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Monday, 17 September 2018

हिंदी में अल्लाह तआला के 99 नाम

हिंदी में अल्लाह तआला के 99 नाम और उनका मतलब, पढ़े और शेयर किए बिना मत छोड़ना!

01- अल्लाह (सबसे बड़ा नाम)
02- अर रहमान (बहुत रहम वाला)
03- अर रहीम (बहुत बड़ा मेहरबान)
04- अल मलिक (हक़ीक़ी बादशाह )
05- अल कुद्दूस (बहुत ज़्यादा पाक)
06- अस सलाम (सलामती वाला)
07- अल मुअमिन (अमन देने वाला)
08- अल मुहैमिन (निगहबान)
09- अल अज़ीज़ (इज़्ज़त के काबिल)
10- अल जब्बार (ज़बरदस्त)
11- अल मुतकब्बिर (बड़ाई वाला)
12- अल ख़ालिक़ (पैदा करने वाला)
13- अल बारी (सूरत बनाने वाला)
14- अल मुसव्विर (सूरत देने वाला)
15- अल गफ़्फ़ार (बड़ा बख़्शने वाला)
16- अल कह्हार (क़हर करने वाला)
17- अल वह्हाब (बहुत ज़्यादा देने वाला)
18- अर रज़्ज़ाक (रोज़ी देने वाला)
19- अल फत्ताह (खोलने वाला)
20- अल अलीम (जानने वाला)
21- अल काबिज़ (कब्ज़ा करने वाला)
22- अल बासित (फ़र्राखी देने वाला)
23- अल ख़ाफ़िज़ (गिराने वाला)
24- अर राफ़िअ (उठाने वाला)
25- अल मुइज़ (इज़्ज़त देने वाला)
26- अल मुज़िल (ज़लील करने वाला)
27- अस समीअ (सुनने वाला)
28- अल बसीर (देखने वाला)
29- अल हकम (फ़ैसला देने वाला)
30- अल अद्ल (इंसाफ करने वाला)
31- अल लतीफ़ (नरमी करने वाला)
32- अल ख़बीर (ख़बर रखने वाला)
33- अल हलीम (बुर्दबार)
34- अल अज़ीम (बहुत बड़ा)
35- अल ग़फ़ूर (बार बार बख़्शने वाला)
36- अश शकूर (बहुत अज्र देने वाला)
37- अल अली (बहुत बुलन्द)
38- अल कबीर (बहुत बड़ा)
39- अल हफ़ीज़ (संभालने वाला)
40- अल मुकीत (रोज़ी देने वाला)
41- अल हसीब (हिसाब लेने वाला)
42- अल जलील (बुज़ुर्गी वाला)
43- अल करीम (बड़ा सख़ी)
44- अर रक़ीब (निगहबान)
45- अल मुजीब (दुआ कुबूल करने वाला)
46- अल वासिअ (कुशादगी वाला)
47- अल हक़ीम (हिकमत वाला)
48- अल वदूद (भलाई चाहने वाला)
49- अल मजीद (बड़ी शान वाला)
50- अल बाइस (उठाने वाला)
51- अश शहीद (गवाह)
52- अल हक़ (सच्चा और साबित)
53- अल वकील (कारसाज़)
54- अल क़वी (ताक़तवर)
55- अल मतीन (ज़बरदस्त क़ुव्वत वाला)
56- अल वली (मददग़ार)
57- अल हमीद (तारीफ़ किया गया)
58- अल मुह्सी (गिनती करने वाला)
59- अल मुब्दी (पहले पहल पैदा करने वाला)
60- अल मुईद (दोबारा पैदा करने वाला)
61- अल मुहयी (ज़िन्दा करने वाला)
62- अल मुमीत (मारने वाला)
63- अल हैय् (हमेशा ज़िन्दा रहने वाला)
64- अल कय्यूम (दुनिया क़ायम रखने वाला)
65- अल वाजिद (हर चीज़ को पालने वाला)
66- अल माजिद (बड़ी इज़्ज़त वाला)
67- अल वाहिद (अकेला)
68- अल अहद (एक)
69- अस समद (जो किसी का मोहताज न हो)
70- अल क़ादिर (क़ुदरत रखने वाला)
71- अल मुक़्तदिर (पूरी क़ुदरत रखने वाला)
72- अल मुक़द्दिम (आगे करने वाला)
73- अल मुअख्खिर (पीछे करने वाला)
74- अल अव्वल (सबसे पहले)
75- अल आख़िर (सब के बाद)
76- अज़्ज़ाहिर (सब पर ज़ाहिर)
77- अल बातिन (सबसे पोशीदा)
78- अल वाली (हक़ीक़ी मालिक)
79- अल मुतआली (बहुत ही बुलन्द)
80- अल बर्र (तमाम नेकी के जरिया)
81- अत तव्वाब (तौबा क़ुबूल करने वाला)
82- अल मुन्तकिम (इन्तिक़ाम लेने वाला)
83- अल अफूव (दरगुज़र करने वाला)
84- अर रऊफ (शफ़क़त करने वाला)
85- मालिकुल मुल्क (बादशाहत का मालिक)
86- जुल जलालि वल इकराम (इज़्ज़त और बुलंदी अता करने वाला)
87- अल मुक़सित (इंसाफ़ करने वाला)
88- अल जामिअ (जमा करने वाला)
89- अल ग़नी (किफ़ायत करने वाला)
90- अल मुग़नी (बेपरवाह करने वाला)
91- अल मानिअ (रोकने वाला)
92- अज़ ज़ार (नुकसान पहुँचाने वाला)
93- अन नाफ़िअ (नफ़ा पहुँचाने वाला)
94- अन नूर (मुनव्वर करने वाला)
95- अल हादी (रास्ता दिखाने वाला)
96- अल बदीअ (बेमिसाल पैदा करने वाला)
97- अल बाक़ी (बाक़ी रहने वाला)
98- अल वारिस (हक़ीक़ी वारिस)
99- अर रशीद (सीधी राह दिखाने वाला)

