क्योंकि जिनके पास काला धन होता है वे इसे नक़द में नहीं रखते। यह सोचना नादानी है कि जिनके पास काला धन होता है वे उसे नोटों के रूप में सूटकेसों या गिलाफ़ों में ठूँसकर रखते हैं।” आगे हम काले धन की इस अवधारणा की चीर-फाड़ करेंगे जिसे कि पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों ने समाज में हावी बना रखा है।

लेकिन 2016 में 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को बन्द करने से इन वर्गों के जीवन पर गहरा नकारात्मक असर पड़ा है। परिचलन में मौजूद कुल मूल्य का 86 प्रतिशत और नोटों की संख्या के अनुसार क़रीब 25 प्रतिशत नोट 500 और 1000 के थे। मज़दूर वर्ग और मध्य वर्ग की बहुसंख्यक आबादी की वेतन, मज़दूरी या आमदनी और साथ ही उनकी थोड़ी-बहुत बचत मुख्य रूप से इन्हीं नोटों के रूप में थी। सरकार ने यह नोटबन्दी करने से पहले कोई आर्थिक चिन्तन या विश्लेषण नहीं किया है, इसका प्रमाण यह है कि सरकार अभी तक परिचलन से हटाये गये नोटों का आधा हिस्सा भी अर्थव्यवस्था में वापस नहीं डाल पायी है, जिससे कि नक़दी के अभाव की समस्या विकराल रूप में बनी हुई है। वास्तव में, ऐसा सम्भव ही नहीं था क्योंकि मोदी सरकार ने 8 नवम्बर को 22 अरब नोटों को यानी कुल नोटों के 25 प्रतिशत को परिचलन से हटाया था। यदि सरकार के सभी नोट छापने वाले प्रेस अन्य सभी नोटों को छापना बन्द करके केवल नये 2000 और 500 के नोटों को छापें तो 86 प्रतिशत मूल्य परिचलन की कमी और 25 प्रतिशत नोटों की कमी को पूरा करने में एक वर्ष का समय लगेगा। मोदी सरकार का दावा था कि वह इस फ़ैसले पर लम्बे समय से विचार कर रही थी लेकिन उसने इसे गोपनीय रखा था ताकि जिन लोगों के पास ”काला धन” है वे उसे ठिकाने न लगा पायें। यह तर्क मज़ाकि़या है क्योंकि मोदी सरकार यदि वाक़ई ऐसे लोगों को पकड़ना चा‍हती थी तो उसे नोटबन्दी का एेलान करने के बाद कुछेक महीनों की मोहलत देनी चाहिए थी और उसके बाद अपने कर विभाग व आर्थिक चौकसी के लिए जि़म्मेदार विभागों को निर्देश देना चाहिए था कि वह प्रॉपर्टी, सोने, जवाहरात आदि की ख़रीद पर निगाह रखे। ज़ाहिर है, ऐसे सभी काले धन के स्वामी आनन-फ़ानन में अपने काले धन को समृद्धि के अन्य रूपों में बदलते और फिर उन्हें एक प्रभावी और सक्षम कर प्रशासन द्वारा पकड़ा जा सकता था। लेकिन मूल बात यह है ही नहीं।

मूल बात यह है कि काले धन की जिस अवधारणा के चलते कुछ लोगों में मोदी सरकार की दलील शुरुआती दौर में असरदार हुई थी कि नोटबन्दी से काले धन पर फ़र्क़ पड़ेगा, वह अवधारणा ही बुरी तरह से ग़लत है। अव्वलन तो काले धन और सफ़ेद धन के बीच का बँटवारा ही ग़लत है। यह शुरू से ही ग़लत था लेकिन वित्तीय सट्टेबाज़ पूँजी के युग में तो यह एकदम मज़ाकि़या है। लेकिन अभी हम केवल काले धन के बारे में और उसके बारे में प्रचलित अवधारणा के बारे में बात करते हैं।

काला धन बोरियों, तकिये के गिलाफ़ों, रज़ाइयों, दीवानों और अलमारियों के छिपाया हुआ या ज़मीन में दबाया हुआ धन नहीं होता है। बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि काला धन बैंकों में जमा नहीं होता। यह भी ग़लत है। काला धन हर व्यावहारिक मसले में सफ़ेद धन के समान ही होता है। इसे मरकूरी अवदेविच के समान लोग तकियों में छिपाकर नहीं रखते और न ही समुद्री लुटेरों की तरह किसी द्वीप में ज़मीन के नीचे छिपाकर रखते हैं। यह काला धन किसी भी धन की तरह लोग लगातार निवेश करते हैं। वे उसे अचल सम्पत्ति (रियल एस्टेट), शेयरों, सोने-चाँदी या जवाहरात आदि में लगाते हैं, उससे विदेशी मुद्रा ख़रीदते हैं और हवाला के रास्ते उसे विदेशी बैंकों में जमा करते हैं, तमाम कर चोरी के लिए उपयुक्त देशों में फ़र्ज़ी कम्पनियों में लगाते हैं, और अन्य तमाम प्रकार की आर्थिक गतिविधियों में लगाते हैं। प्रभात पटनायक ने इस मामले में बिल्कुल सही कहा है कि काले धन के स्वामी भी वास्तव में पूँजीपति ही हैं जो अपनी पूँजी को मूल्य संवर्धन के लिए सतत निवेश करते रहते हैं। मार्क्स के शब्दों में वे कंजूस नहीं हैं, बल्कि तार्किक कंजूस हैं। पूँजीपति एक तार्किक कंजूस होता है और कंजूस एक ऐसा पूँजीपति होता है जो कि पागल हो चुका होता है। इसलिए काले धन का अर्थ नोटों के छिपे हुए भण्डार नहीं होते, बल्कि वे तमाम आर्थिक गतिविधियाँ होती हैं, जिनके बारे में सरकारी एजेंसियों और कर प्रशासन के अधिकारियों को रिपोर्ट नहीं की जाती। रिश्वतखोरी वग़ैरह इसका बहुत ही छोटा हिस्सा होती है। मुख्य तौर पर, काले धन के ये लेन-देन बहुत ही सुनियोजित और संगठित रूप से तमाम पूँजीपति, कम्पनियाँ, बड़े दुकानदार आदि करते हैं। इनमें मुख्य तौर पर ये गतिविधियाँ होती हैं : ओवर-इनवॉ‍इसिंग/अण्डर इनवॉसिंग, बिकवाली के मूल्य को कम करके रिपोर्ट करना, लागत को ज़्यादा करके दिखाना, ग़लत या ऐसे लेन-देन को दिखाना जो कि हुए ही नहीं हैं और हर प्रकार की आपराधिक गतिविधियाँ जैसे स्मगलिंग, ड्रग्स व्यापार आदि। मिसाल के तौर पर, यदि किसी कम्पनी को खनिज या तेल निकालने का ठेका मिला है और वह ज़्यादा खनिज या तेल निकालकर उसके उत्पादन को लेखांकन में कम दिखलाये और इस तरीक़े से अपनी देनदारियों (तमाम प्रकार के कर आदि) को कम करके दिखाये तो यह काला धन पैदा करने वाली आर्थिक गतिविधि की श्रेणी में आयेगा। यह काम तो दुनिया भर में सारे बड़े कॉरपोरेट घराने करते हैं। इनमें से भी बहुत से लेन-देन के लिए वस्तुत: नक़दी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। इस विषय पर आगे आयेंगे कि यह एक भ्रामक धारणा है कि भ्रष्टाचार और काले धन के लिए नक़दी की ही आवश्यकता पड़ती है। जो भी हो, काला धन वास्तव में नक़दी के भण्डारों के रूप में नहीं होता है। अगर आँकड़ों की बात करें तो देश में काले धन की कुल अर्थव्यवस्था का मात्र 6 प्रतिशत ही नक़द के रूप में है, बाक़ी काला धन विदेशी बैंकों व कर चोरी के अड्डों में रखा गया है (वहाँ भी वह लगातार परिचलन में है), रियल एस्टेट में, सोने-जवाहरात में और शेयरों/बाण्ड्स आदि में रूपान्तरित करके रखा गया है। काले धन को शेयरों या बॉण्ड्स में रूपान्तरित करना तो सबसे आसान है और सरकार ने स्वयं इसके लिए उपयुक्त वित्तीय उपकरण मुहैया करा रखा है : पार्टिसिपेटरी नोट्स। यह एक ऐसा वित्तीय उपकरण है जिसके ज़रिये शेयर/बॉण्ड्स आदि की ख़रीद करने वाला व्यक्ति अपनी पहचान को छिपाकर रख सकता है। यूपीए के दोनों कार्यकालों में इन पार्टिसिपेटरी नोट्स पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग उठायी गयी थी और मोदी सरकार के कार्यकाल में भी ऐसी माँगें उठती रही हैं। लेकिन इन दोनों ही सरकारों ने इस पर प्रतिबन्ध न लगाकर काले धन की अर्थव्यवस्था को ख़त्म करने के प्रति अपनी कटिबद्धता को पहले ही जता दिया था।