सब चीज़े शेयर करते हो अल्लाह का नाम भी शेयर करलो 🙏🏻

Sunday, 9 September 2018

कया देश गेर मुस्लिम ओर अमिर लोगो के टेक्ससे देश चलता हे,

Date:-10/09/2018

*क्या देश सिर्फ बाकी ८०% नॉन मुस्लिमों के टैक्स के पैसे से चलता है❓नहीं❗बिलकुल नहीं‼*

आजादी के समय मुसलमानों कि सरकारी नौकरियों में ३५% भागीदारी थी जो आज २% है।१८५७ कि क्रांति के बाद कुछ मुस्लिमबहुल बागी रियासतों में ब्रितानिया हुकूमत ने मुस्लिम लोगों कि कोर्ट, पुलिस, फौज वगैरह से छटनी शुरू कर दी थी। आज तक कि सरकारें भी यही निती पर चलती रही। बँटवारे के लिए कांग्रेस के नेहरू जिम्मेदार है जिन्होंने १९३६ के प्रादेशिक सरकार चुनावों में पुरे एकसंध भारत में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया।  जिस क्षेत्र में मुस्लिम आबादी ९०% थी वहाँ भी एक मुस्लिम उम्मीदवार क्या कांग्रेस को नहीं मिला❓दरअसल मुसलमानों का राजनीतिक वजूद खत्म करने कि निती ही बँटवारे के लिए जिम्मेदार है। यही निती आजादी के बाद भी अपनायी जा रहीं है।
            जो व्यक्ति मौजूदा आयकर (इनकम टैक्स) के दायरे में नही आता, अर्थात जिनकी सालाना आमदनी २.५ लाख से कम है, उनसे ही ७८% अप्रत्यक्ष टैक्स लिया जाता है। देश में मुस्लिम आबादी कम से कम २०% है,लेकिन सरकारी नौकरियों में हमारी हिस्सेदारी २% है जोकि हमारे आबादी के प्रतिशत के समान २०% प्रतिनिधित्व होनी चाहिए थी। जब  हमारी कौम के मुसलमानों का टैक्स में २० प्रतिशत हिस्सा है, तो हमें २०% सरकारी नौकरी, शिक्षण में २० हिस्सा, राजनीति में २०% भागीदारी देकर देश का लोकतंत्र हम मुसलमानोंपर कोई अहसान नही करती। हमने जो २०% चंदा दिया है, आजादी से अब तक देते आए है हम उसका हिस्सा मांग रहे है। इसको ही आरक्षण कहा जाता है।
           इसका मतलब आजादी से अब तक हमे हमारे टैक्स का १०% ही लाभ मिला है। मतलब हमारे आबादी में से बच्चे वगैरह को निकालकर आधे लोग अप्रत्यक्ष कर भरते आए है। हमारी कौम द्वारा भुगतान किए हुए टैक्स कि कीमत २०१७-२०१८ वित्तीय वर्ष के लिए १.२५ लाख करोड़ है। इसका मूल्य ४०० टन सोने कि किमत के बराबर है। सोचो आजादी से अब तक हमने कितना टन सोने के मूल्य का टैक्स दिया होगा। आजादी से लगभग १२ हजार टन सोना ( गोल्ड) के बराबर *चंदा* (टैक्स )दिया है, जिसकी मौजूदा किमत लगभग ३६० लाख करोड़ बनती है। जबकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के ५६० टन गोल्ड रिजर्व है। इससे आप अंदाजा लगा सकते है कि मुसलमानों का देश में आर्थिक योगदान कितना है। आजादी से अब तक तीसरी पीढ़ि चल रही है अगर हम एक परिवार कि सदस्य संख्या ७ भी मानते है तो तो ३ करोड़ मुस्लिम परिवार भारत में है। हर मुस्लिम परिवार ने १२०० किलो सोना जितनी रकम (३६० करोड़)उतना टैक्स आजादी से आज तक दिया हैं। आज हर दस गरीबी रेखा वाले व्यक्तियों में ३ व्यक्ति मुस्लिम है, हर तीसरा कैदी मुसलमान है। हम मुस्लिम क्या आजादी से अब तक सिर्फ़ सरकारी तिजोरिया भरने के लिए है?  *चंदा* (टैक्स) के ऐवज में शिक्षा, रोजगार, न्याय, राजनीतिक *प्रतिनिधित्व/आरक्षण* कि हमारी मांग गलत है?

*प्रसिद्ध उद्योगपति फोर्ड ने कहा था " जिस दिन देश कि जनता को देश कि अर्थव्यवस्था कैसे चलती है पता चलेगा, उसके अगले हीे सुबह देश में क्रांति होगी।"*

(मजदूर बिगुल में प्रकाशित देश कि अर्थव्यवस्था का सही चेहरा सामने लानेवाला एक लेख निचे👇 प्रस्तुत कर रहे है। )

*क्या देश सिर्फ अमीरों के टैक्स के पैसे से चलता है? नहीं!*

अक्सर उच्च मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग द्वारा यह कहा जाता है कि देश उनके पैसे से चल रहा है। वही लोग हैं जो सरकार को टैक्स देते हैं जिससे सारे काम होते हैं, ग़रीब लोग तो केवल सब्सिडी, मुफ़्त सुविधाओं आदि के रूप में उन टैक्स के पैसों को उड़ाते हैं। इस प्रकार ग़रीब आम जनता देश पर बोझ होती है। दरअसल यह एक बड़ा झूठ है जो काफ़ी व्यापक रूप से लोगों में फैला हुआ है। अगर आँकड़ों के हिसाब से देखा जाये तो कहानी इसकी उल्टी ही है। सरकार जो टैक्स वसूलती है उसका बड़ा हिस्सा इसी ग़रीब आम जनता की जेबों से आता है। आइए देखते हैं कैसे।
आमतौर पर उच्च मध्यवर्ग का यह तर्क रहता है कि चूँकि टैक्स ढाई लाख से ऊपर की आमदनी वाले व्यक्ति पर ही लगता है, इसलिए केवल वही लोग कर (टैक्स) देते हैं जिनकी सलाना आय ढाई लाख से ज़्यादा है। पर जिस कर की वो बात कर रहे हैं वो आमदनी के ऊपर कर है। आयकर ही एकमात्र सरकार की आय का स्रोत नहीं है। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा कि आयकर से सरकार को बहुत कम आमदनी होती है।
सरकार दो तरीक़़े के टैक्स वसूलती है –
1. प्रत्यक्ष कर
2. अप्रत्यक्ष कर
प्रत्यक्ष कर में आयकर और कॉरपोरेशन टैक्स या निगम कर आते हैं जबकि अप्रत्यक्ष कर में सेल्स टैक्स, सर्विस टैक्स, राज्यों का वैट टैक्स (इनको मिलाकर अब वस्तु और सेवा कर बना दिया गया है), कस्टम ड्यूटी, एक्साइज ड्यूटी, रोड टैक्स, मनोरंजन कर, स्टाम्प ड्यूटी आदि टैक्स आते हैं।
सरकार को इन सबसे आमदनी होती है, जिससे सरकार बजट बनाती है। मध्यम और उच्च वर्ग में फैली ये ग़लत धारणा कि उनके टैक्स के पैसों से देश चलता है, हर साल की कर वसूली के आँकड़ों को देखते ही धाराशाही हो जाती है।
वित्त वर्ष 2017-18 की बात करें तो कुल कर उगाही 19,46,119 करोड़ रुपये थी। इसमें कॉरपोरेशन कर 5,63,744 करोड़ रुपये था और आयकर 4,41,255 करोड़ रुपये था। अगर कुल बजट के प्रतिशत के हिसाब से देखें तो आयकर वसूली कुल बजट का मात्र 22% हुई थी। यही वह 22% है जिसके लिए मध्यवर्ग और उच्चवर्ग यह सोचते हैं कि वही देश चला रहे हैं, बाक़ी तो बोझ हैं। दूसरी तरफ़़ अगर देखा जाये तो इसी दौरान अप्रत्यक्ष करों से 9,41,119 करोड़ रुपये की आय हुई थी। जिससे सरकार को 2017-18 में कुल राजस्व की 48% प्राप्ति हुई थी।
पर यह पूरी तस्वीर नहीं है। दरअसल ऊपर जिस कॉरपोरेशन कर (जो कि कुल राजस्व का 29% है) की बात की गयी है, वो भी जनता को चुकाना पड़ता है। कॉरपोरेशन टैक्स किसी कम्पनी के कुल मुनाफ़़े पर लगने वाला कर है। भारत में यह 30% की दर से लगता है तथा इस पर सरचार्ज व सेस भी लगता है। कम्पनी द्वारा चुकाया गया कर वास्तव में किसके द्वारा चुकाया जाता है, क्योंकि कम्पनी एक व्यक्ति नहीं है? वास्तव में इसका भुगतान भी उस ग्राहकों को करना पड़ता है, जो वो उत्पाद ख़रीदते हैं। माल के पैदा होने की प्रक्रिया में उसके मूल्य में वृद्धि श्रम के द्वारा पैदा होती है, जो देश के करोड़ों मज़दूरों-कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। इस