इसलिए काला धन किसी भी अन्य प्रकार का धन है जिसे ग़ैर-क़ानूनी और अप्रेतिवेदित आर्थिक क्रियाकलाप द्वारा अर्जित किया जाता है और इसे अर्जित करके बोरों और अलमारियों में नहीं रखा जाता है, बल्कि इससे सतत निवेशित किया जाता है ताकि इस पूँजी का मूल्य-संवर्धन किया जा सके। यदि मार्क्स के शब्दों में कोई पूँजीपति, यानी तार्किक कंजूस, पागल होकर ठेठ कंजूस में तब्दील हो जायेे, तो उसके धन के ढेर का कुछ महीनों या ज़्यादा से ज़्यादा कुछ वर्षों के बाद ही वह मूल्य नहीं रह जायेेगा जो कि उसका आरम्भ में था। इसलिए कोई भी काले धन का स्वामी अपने सभी आर्थिक क्रियाकलापों में किसी भी अन्य पूँजीपति के समान होता है और अपने इस धन को लगातार निवेशित करता रहता है। इसलिए काले धन को पकड़ने के लिए नोटबन्दी किसी भी रूप में प्रभावी नहीं होने वाली थी। जिसे काला धन कहा जाता है, यदि सरकार उसे पकड़ना ही चाहती थी तो उसे अपना यह वायदा पूरा करना चाहिए था कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वह वापस लाती। अब सरकार के पास स्विस बैंकों व टैक्स हैवेन्स में काला धन रखने वालों की सूची भी है और वह चाहे तो उन पर कार्रवाई कर सकती है, मगर मोदी सरकार ने इन खाताधारकों के नाम उजागर करने तक से इंकार कर दिया है। साथ ही, मोदी सरकार को काले धन की अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण करना ही था, तो उसे कर प्रशासन में तमाम ऐसे सुधार करने चाहिए थे जो कि कर चोरी रोकने को सम्भव बना पाता। अगर मोदी सरकार वास्तव में काले धन की अर्थव्यवस्था को लेकर संजीदा होती तो उसे चुनावी पार्टियों के चन्दे व अन्य लेन-देन को सूचना अधिकार के तहत लाना चाहिए था। लेकिन इसकी बजाय मोदी सरकार ने क्या किया? मोदी सरकार ने कॉरपोरेट घरानों के 1.14 लाख करोड़ रुपये की बैंक देनदारी माफ़ कर दी। साथ ही, लाखों-करोड़ों रुपये की कर देनदारी भी माफ़ कर दी। इसके अलावा, सबसे बड़े करचोर और बैंकों का पैसा गबन करने वाले विजय माल्या को बड़ी ही सुगमता से देश से भागने की इजाज़त दे दी गयी। पार्टिसिपेटरी नोट्स को बढ़ावा देकर शेयर बाज़ार में काले धन की अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा दिया गया। स्पष्ट है, कि काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक एक और जुमला था। कुछ आँकड़ों पर नज़र डालें तो भी यह बात साफ़ हो जाती है कि नोटबन्दी का असली लक्ष्य काले धन की अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण पाना था ही नहीं। क्योंकि नोटबन्दी से काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था पर कोई विशेष असर नहीं पड़ने वाला है।

देश में काले धन की अर्थव्यवस्था का आकार क्या है? अलग-अलग स्रोतों के अनुसार इसका आकार सकल घरेलू उत्पाद के 25 प्रतिशत से लेकर 75 प्रतिशत तक है। एक निजी शोध समूह ऐम्बिट कैपिटल रिसर्च के अनुसार यह 25 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त व नीति संस्थान के अनुसार यह 75 प्रतिशत है। देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का सुचारू रूप से विनिमय हो सके इसके लिए उसमें कितना नक़दी मौजूद है? कुल मौजूद नक़दी सकल घरेलू उत्पाद का 12 प्रतिशत है जो कि सतत विनिमय के लिए पर्याप्त है। इस कुल नक़दी का 86.2 प्रतिशत 500 और 1000 रुपये के नोटों के रूप में था। अब यदि हम मानते हैं कि काले धन की अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद का 25 से 75 फ़ीसदी है, और सकल घरेलू उत्पाद का 12 प्रतिशत नक़दी के रूप में है, और नक़दी का 86 प्रतिशत 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों के रूप में था, तो स्पष्ट है कि 500 और 1000 रुपये के नोटों को बन्द करने से नक़दी में मौजूद काले धन पर ही असर पड़ सकता है जो कि कुल काले धन का मात्र 2.3 से 5.2 प्रतिशत तक हुआ। दूसरी बात यह कि यह काला धन भी तभी पकड़ा जायेेगा, जबकि इसके स्वामी बेहद नादान और मूर्ख हों। नोटबन्दी के बाद के दो महीनों में यह तो स्पष्ट हो गया है कि काले धन की अर्थव्यवस्था के बड़े खिलाड़ी इसमें कहीं भी हत्थे नहीं चढ़ने वाले क्योंकि उनका काला धन नक़दी में है ही नहीं। दूसरी बात यह कि छोटे और मध्यवर्ती आकार के खिलाडि़यों ने भी अपने नक़दी में रखे काले धन को ठिकाने लगाने के तरीक़े तुरन्त ही निकाल लिये। गुजरात के व्यापारियों ने तो अपनी नक़दी को 8 नवम्बर की रात ही बड़े पैमाने पर ज्यूलरी में तब्दील कर लिया था। और बाद में भी अवैध कारख़ानों के मालिकों, दुकानों के मालिकों ने अपने कारिन्दों, मज़दूरों को बैंकों की लाइन में लगवाकर नोट बदले और अपने नौकरों, ड्राइवरों, मालियों आदि के खातों में पैसे डलवाकर बाद में उसे निकलवा लिया। कुछ मामलों में उन्होंने इसके लिए कुछ कमीशन भी दिया लेकिन ज़्यादातर मामलों में तो उन्हें यह ख़र्च भी नहीं उठाना पड़ा क्योंकि ऐसे छोटे उद्यमियों के यहाँ काम करने वाले ये मज़दूर आमतौर पर बेहद अरक्षित स्थिति में होते हैं, मालिकों पर निर्भर होते हैं और सौदेबाज़ी करने या कोई शर्त रखने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसलिए काले धन की अर्थव्यवस्था का जो बेहद मामूली सा हिस्सा नक़दी में है, उस पर भी नोटबन्दी से कोइ असर नहीं पड़ने वाला है। उल्टे इस नोटबन्दी से देश के आम ग़रीब लोगों की जि़न्दगी तबाह हो गयी है। इसका कारण यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक क्षेत्र का काफ़ी महत्व है। देश की कार्यशक्ति का क़रीब 85 फ़ीसदी अनौपचारिक क्षेत्र में नौकरी करता है या किसी न किसी रूप में उसकी आय अनौपचारिक क्षेत्र पर निर्भर करती है। सकल घरेलू उत्पाद का क़रीब 47 प्रतिशत हिस्सा इसी अनौपचारिक क्षेत्र से आता है। इस क्षेत्र में लगभग सभी लेन-देन नक़दी में होते हैं क्योंकि उनका आकार आमतौर पर छोटा ही होता है। इससे आमदनी पाने वाले लोगों का धन कोई काला धन नहीं होता है। उनकी आमदनी आमतौर पर इतनी छोटी होती है कि वह प्रत्यक्ष कर के दायरे में नहीं आती है और अप्रत्यक्ष कर के तमाम रूपों का भुगतान तो वे करते ही हैं। ऐसे में, उनकी छोटी-सी आमदनी और सम्भवत: छोटी-सी बचत कोई काला धन नहीं होती। लेकिन नोटबन्दी के बाद इनमें से ज़्यादातर के पास जो भी जमा धन था वह रद्दी काग़ज़ बन गये। दिहाड़ी मज़दूरों को दिहाड़ी नहीं मिल रही, कारख़ाना मज़दूरों को मज़दूरी नहीं मिल रही या फिर मालिक उन्हें पुराने नोटों में भुगतान करने का प्रयास कर रहा है। और इनमें से अधिकांश के पास कोई बैंक खाता नहीं है। ऐसे में वे कुछ नहीं कर सकते। तमाम औद्योगिक केन्द्रों में कारख़ाने बन्द हो रहे हैं और मज़दूर गाँव लौट रहे हैं। जो मज़दूर लौट नहीं रहे हैं, उन्होंने अपनी ख़रीद में बेहद कमी कर दी है और वे नोट बचाकर रख रहे हैं। इससे मज़दूर इलाक़ों के छोटे व्यापा‍री और दुकानदार भी तबाह हो रहे हैं क्योंकि ख़रीद न होने के कारण और कुल उपभोग में कमी आने के कारण उनके पास भी नक़दी नहीं आ रही कि वे बड़ी थोक मण्डियों से माल ले सकें। नतीजतन, बड़ी थोक मण्डियों में भी माल पटा पड़ा सड़ रहा है। दिल्ली की सब्ज़ी मण्डी व फल मण्डी इसका उदाहरण है। फ़सल मण्डियों में जो ख़रीफ़ की फ़सल कटकर पहुँची उसे ख़रीदार नहीं मिल रहे हैं क्योंकि भुगतान के लिए नक़दी ही नहीं है।