दाम में हुई वृद्धि का बहुत छोटा हिस्सा मज़दूर को मज़दूरी के रूप में मिलता है, बाक़ी अलग-अलग स्तरों पर फ़ैक्टरी मालिक, थोक विक्रेता, ख़ुदरा विक्रेताओं आदि के बीच मुनाफ़़े के रूप में बँटता है। इस प्रकार मुनाफ़़े पर दिया गया कर भी दरअसल मज़दूर द्वारा पैदा किये गये मूल्य पर प्राप्त मुनाफ़़े पर होता है। साथ ही मुनाफ़़ा वसूली (प्रॉफि़ट रियलाइजे़शन) उत्पाद के बिकने की प्रक्रिया में ही होता है। अगर कोई 100 रुपये का सामान ख़रीदता है जिसकी मज़दूरी सहित लागत 60 रुपये है और बाक़ी 40 रुपये अलग-अलग स्तरों पर मुनाफ़़े के रूप में बँटते हैं तो उस मुनाफ़़े पर अलग-अलग स्तरों पर दिया गया टैक्स ग्राहक द्वारा सामान के बदले दिये गये पैसे (100 रु.) से ही दिये जाते हैं। क्योंकि मुनाफ़़ा मूल्य वृद्धि (वैल्यू एडिशन) और माल विक्रय (वैल्यू रियलाइजे़शन) की चक्रीय प्रक्रिया में ही पैदा होता है, जबकि फ़ैक्टरी मालिक, थोक विक्रेता, ख़ुदरा विक्रेता आदि इस प्रक्रिया में बस बीच के माध्यम के रूप में काम करते हैं। अगर माल पैदा हो पर उसको ग्राहक न ख़रीदे तो उस पर कुछ मुनाफ़़ा नहीं होगा, फिर मुनाफ़़े पर कर देने का सवाल ही पैदा नहीं। इस प्रकार कॉरपोरेशन कर अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता से ही वसूला जाता है। इसको भी अगर जनता द्वारा चुकाये गये अप्रत्यक्ष करों में जोड़ दिया जाये तो आम जनता ही कुल राजस्व का 78% भाग चुकाती है।
कुछ लोग कह सकते हैं कि अप्रत्यक्ष कर भी तो मध्यवर्ग और उच्च वर्ग द्वारा ही ज़्यादा दिया जाता है। यह सच है कि अप्रत्यक्ष कर उन सभी को देना पड़ता है जो कोई सामान ख़रीदते हैं, सेवा का उपभोग करते हैं। लेकिन अगर हम भारत में आयकर देने वाले करदाताओं का स्लैब देखें, तो पता चलता है कि भारत में आयकर देने वाला वर्ग बहुत छोटा है। 2015-16 के अनुसार केवल 1.7% लोग आयकरदाता हैं। इसलिए निम्न मध्यवर्ग और निम्न वर्ग से ज़्यादा ख़र्च करने के बावजूद इस कुल 1.7% आबादी द्वारा अप्रत्यक्ष कर में योगदान बहुत कम है।
इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि इस देश में एक भिखारी भी टैक्स देता है। अब एक और सवाल पूछा जा सकता है कि आखि़र एक व्यक्ति या परिवार औसतन कितना कर देता है?
इस सवाल का जवाब काफ़ी अचम्भित करने वाला है, ये एक ऐसी सच्चाई है जिस पर हमेशा पर्दा डालने को कोशिश की गयी है। अगर आप आयकर देते हैं तो आपको पता होता है कि आपने साल में कितना टैक्स दिया, पर अगर आप यह जानना चाहे कि आपने साल में कितना अप्रत्यक्ष कर दिया तो ये बहुत मुश्किल है। यहाँ हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि एक व्यक्ति कितना अप्रत्यक्ष कर देता है। फे़डरेशन ऑफ़ इण्डियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री (फि़क्की) द्वारा 2007 के एक अध्ययन के मुताबिक़ किसी उत्पाद के दाम का औसतन 35% टैक्स होता है। तबसे आज तक कई बार टैक्स बढ़ाया जा चुका है, व कई तथाकथित टैक्स सुधार भी हो चुके हैं। आज पेट्रोल उत्पादों पर 100% से भी ज़्यादा टैक्स है, बाक़ी सामानों पर भी टैक्स पहले से काफ़ी बढ़ाया जा चुका है, इसलिए ये 35% का आँकड़ा आज 40 से 45% तक पहुँच गया है। एक मोटा-मोटी गणना के लिए अगर हम आज के परिप्रेक्ष्य में ख़र्च पर औसत 30% कर की दर लेकर चले (क्योंकि कुछ ख़र्च टैक्स की सीमा से बाहर हैं व कुछ पर टैक्स कम है) तो भी चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है।
अगर एक व्यक्ति की आय 5 लाख रुपये सालाना है जिसमें वो 4 लाख परिवार के वहन में ख़र्च कर देता है बाक़ी कुछ पैसे बचत करता है। इस हिसाब से उसको आयकर कितना देना पड़ेगा?
ढाई लाख से ऊपर की आमदनी का 5% जो कि 12500 रुपये होता है। अब देखते हैं कि उसको अप्रत्यक्ष कर कितना देना पड़ता है। अगर 4 लाख रुपये सामानों और सेवा के ऊपर ख़र्च करता है तो 30% के हिसाब से उसको क़रीब 1,20,000 रुपये टैक्स अप्रत्यक्ष कर के रूप में देना पड़ेगा। इस राशि की तुलना में आयकर कुछ भी नहीं है। स्पष्ट है कि एक मध्यम आय वाले व्यक्ति को आयकर के मुकाबले क़रीब 10 गुना ज़्यादा अप्रत्यक्ष कर देना पड़ता है। हर साल बजट आने पर लोग यह तलाशते हैं कि आयकर की दर कम हुई कि नहीं, जबकि सबसे बड़ा कर का बोझ अप्रत्यक्ष कर का होता है।
एक व्यक्ति जिसकी आमदनी ढाई लाख तक है उसको आयकर नहीं देना पड़ता, पर उसको क़रीब 75,000 रुपये अप्रत्यक्ष कर देना होता है। इस देश का एक मज़दूर परिवार जिसमें दो लोग 10 हज़ार रुपये की मज़दूरी करते हैं और साल में 2,40,000 रुपये कमाते हैं जो सारा उनके ऊपर व्यय होता है, ऐसे में वो 72,000 रुपये टैक्स के रूप में सरकार को देते हैं। यह बात साफ़़ है कि अप्रत्यक्ष कर प्रत्यक्ष कर से ज़्यादा चिन्ताजनक है। इसका एक कारण और है। अप्रत्यक्ष कर की दर सबके लिए समान रहती है, जिससे एक मज़दूर भी उसी दर से टैक्स दे रहा होता है, जिस दर से उसका अरबपति मालिक। इसको समझने के लिए भी एक उदाहरण ले सकते हैं। एक मज़दूर परिवार की आय अगर ढाई लाख सालाना है और ख़र्च 2 लाख है तो उसको 60 हज़ार अप्रत्यक्ष कर देना होता है। वहीं अगर एक मालिक की आय 1 करोड़ रुपये सालाना है और ख़र्च 30 लाख रुपये है (आमदनी बढ़ते जाने पर बचत का हिस्सा बढ़ता जाता है) तो इस हिसाब से उसको 9 लाख अप्रत्यक्ष कर देना होता है। ये देखने में काफ़ी ज़्यादा लगता है लेकिन दोनों स्थितियों की तुलना करें तो मज़दूर परिवार अपनी कुल आय का 24% अप्रत्यक्ष कर में देता है, जबकि मालिक अपनी कुल आय का 9% अप्रत्यक्ष कर में देता है। यहाँ पर प्रत्यक्ष कर भी जोड़ा जा सकता है, लेकिन उसमें दाँव-पेंच की काफ़ी गुंजाइश होती है, अपनी आय कम दिखाना, फ़र्ज़ी डोनेशन, ऋण दिखाना आदि तरीक़़ों का व्यापक इस्तेमाल करके मालिक अपनी आय का काफ़ी हिस्सा छुपा लेता है। यही कारण है कि भारत में आयकरदाताओं की संख्या इतनी कम है। वास्तव में मालिक इन तिकड़मों का इस्तेमाल कर 10-15% के आसपास ही आयकर देते हैं। इसको भी ऊपर की संख्या में जोड़ दें तो भी मालिक अपनी आय का कुल 20-25% ही टैक्स देते हैं। इस प्रकार एक मज़दूर और एक अरबपति दोनों को अपनी आय का लगभग समान हिस्सा कर के रूप में देना पड़ता है, जबकि मज़दूर परिवार की आय ही बहुत कम होती है। स्पष्ट है कि यह कराधान प्रणाली आम जनता/मज़दूरों के लिए काफ़ी अन्यायपूर्ण है।
ऊपर के आँकड़ों से ये बात साफ़़ हो जाती है कि देश के कुल राजस्व का क़रीब 80% देश की आम जनता की जेबों से आता है। ऐसे में उच्च मध्यम वर्ग व उच्च वर्ग का ये दम्भ भरना कि देश को वही लोग चला रहे हैं – बिल्कुल बेबुनियाद और बेवक़ूफ़ी भरा है। इस देश की करोड़ों आम मेहनतकश जनता के दम पर यह देश चलता है। उनकी मेहनत के दम पर भी और उनके पैसे के दम पर भी। वास्तव में ये मालिक लोग ही हैं जो देश के ऊपर बोझ हैं, जो ख़ुद कुछ भी पैदा नहीं करते और आम जनता की मेहनत को निचोड़कर अन्धाधुन्ध सम्पत्ति बटोरते हैं।