जो मज़दूर गाँव लौट रहे हैं उन्हें गाँव में भी नोटबन्दी के कहर से कोई राहत नहीं है। किसानों और विशेषकर ग़रीब किसानों की स्थिति सबसे बुरी है। जब नोटबन्दी का फ़ैसला मोदी सरकार ने सुनाया तो उस समय ख़रीफ़ की फ़सल की कटाई का वक़्त आ रहा था और रबी की बुआई की तैयारी होनी थी। लेकिन ये दोनों कार्य ही बाधित हो गये हैं। किसानों की बहुसंख्या की पहुँच बैंकों तक नहीं है। बैंकों को गाँवों-गाँवों में पहुँचाने की लम्बी-चौड़ी बातों के बावजूद मोदी सरकार (और उसके पहले की सरकारों की) नवउदारवादी नीतियों के कारण बैंकों तक ग़रीब किसान आबादी की प्रत्यक्ष पहुँच कम होती गयी है। भारतीय राज्यसत्ता की पुरानी नीति थी कि किसानों को ऋण देने को प्राथमिकता श्रेणी में रखा जायेेगा और इसके लिए सभी निजी बैंकों व सरकारी बैंकों के लिए ऋण की एक न्यूनतम सीमा तय की गयी थी जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को दिया जायेेगा। लेकिन सभी निजी बैंक इसका खुले तौर पर उल्लंघन करते हैं और सरकारी बैंकों ने भी इस विनियमन से बचने के कई रास्ते निकाल लिये हैं। मिसाल के तौर पर, एग्रो आधारित व सम्बन्धित क्षेत्र की कम्पनियों को अपने बीज या उर्वरक के कारख़ानों या अन्य प्रकार के निवेशों के लिए भारी-भरकम ऋण दिये जाते हैं और इसे भी उस प्राथमिकता सेगमेण्ट में दर्ज कर दिया जाता है। निजी से लेकर सरकारी बैंकों तक ने पब्लिक सेक्टर पूँजीवाद के पतन के बाद से बड़ी संख्या में किसानों के साथ लेन-देन करने में असमर्थता ज़ाहिर कर दी है और वे तमाम प्रकार के मध्यस्थों, यानी, सूदखोरों के ज़रिये किसानों तक ऋण की पहुँच बनाने के हामी हो गये हैं। नतीजतन, बैंकों और अन्य प्रकार के खातों की जितनी पहुँच आज से तीस वर्ष पहले सीधे किसानों तक थी, आज वह भी नहीं है और सरकारी से लेकर निजी बैंक तक तमाम प्रकार के निजी व्यक्तियों (सूदखोरों और मध्यस्थों) के ज़रिये अपना काम करते हैं। नतीजतन, एक बड़ी किसान आबादी सीधे-सीधे नक़द प्राप्ति के लिए इन मध्यस्थों पर निर्भर है। यही कारण था कि रबी की बुआई के लिए बीजों व अन्य चीज़ों की ख़रीद तक करने में किसानों को भारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा है। इस तरह हम देख सकते हैं कि मोदी सरकार के नोटबन्दी के क़दम ने वास्तव में काले धन की अर्थव्यवस्था पर कोई ख़ास असर नहीं डाला, लेकिन आम ग़रीब मेहनतकश अवाम के जीवन को नर्क बना दिया। यहाँ तक कि शहरी मध्यवर्ग का भी एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा इससे बेहद परेशान हुआ है। जब यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आ गयी तो फिर मोदी सरकार और उसके तलवे चाटने वाला कॉरपोरेट मीडिया दूसरी बीन बजाने लगा है। अब वह कह रहा है कि नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा रहा है, जिससे कि लोगों को डिजिटल दुनिया में जीने के सारे फ़ायदे मिलेंगे और साथ ही भविष्य में भ्रष्टाचार होने के कारण ही ख़त्म हो जायेेंगे। पहली बात तो यह है कि भ्रष्टाचार और काले धन का नक़दी पर निर्भरता का सिद्धान्त ही मूर्खतापूर्ण है। अब हम मोदी सरकार के इस दावे पर आते हैं कि नोटबन्दी के ज़रिये नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था पैदा हो सकती है। सच है कि आबादी का ऊपर का छोटा-सा अमीर और खाता-पीता मध्यवर्ग और विशेष कर शहरों में, नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था के कुछ लाभ उठा सकता है क्योंकि उसके पास क्रेडिट कार्ड और इण्टरनेट की सुविधा है। मगर आबादी का बड़ा हिस्सा इस नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था का कोई लाभ नहीं उठा सकता है। इसके कारण समझने के लिए हमें समझना होगा कि नक़दी मुद्रा आख़िर क्या होती है। नक़दी मुद्रा और कुछ नहीं बल्कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया पर धारक का एक दावा होता है। नक़दी के रूप मे दावा केवल रिज़र्व बैंक के ऊपर होता है क्योंकि भारत में सभी नक़दी दावों के लिए केवल रिज़र्व बैंक ही जि़म्मेदार होता है। अन्य बैंक केवल नक़दी-रहित दावों या ग़ैर-करेंसी डिपॉजिट को सँभालते हैं, यानी वे दावों को एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर स्थानान्तरित करने का काम करते हैं। जहाँ भी ये दावे नक़दी के रूप में वास्तवीकृत होते हैं, वहाँ यह दावा वास्तव में रिज़र्व बैंक के ऊपर स्थानान्तरित हो जाता है। यानी जब हम नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो इसका अर्थ होता है दावों को रोकने और फिर रिज़र्व बैंक पर स्थानान्तरित करने की बजाय, हम इन दावों को साधारण बैंकों पर स्थानान्तरित करते हैं। मिसाल के तौर पर, अगर कोई चेक के ज़रिये आपके खाते में पैसा डाल रहा है तो वह बैंक के ऊपर अपने दावे को आपको स्थानान्तरित कर रहा है; दूसरे शब्दों में वह अपनी लेनदारी आपको दे रहा है। आप अपनी ले‍नदारी किसी अन्य पक्ष को स्थानान्तरित करके तमाम उत्पादों अथवा सेवाओं के लिए भुगतान कर सकते हैं। नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था का अर्थ यह हुआ कि सारे आर्थिक विनिमय (उत्पादों अथवा सेवाओं, अथवा शुल्कों, करों, बिलों आदि के लिए भुगतान) अब साधारण बैंकों पर अपने दावों/ले‍नदारियों को स्थानान्तरित करके किये जायेेंगे। साधारण बैंकों पर आपके दावे या ले‍नदारी दो प्रकार की हो सकती है। पहला है ऋण अथवा क्रेडिट के रूप में, यानी बैंक आपको पहले से जमा किसी राशि के बिना ही आपको ख़र्च करने के लिए एक राशि ऋण के तौर पर देता है, मसलन क्रेडिट कार्ड के रूप में। दूसरा है जब आप चेक अथवा किसी अन्य माध्यम से अपने खाते में कोई राशि डालते हैं तब उतनी राशि का आपका दावा/लेनदारी बैंक पर बनती है। अब अगर सरकार यह उम्मीद करती है कि देश में सारे आर्थिक क्रिया व्यापार इन दो प्रकार के दावों के एक से दूसरे पक्ष को स्थानान्तरण के ज़रिये हो तो इसके लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। आबादी की भारी बहुसंख्या क्रेडिट हेतु विश्वसनीयता की श्रेणी में आनी चाहिए; दूसरे शब्दों में, उसके पास पर्याप्त धन होना चाहिए, उसके खाते में पर्याप्त राशि में नियमित रूप से आना-जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो आपको ऋण हेतु अच्छा पात्र नहीं माना जायेेगा और बैंक के लिए आपको क्रेडिट कार्ड हेतु उपयुक्त नहीं माना जायेेगा। यह सच है कि शहरी खाते-पीते मध्य वर्ग के पीछे बैंक आज क्रेडिट कार्ड देने के लिए भाग रहे हैं, ताकि उपभोग बढ़े और पूँजीवादी व्यवस्था का संकट कुछ निपटे और साथ ही वित्तीय संस्थान सूद के ज़रिये अच्छी कमाई कर सकें। संकट से पैदा हुई हताशा में बैंक कई बार अच्छा क्रेडिट इतिहास न रखने वाले शहरी मध्यवर्ग को भी क्रेडिट कार्ड दे देता है। लेकिन यह एक विच्युति के तौर पर होता है। जब भी यह नियम के तौर पर होगा तो अन्तत: उसका नतीजा कुछ वैसा ही होगा जैसा कि अमेरिका में सबप्राइम संकट में हुआ था। इसलिए आमतौर पर क्रेडिट के रूप में लेनदारी के लिए आबादी का मुश्किल से 10 से 12 फ़ीसदी हिस्सा ही योग्य है। ऐसे में, भारत की 90 फ़ीसदी आबादी का पहले किस्म की यानी क्रेडिट के रूप में बैंकों पर कोई ले‍नदारी/दावा नहीं बनेगा और जब दावा बनेगा ही नहीं तो उसको स्थानान्तरित करके कोई आर्थिक विनिमय कर पाने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। दूसरे प्रकार के दावों यानी कि खातों में पहले से जमा राशि के स्थानान्तरण के ज़रिये सारी आबादी अपना आर्थिक क्रिया-व्यापार के लिए यह ज़रूरी है कि सभी के पास बैंक खाते हों। भारत में मुश्किल से एक-तिहाई आबादी के पास बैंक खाते हैं। ऐसे में, यह कल्पना करना कि सारी आबादी इन नक़दी-रहित दावों को साधारण बैंकों के ज़रिये स्थानान्तरित करके अपने तमाम आर्थिक विनिमय करेंगे, एक शेखचिल्ली का सपना है। इस तरीक़े से हम देख सकते हैं कि मोदी सरकार द्वारा नक़दी-रहित अर्थव्यवस्था के लिए मचाया जा रहा हल्ला बेकार है और जनता को मूर्ख बनाने की एक चाल है। फिर सवाल उठता है कि नोटबन्दी का क़दम मोदी सरकार ने क्यों उठाया है और इससे किसे लाभ हुआ है। पहली बात तो यह है कि यह मुख्य तौर पर एक राजनीतिक क़दम है। मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान दावा किया था कि वह स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लायेगा और सभी भारतीयों के खाते में 15 लाख रुपये डाले जायेेंगे। इसी प्रकार भ्रष्टाचार के अन्य रूपों पर रोकथाम के लिए भी मोदी ने बड़े-बड़े दावे किये थे। जैसा कि हमने पहले बताया कि बुर्जुआ दायरे के भीतर भी अगर कोई सरकार भ्रष्टाचार और काले धन की अर्थव्यवस्था पर लगाम लगाना चाहेगी तो जो कार्य वह सबसे पहले करेगी वह है करचोरी के अड्डों से और स्विस बैंकों में जमा धन को वापस लाना, करचोरी करने वाले कॉरपोरेट डिफॉल्टर्स पर कार्रवाई करना और पार्टिसिपेटरी नोट्स पर रोक लगाना। लेकिन चूँकि मोदी सरकार इन सारे कामों को करने का कोई इरादा नहीं रखती और अपने तमाम अन्य वायदों पर भी वह बुरी तरह नाकाम हुई है, इसलिए उसने एक राजनीतिक स्टण्ट किया है जिससे कि लोगों का ध्यान बढ़ती महँगाई, भाजपाइयों के भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी से हट जायेे। मोदी की छवि एक ताक़तवर नेता की बन सके जो कि परिणामों की परवाह किये बिना मज़बूत क़दम उठाने का साहस रखता है। यह बात कि यह क़दम किस क़दर जनविरोधी और मूर्खतापूर्ण है, इस पर कॉरपोरेट मीडिया के मोदी-समर्थक शोर में कोई ध्यान नहीं देगा। लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं रहा है। जनता में इसके ख़ि‍लाफ़ माहौल बना हुआ है और आने वाले समय में मोदी सरकार को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में भाजपा की हार तय थी। यह क़दम इसलिए भी उठाया गया कि इसके ज़रिये एक ओर मोदी और भाजपा की छवि सँवारी जा सके और दूसरी ओर अपने राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों को शिकस्त दी जा सके। अब यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस नोटबन्दी में भी एक बड़ा घोटाला हुआ है। भाजपा नेताओं और भाजपा की क्षेत्रीय इकाइयों को पहले से ही इस फ़ैसले की सूचना दे दी गयी थी जिसके बाद भाजपा‍इयों ने बड़े पैमाने पर अपने काले धन को सफ़ेद किया। बैंकों में भारी राशियाँ जमा की गयीं, ज़मीनें ख़रीदी गयीं, चुनाव प्रचार के लिए गाडि़याँ आदि ख़रीदी गयीं। वहीं दूसरे विपक्षी दल अपने काले धन के भण्डार को ठिकाने नहीं लगा सके। बाद में, शासक वर्ग की तमाम चुनावी पार्टियों ने भाजपा के इस क़दम पर काफ़ी शोर मचाया।

एक अन्य मंशा जो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार की थी वह था खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बड़ी पूँजी को फ़ायदा पहुँचाना और खाते-पीते मध्यवर्ग के उपभोग के स्तर को बढ़ाना। नोटबन्दी के बाद से शहरों में मध्यवर्ग का वह हिस्सा जो क्रेडिट कार्ड आदि रखता है, मगर रोज़मर्रा की ज़रूरत की तमाम चीज़ें सामान्य परचून की दुकानों से ख़रीदता था, वह भी अब इन सामानों के लिए बड़ी खुदरा व्यापार कम्पनियों की दुकानों जैसे रिलायंस रीटेल, नाइन-इलेवेन, बिग बाज़ार, फे़यर प्राइस आदि से ख़रीद रहा है। इससे इन कम्पनियों को भारी फ़ायदा पहुँचा है क्योंकि प‍हले भी इनके पास खाते-पीते मध्य वर्ग के ग्राहक ही आते थे, और अब उनका कहीं ज़्यादा बड़ा हिस्सा इन दुकानों से ख़रीदारी कर रहा है जिन पर कार्ड से भुगतान हो सकता है। वहीं दूसरी ओर कार्ड से भुगतान यदि बाध्यता हो तो आप छोटी ख़रीद नहीं कर सकते। ऐसे में, लोग अपनी ज़रूरत से ज़्यादा सामान भी ख़रीद रहे हैं। ऐसे में, एक ओर बड़ी पूँजी की इज़ारेदारी खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बढ़ेगी और छोटे व्यापारी और दुकानदार साफ़ होंगे। यही कारण है कि भाजपा के पारम्परिक समर्थक रहे छोटे और मँझोले व्यापारी नोटबन्दी पर काफ़ी छाती पीट रहे हैं। वहीं उपभोक्ता वर्ग (खाते-पीते मध्यवर्ग) के उपभोग का स्तर भी बढ़ेगा। इस रूप में नोटबन्दी ने बड़ी पूँजी काे किसी प्रकार का सीधा नुक़सान नहीं पहुँचाया है। निश्चित तौर पर, इसके दूरगामी प्रभाव के तौर पर जो आर्थिक दिक़्क़तें पैदा होंगी आगे उनका असर बड़ी पूँजी पर भी पड़ सकता है लेकिन तात्कालिक तौर पर उन्हें कोई विशेष हानि नहीं है और अगर कोई है तो भी इससे होने वाले फ़ायदे नुक़सान से बड़े हैं। ऐसे में, मोदी सरकार के इस क़दम का लाभ अमीरों और बड़ी पूँजी को होगा। लेकिन आम मेहनतकश अवाम पर इस क़दम का भारी नुक़सानदेह असर पड़ा है, जैसा कि हम ऊपर जि़क्र कर चुके हैं। लेकिन मोदी सरकार का यह क़दम उसके लिए नुक़सानदेह ही साबित होगा। शुरुआती दौर में सरकारी प्रचार और कॉरपोरेट मीडिया के शोर ने नोटबन्दी के पक्ष में जो माहौल बनाया था और जिस तरीक़े से कुछ दिनों की असुविधा के बदले काले धन से निजात का जो सपना दिखाया था, वह हर बीतते दिन के साथ फीका पड़ता जा रहा है। मोदी की प्रतिक्रियाओं में भाजपा की घबराहट को देखा जा सकता है। मोदी जिस प्रकार की ‘नी-जर्क’ प्रतिक्रियाएँ दे रहा है, उससे समझ में आ रहा है कि उसका आत्मविश्वास डगमगा गया है और वह अनसेटल हो चुका है। आत्मविश्वास अब केवल दिखावे के स्तर पर है। दूसरे भाजपा के ही अन्य नेताओं ने मोदी के लिए इस क़दम को वापस लेने के रास्ते बन्द कर दिये हैं। मिसाल के तौर पर, वेंकैया नायडू ने बयान दिया था, ”फ़ैसले वापस लेना मोदी जी के ख़ून में नहीं है।” उत्तर प्रदेश और पंजाब चुनावों में हार के ख़तरे को देखते हुए बीच में भाजपा ने चुनाव आयोग से चुनाव टालने की भी बात की थी। लेकिन तय है कि इस ग़लती की क़ीमत मोदी को चुकानी पड़ेगी। निराशा के माहौल में क्रान्तिकारियों में यह प्रवृत्ति होती है कि शासक वर्ग के हर क़दम के पीछे वे कोई बहुत ही युक्तिपूर्ण षड्यन्त्र या योजना तलाशते हैं। ऐसे में, कई बार उनका ध्यान इस बात पर नहीं जाता कि फ़ासीवादी शासक और आमतौर पर शासक वर्ग भी ग़लती करते हैं। मोदी का नोटबन्दी का क़दम ऐसी ही एक ग़लती है।

दिशा सन्धान – अंक 4  (जनवरी-मार्च 2017) में प्रकाशित

👊 व्‍हाटसएप्‍प व फेसबुक पर प्रगतिशील, क्रांतिकारी साहित्‍य, लेख आदि पाने के लिए 👊

📱क्‍या आपको व्‍हाटसएप्‍प व पर चाहिये - 9898335767
इस नंबर पर अपना पुरा नाम अोर पता भेजे

✒अनेक क्रांतिकारियों की रचनायें
🗞भारत व दुनिया के मजदूर वर्ग की हालात बयां करते व भविष्‍य की राह दिखाते लेख 
📝न्‍याय, समानता, मानवता के संघर्ष को आगे बढ़ाने की सामग्री
👉कोमव‍दी , फासीवादी/साम्‍प्रदायिक ताकतों का भण्‍डाफोड़ व उनसे लड़ने के रास्‍ते पर लेख

अगर लेख अच्छा लगा होतो कोमेंट जरुर करे


Sunday, 5 February 2017

भारत देश की अर्थव्यवस्था अोर संसद की बाते

*मोदी मण्डली के जन-कल्याण के हवाई दावे बनाम दौलत के असमान बँटवारे में तेज़ वृद्धि*
*तथाकथित देश भक्तों के दावों की हवा निकालते ताज़ा आँकड़े*

👇पूरा टेक्‍सट नीचे दिया है👇

पिछले दिनों महज़ बहसबाज़ी के अड्डे संसद में हवाई दावा करते हुए भारत के वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था की मोदी सरकार से पहले बहुत बुरी हालत थी, कि मोदी सरकार के दौरान अर्थव्यवस्था का बहुत विकास हुआ है, कि भारत की अर्थव्यवस्था अब एक मज़बूत अर्थव्यवस्था बन गयी है। मोदी मण्डली ज़ोर-शोर से प्रचार कर रही है कि अर्थव्यवस्था की “मज़बूती” से जनता की परिस्थितियाँ सुधारी हैं। दावे ये किये जा रहे हैं कि “देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है”। मोदी भक्त हर जगह यह काँव-काँव कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि देश तो बदल ही रहा है, आगे भी बढ़ रहा है – लेकिन आखि़र क्या बदला है, देश किस तरफ़ आगे बढ़ा है? आओ देखें।