377 कलम भारतीय परम्परा के विरोध मे जा रही हे सरकार

#डेंज़रस_सोसाइटी
अगर मैं अप्राकृतिक यौन संबंधों का विरोध करूँ तो कथित प्रगतिशील तबका बिना एक मिनट की देरी किए मुझे कट्टरपंथी मुस्लिम, दकियानूसी अनपढ़ जाहिल घोषित कर देगा । परंतु सच्चाई ये है कि अननेचुरल सेक्स या गे अथवा लेस्बियन कल्चर के लिए रंग विरंगे झंडे लेकर प्रोटेस्ट करने वाले कथित प्रगतिशील इतने पिछड़े इतने अनाड़ी हैं कि यदि इनसे इस विषय पर बात करो तो इनके पास सिवाय वेस्टर्न कल्चर की मिसाल देने के अलावा कोई जानकारी कोई जगरुकता कोई आंकड़ा नहीं मिलता । बहरहाल इन प्रगतिशीलों को छोड़िए आइये हम आप इस विषय पर अपने सीमित ज्ञान के मद्देनज़र कुछ प्रकाश डालते हैं और इस केस की पेंचीदगियां समझते हैं ।

सबसे पहले तो ये जान लीजिए कि अप्राकृतिक सेक्स कहते किसे हैं ? मैथुन के कई प्रकार होते हैं
1- हस्थ मैथुन - धार्मिक और नैतिक लिहाज से देखा जाये तो हस्त मैथुन भी अपराध के दायरे में आता है परंतु संवैधानिक रूप से यह अपराध नहीं है । दूसरी बात मैथुन का यह तरीका सबसे सेफ और सिक्योर है, इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि हस्थ मैथुन में आपको किसी पार्टनर की ज़रूरत बिलकुल नहीं होती, हस्थ मैथुन करने हेतु आपको सिर्फ अच्छी इमैजिनेशन पॉवर की ज़रूरत होती है फिर आप अपनी कल्पनाओं में दुनियां की बड़ी से बड़ी हस्ती के साथ मैथुन का मज़ा ले सकते हैं पर याद रहे मैथुन के बाद किसी भी तरह की ग्लानि से बचें ।