मोदी सरकार के ढाई वर्षों के दौरान भारत के पूँजीवादी प्रबन्ध के गन्दे नाले से बहुत पानी बह चुका है। बहुत कुछ हमारे सामने है। लेकिन देश किस तरफ़ बदल रहा है, किधर आगे बढ़ रहा है, देश की अर्थव्यवस्था किस ढंग से विकसित हुई है, मज़बूत हुई है इसके लिए यहाँ सिर्फ़ एक ही पहलू देख लेना काफ़ी है। प्रश्न यह है कि देश में मेहनतकश जनता की मेहनत-मशक्कत से जो धन-दौलत पैदा हो रही है उसका बँटवारा किस तरह हो रहा है। हमें देखना होगा कि अमीरी-ग़रीबी की खाई और बड़ी हुई है या घटी है। आखि़र देश का मतलब तो मज़दूर-मेहनतकश हैं, उनकी हालत में क्या फ़र्क़ पड़ा है, यह देखना होगा।

अगर हम थोड़ी-सी भी समझ रखते हैं तो अपने चारों तरफ़ समाज में लगातार बढ़ रही आर्थिक असमानता को साफ़़ देख सकते हैं। आर्थिक पहलुओं के बारे में विभिन्न संस्थाएँ सर्वेक्षण करके रिपोर्टें भी जारी करती हैं जिनसे यह हक़ीक़त और भी स्पष्ट रूप में देखने में मदद मिलती है। पिछले दिनों एक अहम रिपोर्ट जारी हुई है। यह है क्रैडिट सुईस नाम की संस्था द्वारा जारी की गयी विश्व की अर्थव्यवस्था के बारे में रिपोर्ट (ग्लोबल वैल्थ रिपोर्ट)। इस रिपोर्ट में पूरे विश्व के देशों की अर्थव्यवस्था के आँकड़े हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक़ पूरे विश्व में अमीरी-ग़रीबी की खाई पिछले समय में और चौड़ी हुई है। इस रिपोर्ट में पेश अन्य देशों की अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी भी अहम है जिसके लिए अलग से लिखा जाना चाहिए। फि़लहाल, यहाँ हम इस रिपोर्ट में पेश भारत के बारे में जानकारी पर नज़र डालेंगे और देखेंगे कि मोदी सरकार ने देश किस तरफ़ आगे बढ़ाया है और बदल कर कैसा बनाया है।

उपरोक्त रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि इस समय सिर्फ़ एक प्रतिशत भारतीयों का देश की 58.4 दौलत पर क़ब्ज़ा है। यानी भारत की 99 प्रतिशत आबादी के पास शेष 41.6 प्रतिशत दौलत है। लेकिन इस 99 प्रतिशत में भी बेहद अमीर आबादी शामिल है। और आगे आँकड़े देखने पर “भारत महान”  के “मज़बूत अर्थव्यवस्था” की ओर भी भयानक तस्वीर सामने आती है। सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी का भारत की 80.7 प्रतिशत दौलत पर क़ब्ज़ा है। अर्थात शेष 90 प्रतिशत के पास सिर्फ़ 19.3 प्रतिशत दौलत है। निचली 50 प्रतिशत आबादी के पास तो देश की कुल दौलत का सिर्फ़ 1 प्रतिशत ही है।

इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि हमारे समाज में इस समय मेहनतकश लोगों के ख़ून-पसीने से पैदा हुई दौलत पर जोकों ने कितने बड़े स्तर पर क़ब्ज़ा किया हुआ है।

अब मोदी भक्त प्रश्न उठायेंगे कि आर्थिक असमानता तो मोदी सरकार से पहले ही मौजूद है। वे कहेंगे कि ये तो कांग्रेस की सरकारों की ही काली करतूत है। बिल्कुल दुरुस्त, आर्थिक असमानता तो पहले से ही मौजूद है। कांग्रेस की या इसकी अगवाई करने वाली सरकारों ने देश के धन्नासेठों की ही सेवा की है। साथ ही, मोदी सरकार से पहले की भाजपा की अगवाई करने वाली केन्द्र सरकारों ने भी तो यही कुछ किया है। कांग्रेस तथा मौजूदा सरकार द्वारा सभी विरोधी पार्टीयों की केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने पूरे जी-जान से पूँजीपति वर्ग की सेवा की है। यह भी मेहनतकश जनता को पूँजीपति वर्ग के लिए ही लूटने और पीटने का काम करती रही हैं। क्रेडिट सुईस की रिपोर्ट बताती है कि 1 प्रतिशत आबादी की दौलत सन् 2010 से 2014 तक 40.3 प्रतिशत से बढ़ कर 49 प्रतिशत हो गयी है। इसलिए मोदी भक्तों से हम कहना चाहेंगे कि हम समाज में दौलत के असमान बँटवारे के लिए सिर्फ़ मोदी सरकार को ही दोषी नहीं ठहराते। लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि पूँजीपति वर्ग की सेवा करने में, आर्थिक असमानता बढ़ाने में मौजूदा मोदी सरकार जैसा कोई नहीं। उपरोक्त रिपोर्ट में पेश आँकड़े यह भी अच्छी तरह से स्पष्ट करते हैं। देखो ये आँकड़े क्या कहते हैं –

रिपोर्ट बताती है कि सन् 2014 से 2016 तक ऊपर की 1 प्रतिशत आबादी के पास भारत में कुल दौलत में हिस्सा 49 प्रतिशत से 58.4 प्रतिशत हो गया है। इस तरह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी की दौलत में भी वृद्धि हुई है। रिपोर्ट मुताबिक़ 80.7 प्रतिशत दौलत की मालिक यह ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी सन् 2010 में 68.8 प्रतिशत की मालिक थी। यह आबादी भी मोदी सरकार के समय में और भी तेज़ी से माला-माल हुई है।

मोदी मण्डली भ्रष्टाचार के ि‍ख़लाफ़ लड़ने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। काले धन के ख़ात्मे के बहाने नोटबन्दी कर दी गयी है। उपरोक्त आँकड़े मोदी मण्डली के दावों की हवा निकाल रहे हैं। साबित कर रहे हैं कि मोदी द्वारा जन-कल्याण, भ्रष्टाचार के ख़ात्मे, आदि के नाम पर की जाने वाली कार्यवाइयाँ कितनी बड़ी डरामेबाज़ियाँ हैं। यह डरामा-मण्डली पर्दे के पीछे असल में जो कुछ कर रही है उसका मक़सद देशी-विदेशी पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाना है। मोदी सरकार से पहले की सरकारें भी तेज़ी और सख्ती से पूँजीपति वर्ग के हित की नीतियाँ (जैसे कि श्रम क़ानूनों में मज़दूर विरोधी और पूँजीपति वर्ग के पक्ष में सुधार, किसानों से ज़मीनें छीनकर पूँजीपतियों को सौंपने, जनता से सरकारी सुविधाएँ छीनने, जनता पर करों का बोझ बढ़ाने आदि अनेक नीतियाँ) लागू करना चाहती हैं। लेकिन अनेकों राजनीतिक मज़बूरियों के चलते वे ये नीतियाँ मनचाहे ढंग से लागू नहीं कर पा रही थीं। लेकिन पूँजीपतियों से हासिल हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करके, जनता को धर्म-जाति आदि के नाम पर बाँटकर, समाज में बड़े स्तर पर साम्प्रदायिक नफ़रत का ज़हर फैलाकर भाजपा ने केन्द्र में एक मज़बूत सरकार बनायी है। ऐसी सरकार के ज़रिये पूँजीपति वर्ग की धन-दौलत में तेज़ वृद्धि होनी ही है।

स्पष्ट है कि मोदी राज में देश किस ढंग से बदला है, किस तरफ़ आगे बढ़ा है। बड़े स्तर पर आर्थिक असमानता, जनता की बदहाली और जोंकों की खु़शहाली में वृद्धि – यही है मोदी मण्डली सहित पूँजीपति वर्ग के सभी सेवादार के लिए आर्थिक विकास और एक “मज़बूत अर्थव्यवस्था”। ऐसी “मज़बूत अर्थव्यवस्था” का जितनी जल्दी विनाश हो उतना ही अच्छा।
न्‍दीपाठ' का हर नया अंक पीडीएफ व यूनिकोड फॉर्मेट में

इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों  तक पहूँचायें, अपने हर ग्रुप में शेयर करें।

👆👆क्या आपको वोटसअोप ग्रुप से जुड़ना है👆👆
अगर हां तो निचे दिया गया नंबर पर  9898335767पर भेज दीजिए (अगर आपने अपना नाम व जिला नहीं भेजा है तो वो भी हां के साथ लिखकर भेजिये)

Friday, 27 January 2017

जूथी राष्टवाद की छुपी चाल समजो इसको खतम करो

*पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव*
*हिन्दुत्ववादी फासिस्टों और रंग-बिरंगे लुटेरे चुनावी मदारियों के बीच जनता के पास चुनने के लिए क्या है?*
सम्‍पादक मण्‍डल, मज़दूर बिगुल

पाँच राज्यों – उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में हिन्दुत्ववादी  फासिस्‍ट भाजपा और संघ परिवार इन चुनावों में जीत के लिए पूरा ज़ोर लगाये हुए थे और पिछले कई महीनों से बेहिसाब पैसे खर्च कर रहे थे, लेकिन 8 नवम्बर की नोटबन्दी ने फिलहाल उनका खेल बिगाड़ दिया है। भले ही 98 प्रतिशत जनता नोटबन्दी के पक्ष में होने के दावे किये जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में भाजपा के शिविर में घबराहट है। ऐसा न होता तो ”सर्जिकल स्ट्राइक” को लेकर देशभर में होर्डिंग लगवाने वाले अब तक इसका श्रेय लेने के लिए आपस में होड़ लगा रहे होते।

इन चुनावों से जनता को क्या मिलेगा और इनके प्रति मज़दूर वर्गीय रुख क्या हो, इस पर बात करने से पहले आइये ज़रा चुनाव वाले राज्यों की स्थिति पर एक नज़र डाल लें।

उत्तर प्रदेश 403 विधानसभा सीटों के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य और भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले लोकसभा चुनाव में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के ज़रिए किये गये धार्मिक ध्रुवीकरण और मोदी के झूठे वादों के अन्धाधुन्ध प्रचार की बदौलत भाजपा यहाँ 73 सीटें जीत गयी थी। ऐसी हवा बनाने की कोशिश की जा रही थी कि विधानसभा में भी पार्टी ऐसी ही सफलता दोहरायेगी। मगर मोदी के ढाई साल के कुशासन, वादाख़िलाफ़ी, भयंकर महँगाई, बढ़ती बेरोज़गारी से परेशान लोगों का मोहभंग तेज़ी से हो रहा था, रही-सही कसर नोटबन्दी ने पूरी कर दी। शहरी मध्‍यवर्ग का एक हिस्‍सा भले ही अब भी विमुद्रीकरण और मोदी के गुण गा रहा हो, लेकिन आम मेहनकश लोगों और छोटे शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में से इसे लेकर भारी गुस्‍सा है। हालाँकि भाजपा ने अपनी ओर से ज़ोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मोदी सरकार आने के बाद से उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा की छोटी-बड़ी 400 घटनाएँ हो चुकी हैं। जातीय ध्रुवीकरण कराने और छोटी-छोटी जातियों को भाजपा के पक्ष में करने के लिए आरएसएस के लोग और अमित शाह लगातार जोड़तोड़ में लगे रहे हैं। बसपा को तोड़ने में उन्‍हें शुरू में सफलता भी मिली थी लेकिन अब लगता है कि स्‍वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं की हालत बिहार में जीतन राम माँझी से अलग नहीं होने वाली है। मोदी लहर के उतार और नोटबन्दी के झटके के बाद भाजपा के लिए कोई चाल कामयाब होती नज़र नहीं आ रही है। ऐसे में साम्प्रदायिक कार्ड खेलने के अलावा उसके पास और तरकीब नहीं है। पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ पार्टी नेतृत्व से भले ही नाराज़ चल रहे हों लेकिन उसकी हिन्दू युवा वाहिनी के लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिछले लम्बे समय से साम्प्रदायिकता की आग सुलगाने में लगे रहे हैं। पश्चिमी उ.प्र. में मुज़फ्फ़रनगर-कैराना की आँच को लगातार ज़िन्दा रखने की कोशिशें जारी हैं। चरणसिंह की विरासत पारम्परिक किसान राजनीति के विघटन के बाद, अपनी वर्ग प्रकृति से निरंकुश ग़ैर-जनवादी प्रकृति वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुलकों-फ़ार्मरों के बड़े हिस्से में हिन्दुत्ववादी फासीवाद का समर्थन-आधार बना है। भाजपा इसे भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के मुख्य आरोपियों में से एक, संगीत सोम की गाड़ी से दंगों की दर्जनों सीडी पकड़े जाना तो बस एक बानगी है।

प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में महीनों से चल रहा पारिवारिक ड्रामा ऐन चुनाव से पहले बेहद योजनाबद्ध ढंग से निपट गया है और सारी गोटियाँ सही-सही जगहों पर फिट हो गयी हैं। अखिलेश यादव की छवि चमकाने के लिए हुए इस नाटक की असलियत भी बहुत से लोगों की समझ में आने लगी है। खींचतान, रूठने-मनाने आदि की रस्मों के बाद कांग्रेस के साथ गँठजोड़ भी पक्का हो गया है। बहुत से लोगों को इस ”धर्मनिरपेक्ष” गठबन्धन से बड़ी उम्मीदें हैं लेकिन उन्‍हें मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के समय सपा की भूमिका, दंगों के बाद राहत शिविरों पर चले बुलडोज़र और सैफ़ई में करोड़ों के खर्च से हुए अश्लील  जश्न, जेलों में बन्द निर्दोष मुस्लिम युवकों के साथ सपा सरकार की वादाख़िलाफ़ी और प्रदेश भर में जनान्दोलनों पर बर्बर सरकारी दमन को ज़रूर याद कर लेना चाहिए।

बहुजन समाज पार्टी जो कुछ समय पहले तक अपने दलित वोटबैंक के साथ एकमुश्‍त मुस्लिम वोटों को जोड़कर जीत के प्रति काफ़ी आश्वस्त ‍नज़र आ रही थी, सपा के इस नये पैंतरे से थोड़ा परेशान है क्योंकि मुस्लिम वोटों के बँटने से उसका गणित गड़बड़ा सकता है। भाजपा को रोकने के लिए जो लोग महाभ्रष्‍ट ”बहनजी” के जीत की उम्मीदें लगाये हुए हैं उन्‍हें यह भी याद रखना चाहिए कि भाजपा के साथ बसपा उत्तर प्रदेश में तीन बार सरकार बना चुकी है। 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी को फौरन क्लीनचिट देकर भाजपा के समर्थन में प्रचार करने वाली भी मायावती ही थीं। बसपा के शासन में ‘कानून-व्यवस्था’ ठीक होने की बातें करने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि मायावती के पिछले शासन में दलितों पर बर्बर अत्‍याचारों के नये रिकॉर्ड बने थे। सैकड़ों निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को आंतकवाद के नाम पर झूठे मुकदमों में भी उन्हीं के शासन में फँसाया गया था।

जहाँ तक संसदीय वामपंथियों का सवाल है, तो साम्प्रदायिक फासीवाद को रोकने के नाम पर वे हर प्रकार के सिद्धान्तहीन मोर्चे बनाने के लिए हरदम तैयार रहते रहे हैं। मगर एक तो इस बार कोई उन्‍हें घास नहीं डाल रहा, दूसरे अपने कैडर और समर्थकों की बढ़ती नाराज़गी दूर करने के लिए उन्‍हें इस बार स्वतंत्र वाम विकल्प की हास्यास्पद नौटंकी करनी पड़ रही है। पिछले ढाई साल के दौरान सरकारी नीतियों या भाजपा की साम्प्रदायिक हरकतों के विरुद्ध कोई जुझारू आन्दोलन खड़ा करना तो देर, जुझारू और व्यापक प्रचार अभियान तक न चला पाये ये पिलपिली बहादुर संसदीय वाम दलों का ”महागठबन्धन” बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में 155 उम्मीदवार खड़े करने जा रहे हैं। वैसे इनकी सबसे बड़ी चुनौती सभी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्‍त होने से बचाने की होगी।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा के महाभ्रष्‍ट और अत्‍याचारी कुशासन से जनता में भारी नाराज़गी है। भाजपा शुरू में तो अकालियों को किनारे करके महाराष्‍ट्र की तरह अलग चुनाव लड़ने के मंसूबे बाँध रही थी, लेकिन फिर उसकी हिम्‍मत जवाब दे गयी। हालाँकि इसी इरादे से पंजाब में आर.एस.एस. ने हिन्दू आबादी में अपनी सक्रियता बहुत अधिक बढ़ा दी थी। तमाम डेरों के धर्मगुरुओं की मदद से भाजपा ग़ैर-जाट सिख आबादी को साथ लेने की फ़िराक में थी और दलित सिखों के बीच कांग्रेस के आधार को खिसकाने के लिए जुगत भिड़ा रही थी। पिछले वर्ष संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पंजाब के कई चक्कर काटे। पंजाब के कई शहरों में इनके “शिक्षा शिविर” हुए और जालन्धर व मलेरकोटला में संघ ने हथियारबन्द “रूट मार्च” किये और बरनाला, जैतो आदि शहरों में संघ के काडरों ने पिस्तौलें, बन्दूकें लहराते हुए मार्च आयोजित किये। लेकिन पंजाब में संघ की फिरकापरस्त राजनीति सिरे नहीं चढ़ पा रही। कुछ जगहों पर तो दंगा कराने की कोशिश करने पहुँचे संघियों को लोगों ने पीटकर खदेड़ दिया। सत्तारूढ़ गठबन्धन से जनता की नाराज़गी का फ़ायदा पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला था। पंजाब में बारी-बारी से राज करते आ रहे कांग्रेसियों और अकालियों से अलग किसी ”साफ-सुथरे” विकल्प को आज़माने के चक्‍कर में विधानसभा चुनाव में भी आप को व्यापक समर्थन मिलता लग रहा था। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आता जा रहा है, ‘आप’ का नशा कम होता दिखायी दे रहा है। जगह-जगह आप ने पुराने कां‍ग्रेसियों को या फिर कई बदनाम चेहरों को टिकट दिये हैं। टिकट पाने वालों में ‘आम आदमी’ तो गिनती के ही हैं, ज्‍़यादातर धनी किसान, व्यापारी, ठेकेदार आदि ही हैं। एक बड़ी आबादी को अब लगने लगा है कि जब ‘आप’ और दूसरी चुनावी पार्टियों में कोई फ़र्क ही नहीं है तो क्यों न कांग्रेस को ही फिर आज़माया जाये।