अविवाहित, तलाकशुदा, विधवा अथवा विधुर लोगों के लिए मैथुन का यह तरीका बहुत ही कारगर है । इसकी बुराई यह है कि हस्त मैथुन करने के आदी लोग अधिकतर एकाकी हो जाते हैं और जैसे जैसे एकाकी होते हैं मैथुन की अति कर देते हैं, अति मैथुन के कारण उनमें कुछ कमज़ोरी आ जाती है जिसका फायदा नीम हकीम बचपन की गलतियां बताकर नपुंषकता का डर दिखा कर खूब उठाते हैं ।

2- दूसरा है मुख मैथुन - मुख मैथुन कानूनी या सामाजिक अथवा नैतिक आधार पर अपराध हो या न हो पर यह बहुत ही घातक है इससे कई तरह के जख्म कई तरह के इनफेक्शन कई तरह की बीमारियाँ जिनमें कैंसर भी शामिल है आपको लग सकती हैं इसलिए इससे बचें तो बेहतर है । हालांकि सामाजिक दृष्टिकोण से घिनावना होने को बावजूद आज पोर्न मूवी और पोर्न साहित्य के दौर में मुख मैथुन आम हो चला है ।

3- तीसरा है नैचुरल योनिक क्रिया जिससे यह सृष्टी चलती है यह प्राकृतिक क्रिया पशु, कीट, मत्स्य सभी करते हैं । यह क्रिया धर्मानुसार, नैतिकतानुसार, एवं दुनियाँ भर के देशों में उनके संविधान के अनुसार बिलकुल भी ग़लत या पाप नहीं है बल्कि पुण्य है ।

4- गुदा मैथुन - गुदा मैथुन हमारे धर्म शाष्त्रों, हमारी सामाजिक मान्यताओं और हमारे देश के संविधान में धारा 377 के तहत कानूनन अपराध । आमतौर पर इसी गुदा मैथुन को अन नेचुरल सेक्स कहा जाता है । परंतु दो महिलाओं द्वारा एक दूसरे को संतुष्ट करने की क्रिया भी अन नेचुरल सेक्स के दायरे में आती है या नहीं आती या किस तरह आती है मुझे नहीं मालूम, जिसे मालूम हो वह कमेंट में जानकारी साझा करे ।

गुदा मैथुन हमारे देश में या दुनियाँ भर में आज से नहीं सदियों से है. यदि इस्लामिक दस्तावेजों की मानें तो कौमे लूत का खात्मा गुदा मैथुन की अधिकता के कारण ही हुआ था । यदि आप अपने आस पास नज़र दौड़ायेंगे तो दो चार पुरुष ऐसे मिल जायेंगे जो गुदा मैथुन करवाने के आदी होते हैं । गुदा मैथुन करवाने के आदी यह लोग सबसे आसान शिकार किशोर उम्र बच्चों को बनाते हैं क्यूँ कि किशोरावस्था में कामोत्तेजना अधिक होती है किसी हल्के से स्पर्ष भर से लिंग में तनाव आ जाता है । चूंकि गुदा मैथुन करवाने के आदी लोगों में भी पुरुषत्व होता है लिहाजा किशोरों और बालकों को बहला फुसला कर उनकी कामोत्तेजना बढ़ाकर या ब्लैकमेल करके यह लोग उसको भी गुदा मैथुन करवाने का आदी बना देते हैं और इस तरह एक गुदा मैथुन करवाने वालों की एक नई पीढ़ी तय्यार होती है ।

गुदा मैथुन करवाने वाले लोग वेश्याओं से भी अधिक निर्लज्ज होते हैं यह लोग कहीं भी बस में ट्रेन में बाज़ार में माता के जागरण तक में अपने शिकार की तलाश में लगे रहते हैं, इनकी नज़रें अति कामुक पुरुषों को तुरंत पहचान लेती हैं और ये उसी जगह पर बिना भीड़ की परवाह किए छेड़छाड़ करके उत्तेजित करना शुरू कर देते हैं और फिर किसी एकांत की तरफ निकल जाते हैं ।

आज के दौर में यदि अनसेफ सेक्स का कोई सर्वे किया जाये तो गुदा मैथुन उसमें पहला स्थान पायेगा, मेरा दावा है एड्स जैसा गंभीर रोग वेश्याओं से, ट्रक ड्राइवरों से उतना नहीं फैलता जितना इन गुदा मैथुन करने और करवाने वालों से फैलता है । यह दावे मैं हवा हवाई नहीं कर रहा हूँ चूँकि मैं देश के कोने कोने में घूमा हूँ आखों से देखा है गहन विचार किया है तब कह रहा हूँ ।