उत्तराखण्ड बनने के बाद से वहाँ बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस का शासन रहा है और विभिन्‍न छोटी क्षेत्रीय पार्टियाँ सत्ता की मलाई चाटने के लिए बेशर्मी से कभी इसका कभी उसका दामन थमती रही हैं। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं होने वाली है। हरीश रावत सरकार की नाकामियों और कांग्रेस के पिछले मुख्यमंत्री रहे विजय बहुगुणा सहित कई कांग्रेसि‍यों को फोड़ लेने से भाजपा कुछ उत्‍साहित है लेकिन नोटबन्दी से जनता की नाराज़गी ने यहाँ भी उसे डरा रखा है। हालत यह है कि ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के चक्‍कर में भाजपा ने कांग्रेस और सपा से परित्‍यक्‍त 91 साल के नारायणदत्त तिवारी को शामिल करा लिया है।

गोवा में भाजपा और कांगेस के बीच मुख्य मुकाबला है, हालाँकि ‘आप’ यहाँ भी ”नये विकल्प” का अपना सिक्‍का चलाने की कोशिश कर रही है। गोवा के वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा गोमांस खाने को उनका अधिकार बताने से भी नहीं चूकी है लेकिन पिछले पाँच साल के भाजपाई शासन से लोगों की नाराज़गी बहुत अधिक है। ऊपर से आरएसएस का एक बड़ा हिस्‍सा पिछले दिनों बग़ावत करके संघ से अलग हो चुका है। कांग्रेसी तो भ्रष्‍टाचार के कीर्तिमान क़ायम करने में सबसे आगे ख़ैर हैं ही। तमाम छोटे राज्यों की तरह गोवा में भी प्राकृतिक संसाधनों की अन्धी लूट और भ्रष्‍टाचार में सभी पार्टियाँ आपस में होड़ करती रहती हैं।

मणिपुर में नगा और कुकी समुदायों के बीच भयंकर कलहपूर्ण संघर्ष के चलते महीनों से जारी आर्थिक नाकाबन्दी के बीच हो रहे चुनाव में भाजपा एक बार फिर वही ख़तरनाक खेल खेल रही है जिसके दम पर वह पिछले दिनों असम में चुनावी जीत हासिल कर चुकी है। असम में अलग-अलग समुदायों के स्‍थानीय निवासियों के बीच नफ़रत फैलाकर जीतने के बाद भाजपा मणिपुर में भी इस आग को हवा दे रही है और इस खेल में कांग्रेस अपनी गोटियाँ खेल रही है। सेना के दमन के विरोध में और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ्सपा) हटाने की माँग को लेकर 16 साल तक भूख हड़ताल करने वाली इरोम शर्मिला भी अपनी पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरी हैं लेकिन अभी वहाँ कांग्रेस का ही पलड़ा भारी लग रहा है।

कुल मिलाकर, तस्‍वीर बिल्‍कुल साफ़ है। इस देश में पिछले 70 साल से चल रहे लोकतंत्र के खेल में हर बार की तरह इस बार भी, एक चीज़ पहले से तय है – तमाम चुनावी मदारियों में से जीते चाहे कोई भी, हारेगी फिर जनता ही!

कुछ लोग इन चुनावों को फासीवाद के विरुद्ध जंग के तौर पर पेश करने की कोशि‍श करते हुए तर्क दे रहे हैं कि अन्‍य चुनावों के मुकाबले ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि इनमें भाजपा की हार से मोदी सरकार कमज़ोर होगी और 2019 में उसकी सत्ता से बेदखली का रास्ता साफ हो जायेगा। बेशक, आगामी विधानसभा चुनावों में हारने से भाजपा कमज़ोर होगी लेकिन इसे ही फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई मान लेना और लुटेरों के दूसरे गिरोहों का समर्थन करने लगना जनता को उसी भ्रमजाल में उलझाये रखना है जिसमें वह आज़ादी के बाद से फँसी हुई है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस सहित तमाम अन्‍य दलों द्वारा लागू की गयी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने ही वह ज़मीन तैयार की है जिस पर हिन्दुत्ववादी फासीवाद की विषबेल फलीफूली है। विकल्प केवल एक ही है, इस अन्‍यायी पूँजीवादी व्यवस्था और इसके नकली लोकतंत्र को उखाड़ फेंककर एक ऐसी व्यवस्था क़ायम करना जिसमें उत्‍पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढाँचे पर वास्तव में उत्‍पादन करने वाले वर्गों का कब्‍ज़ा हो। यह एक लम्बी लड़ाई है और इसके लिए ज़रूरी है कि नकली लोकतंत्र की असलियत को हर मेहनतकश को समझा दिया जाये।

दूसरे, यह भी समझ लेने की ज़रूरत है कि बुर्जुआ संसदीय प्रणाली में अल्पमत-बहुमत का खेल कितना भ्रामक होता है और इस विधि से प्राप्त जनादेश वस्तुत: बहुसंख्यक जनसमुदाय की वास्तविक आकांक्षाओं को सटीकता के साथ अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकता। अक्‍सर संसदीय वाम दलों के प्रवक्ता, नेता और विश्लेषक तथा कुछ सामाजिक जनवादी मिजाज के वाम बुद्धिजीवी बिहार और कुछ अन्‍य चुनावों में भाजपा की हार या उसके वोटों में गिरावट के हवाले देकर खुद को तसल्ली देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपाई लहर अब उतार पर है। इस तसल्ली के साथ ऐसी कथित वाम धारा के लोग आँखों में घूरती सच्चाई से मुँह मोड़कर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जनता को यह सन्देश देने लगते हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा पराजित हो जायेगी और इस प्रकार हिन्दुत्ववादी फासीवाद को धूल चटा दी जायेगी। नोटबन्दी के बाद से ऐसी आवाज़ें और तेज़ हो गयी हैं जिन्‍हें लगता है कि मोदी ने तो ”सेल्‍फ़ गोल” मार लिया और अब उनका काम आसान हो गया है।

किसी भी बुर्जुआ संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत चुनाव जीतकर यदि फासिस्ट सत्ता में आते हैं तो इसका मतलब यह कत्तई नहीं होता कि बहुसंख्यक जनता उसके साथ है, लेकिन इतना तो ज़ाहिर है कि चुनावी जीत भी बताती है कि फासिस्ट उभार उठान पर है और समाज में इस धुरप्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन का आधार विस्तारित हो रहा है। अत: इस तथ्य से आँखें कत्तई नहीं मूँदी जा सकती कि भाजपा के वोट प्रतिशत में इज़ाफ़ा फासिस्ट संकट की चुनौती की गम्भीरता को रेखांकित कर रहा है। यदि 2011 और 2016 की भी तुलना करें तो असम में भाजपा के वोट प्रतिशत में 11.5 प्रतिशत से 29.5 प्रतिशत, केरल में (गठबन्धन  के दलों सहित) 6.0 से 14.4 प्रतिशत, पं.बंगाल में 4.1 प्रतिशत से 10.3 प्रतिशत और तमिलनाडु में 2.2 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2011 में देश के 6 राज्यों  में अकेले और 3 राज्यों में गठबन्धन बनाकर भाजपा सत्ता में आयी थी, कांग्रेस 11 राज्यों में अकेले और 2 में गठबन्धन बनाकर सत्तासीन हुई थी तथा 6 राज्यों में क्षेत्रीय दलों की व एक में वाम दलों की सरकार बनी थी। 2016 में 9 राज्यों में भाजपा अकेले और 4 में गठबन्धन के दलों के साथ सत्ता रूढ़ है, कांग्रेस 6 राज्यों में सिमट गयी है, क्षेत्रीय दलों के कब्जे में 9 राज्य हैं और दो पर संसदीय वाम काबिज है। 2017 में पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मणिपुर में तथा 2018 में हिमाचल, मेघालय, कर्नाटक, और मिजोरम के विधान सभा चुनाव होने हैं। इनमें से कर्नाटक, हिमाचल और उत्तराखण्ड में भाजपा की ही सरकार बनने की अधिक सम्भावना है। पंजाब में आप पार्टी और कांग्रेस के बीच मत विभाजन के बावजूद यदि अकाली-भाजपा गठबन्धन  दुबारा सत्ता  में नहीं आ पाया, तो भी भाजपा के वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी की सम्भावना है। असम के बाद भाजपा अब पूर्वोत्तर को लेकर दूरगामी रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें विशेषकर हिन्दुत्व की राजनीति के साथ-साथ विभिन्न उपराष्ट्रीयताओं की पहचान राजनीति को हवा देने और उनके आपसी टकरावों का लाभ उठाने के साथ ही कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के स्थानीय क्षत्रपों को साथ मिला लेने की जोड़-तोड़ भी शामिल है।

कुल मिलाकर, भाजपा की चुनावी सफलताएँ और आज़ादी के बाद पहली बार सबसे बड़े राष्ट्रीय दल के रूप में उसका उभरकर सामने आना भारतीय राजनीति में संघ परिवार की हिन्दुत्ववादी फासीवादी राजनीति के प्रचण्ड  उभार का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन चुनाव परिणामों के इस विश्लेषण से यह कत्तई नहीं समझा जाना चाहिए कि कांग्रेस और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ यदि तालमेल करके चुनावों में भाजपा को शिकस्त दे दें या 2019 के आम चुनावों में जीतकर यदि कांग्रेस गठबन्धन फिर से केन्द्र में सत्तासीन हो जाये तो हिन्दुत्ववादी फासीवादी लहर को पीछे धकेल दिया जायेगा। बुर्जुआ संसदीय चुनावों में हराकर नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जन समुदाय को लामबन्द करके सड़कों पर आर-पार की लड़ाई में ही फासीवाद को निर्णायक शिकस्त दी जा सकती है। फासीवाद को निर्णायक शिकस्त देने का मतलब एक ही हो सकता है और वह है उसे नेस्तनाबूद कर देना।

भाजपा हिन्दुत्ववाद का मात्र संसदीय मोर्चा है। हिन्दुत्ववाद हर फासीवादी आन्दोलन की तरह एक धुरप्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है। यह मुख्यत: मध्य वर्ग का सामाजिक आन्दोलन है, जिसके साथ उत्पादन प्रक्रिया से कटे हुए विमानवीकृत मज़दूर भी खड़े हैं और जिसे बड़े-छोटे पूँजीपतियों और कुलकों-फार्मरों के बहुलांश का- यानी बुर्जुआ सत्ता के सभी छोटे-बड़े हिस्सेदारों के बहुलांश का समर्थन हासिल है। इस प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन का संघ परिवार का कैडर आधारित सांगठनिक ढाँचा हरावल दस्ता है। इसका कारगर प्रतिरोध एक क्रान्तिकारी सामाजिक आन्दोलन ही कर सकता है जिस पर मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी राजनीति का वर्चस्व एक कैडर आधारित सांगठनिक ढाँचे के माध्यम से स्थापित हो। इस लड़ाई की प्रकृति का सादृश्य निरूपण यदि सामरिक संघर्ष से करें तो कहा जा सकता है कि यह छापामार युद्ध (गुरिल्ला वारफेयर) या चलायमान युद्ध (मोबाइल वारफेयर) जैसी न होकर दीर्घकालिक स्थितियों के युद्ध (पोजीशनल वारफेयर) जैसी होगी। फासिस्टों ने विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के रूप में समाज में अपनी खन्दकें खोद रखी हैं और बंकर बना रखे हैं। हमें भी अपनी खन्दकें  खोदनी होगी और बंकर बनाने होंगे। बेशक यह काम मेहनतकश जन समुदाय के राजनीतिक और आर्थिक संघर्षों के साथ-साथ होगा और मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी राजनीति का केन्द्र यदि संगठित हो तो रणकौशल के तौर पर बुर्जुआ संसदीय चुनावों के मैदान में भी फासिस्टोंे से भिड़ंत की जा सकती है, लेकिन यह मुगालता पालना आत्मघाती होगा कि चुनावी हार-जीत से फासिस्टों को पीछे धकेला जा सकता है। मेहनतकश जन समुदाय (शहरों-गाँवों के सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा) के सभी हिस्सों का फासीवाद-विरोधी साझा मोर्चा आज की सर्वोपरि ज़रूरत है। इसके बाद ही निम्न मध्य वर्ग के रैडिकल, सेक्युलर तत्वों- विशेषकर छात्रों-युवाओं की जुझारू आबादी को, मजबूती से साथ लिया जा सकेगा। बुर्जुआ वर्ग का कोई भी हिस्सा या बुर्जुआ वर्ग की कोई भी पार्टी फासीवाद विरोधी संघर्ष में मेहनतकश जनता का रणनीतिक मित्र नहीं हो सकती। संसदीय वाम जब फासीवाद विरोधी संघर्ष को चुनावी संघर्ष और प्रतीकात्मक प्रतिरोधों तक सीमित कर देता है, जब वह मज़दूर वर्ग की राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक संघर्षों को तिलांजलि देकर उसकी राजनीतिक चेतना को कुन्द करता है, जब वह मुट्ठीभर संगठित कुलीन मज़दूरों तक सिमटकर 95 प्रतिशत अतिशोषित असंगठित सर्वहाराओं को पूँजीवादी निर्बन्ध लूट और बुर्जुआ राजनीतिक वर्चस्व की अधीनस्थता के लिए अरक्षित छोड़ देता है, तो वह एक ऐतिहासिक अपराध और ऐतिहासिक विश्वासघात करता है।

ग़ौरतलब है कि 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही, भाजपा चाहे सत्ता में रहे या न रहे, हिन्दुत्ववादी फासीवादी लहर थोड़ा आगे-पीछे होते हुए, कभी कुछ तेज तो कभी मद्धम गति से लगातार आगे बढ़ती रही है। आगे भी भारतीय बुर्जुआ समाज में यह लगातार अपनी ज़्यादा से ज़्यादा आक्रामक उपस्थिति तब तक बनाये रखेगी, जबतक क्रान्तिकारी राजनीति संगठित होकर इसका प्रतिरोध नहीं करेगी।

बीसवीं शताब्दी में बुर्जुआ राजनीति में धुर दक्षिणपन्थी और फासिस्ट प्रवृत्तियाँ विशेषकर उन दौरों में मजबूत होकर सिर उठाती थीं जब पूँजीवाद आवर्ती चक्रीय क्रम में आने वाले आर्थिक संकट और मन्दी के दौर से गुजरता था। 1920-30 के दशकों की महामन्दी और महाध्वंस को समझे बिना हिटलर और मुसोलिनी को एक परिघटना के रूप में नहीं समझा जा सकता। उस समय पश्चिम के सभी देशों में फासीवाद एक आन्दोलन  के रूप में फैला था। अब विश्व पूँजीवाद 1970 के दशक से ही जिस दीर्घकालिक मन्दी को झेल रहा है, उससे वह वस्तुत: कभी उबर पाया ही नहीं। पूँजीवाद का यह संकट ‘पीरियॉडिक’ न होकर ‘स्ट्रक्चरल’ (ढाँचागत) है। यह एक ‘टर्मिलन’ व्याधि है जो मृत्यु के साथ ही इसका पिण्ड छोड़ेगा। नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों से किसी प्रकार के ‘कीन्सियन रिट्रीट’ का स्पेेस लगभग न के बराबर बचा है। इन नीतियों को प्रभावी ढंग से कोई निरंकुश सत्ता ही लागू कर सकती है। यही कारण है कि आज बुर्जुआ जनवाद और नग्न‍ निरंकुश सत्ता के बीच की विभाजक रेखाएँ धूमिल होती जा रही हैं और पूरी दुनिया में, पश्चिम से पूरब तक, अधिकांश देशों में फासीवादी आन्दोलन  विभिन्न रूपों में सिर उठा रहे हैं और अपने सामाजिक आधारों का विस्तार कर रहे हैं। भारत में भी संघ परिवार 1925 से निरन्तर काम करता रहा है और समय-समय पर दंगों में तथा मज़दूर आन्दोलन विरोधी सरगर्मियों में अहम भूमिका भी निभाता रहा है, लेकिन नवउदारवाद का दौर ही वह काल रहा है जब रथयात्रा-बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात-2002 आदि अहम मुकामों से होता हुआ यह इस मुकाम तक आ पहुँचा है कि भाजपा आज सबसे बड़ी बुर्जुआ राष्ट्रीय पार्टी के रूप में केन्द्र में और देश के कई राज्यों में सत्ता सम्हालते हुए निरंकुश दमनकारी तरीके से नवउदारवादी नीतियों को लागू कर रही है और दूसरी ओर उसकी फासिस्ट गुण्डा वाहिनियाँ सड़कों पर उत्पात मचा रही हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित कर रही हैं तथा अन्धराष्ट्रवाद का उन्माद फैला रही हैं।

भाजपा सत्ता में रहे या न रहे, फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई की योजनाबद्ध, सांगोपांग, सर्वांगीण तैयारी क्रान्तिकारी एजेण्डे पर हमेशा प्रमुख बनी रहेगी, क्योंकि फासीवाद राजनीतिक परिदृश्य  पर अपनी प्रभावी उपस्थिति तबतक बनाये रखेगा, जबतक राज, समाज और उत्पादन का पूँजीवादी ढाँचा बना रहेगा। इसलिए फासीवाद विरोधी संघर्ष को हमें पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्तिकारी संघर्ष के एक अंग के रूप में ही देखना होगा। इसे अन्य किसी भी रूप में देखना भ्रामक होगा और आत्मघाती भी।

जनता के लिए नये विकल्प का निर्माण लिल्‍लीघोड़े पर सवार गत्ते की तलवारें भाँजते हुए नकली लाल सूरमा भोपालियों के बस की बात नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है मज़दूर वर्ग की एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण, देश भर में मेहनतकश जनता की समानान्तर सत्ता के रूप में क्रान्तिकारी लोकस्वराज्य पंचायतों की स्थापना और साथ ही एक नये क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियन आन्दोलन का निर्माण। यह एक लम्बा रास्ता है, लेकिन हमारे पास यही विकल्प है! और हमें इसी को चुनना चाहिए। 70र्ष वर्ष मौजूद पूँजीवादी जनतन्त्रा की असलियत को पहचानने के लिए काफ़ी होते हैं! 70 वर्ष नींद से जागने के लिए काफ़ी होते हैं!

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2017 अंक में प्रकाशित

व्हाट्सऐप और  ग्रुप मे जुरने के लिये अपना नाम अोर पता हामरे नंबर  9898335767 पर भेजे

👉इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहूँचायें, अपने हर ग्रुप में शेयर करें।

कच्छ Demolition 2026 Riport।

कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों,  इस रिपोर्ट को तैयार करने का...