मिसाल के तौर पर मुंबई में वेस्टर्न लाइन पर मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन विश्व भर में प्रशिद्ध है सबसे ज़्यादी भीड़ भाड़ वाले स्टेशनों में से एक है यहाँ से प्रतिदिन सैकड़ों लोकल और मेल ट्रेनें गुजरती हैं लाखों लोग रोज़ विजिट करते हैं पर इसी स्टेशन के मुख्य द्वार से लगा मेन रोड पर एक शौचालय है उस शौचालय में जो मुत्रालय है उसकी व्यस्तता का अंदाज़ा आप इसी से लगाइए कि हर मिनट एक व्यक्ति भीतर जाता है एक आता है । परंतु इतनी भीड़ के बावजूद वहाँ पर गुदा मैथुन के आदी लोग मौका मिलते ही अपना काम कर जाते हैं । यदि आप पेशाब करने गए और आप पेशाब करने के उपरांत एक मिनट भी रुक गए तो वहाँ पहले से खड़े लोग आपको अपने जैसा समझ कर गुदा मैथुन मुख मैथुन करना शुरू कर देंगे उसी में से कोई आपका लिंग भी पकड़ लेगा या आपके सामने अपना लिंग लहराना शुरू कर देगा ।

ये तो उदाहरण मात्र है वरना मुंबई के हर शौचालय में बने मुत्रालय का यही हाल है इसी कारण से रात के नौ दस बजते ही प्रत्येक मुत्रालय में ताला लग जाता है फिर स्वच्छ भारत अभियान गया तेल लेने यदि आपको आई है तो कहीं कोने में हल्का हो लीजिए ।
इसके अलावा वेश्यावृति मे लगे बहुत से किन्नर भी अपने ग्राहकों को गुदा मैथुन या मुख मैथुन से ही संतुष्ट करते हैं पर ध्यान रहे कि यह लोग भी सुरक्षा का ध्यान न के बराबर रखते हैं बल्कि यह लोग गे पुरुषों से अधिक घातक होते हैं इनसे पुलिस भी डरती है ।

भाई साहब ये हाल तब है जब गुदा मैथुन धारा 377 के तहत अपराध है । अब आप सोचिये यदि गुदा मैथुन को अपराध की श्रेणी से निकाल दिया गया तब क्या होगा ? क्यूँ कि महिला भले कितनी पतित क्यूँ न हो वेश्या क्यूँ न हो परंतु उसमें कहीं न कहीं थोड़ी सी लज्जा होती है परंतु पुरुषों में यह रंच मात्र भी नहीं होती । इसी लिए मुझे लगता है यदि गुदा मैथुन को लीगलाइज़ किया गया तो गुदा मैथुन के दृष्य चौराहों और सड़कों पर भी दिखाई देने लगेंगे ।

बकिया गुदा मैथुन भले ही अपराध है मगर बहुत से कपल आपसी सहमति से गुदा मैथुन इंजॉय करते हैं । इसी तरह यदि दो पुरुष भी आपसी सहमति से बंद कमरे में गुदा मैथुन या मुख मैथुन करते हैं तो उन्हें देखने या रोकने वाला कौन है फिर उन्हें किसी कानून और प्रमाण की आवश्यकता क्यूँ है ये बात मेरी समझ के बाहर है । क्यूँ कि हमारा संविधान किसी महिला को किसी महिला के साथ या किसी पुरुष को किसी पुरुष के साथ रूम शेयर करने से नहीं रोकता, बड़ी संख्या में बैचलर महिलायें और पुरुष समान लिंगी मित्रों के साथ एक ही रूम में रहते हैं समाज भी उनपर कोई शक़ नहीं करता फिर ऐसो लोगों को अलग पहचान क्यूँ चाहिए पता नहीं ।
रही बात सम लैंगिकता की तो मैं ऐसी महिलाओं को भी जानता हूँ जो रूम मेट हैं, आपस में बहन हैं, मां बेटी हैं और वे एक दूसरे को संतुष्ट कर लेती हैं परंतु मुंबई के मुत्रालय जैसी अराजकता नहीं फैलाती वे 377 का विरोध नहीं करती क्यूँ कि वे सेक्स के प्रति उदार हैं और अब्नॉर्मल नहीं हैं ।

अब जो लोग समलैंगिक संबंधों की वकालत कर रहे हैं मैं उनसे पूछना चाहता हूँ क्या उन्होंने कभी इस पहलू पर भी गौर किया है ? यदि नहीं किया तो अब करें । और समलैंगिंग रिश्तों को यदि मान्यता मिल जाये तो ध्यान रखें मुंबई के मुत्रालय जैसा हाल पूरे देश का न हो जाये । समलैंगिंक संबंधों की मान्यता उन्हीं दो लोगों को ही मिले जो कानूनी रूप से रजिस्टर्ड हों ताकि वे रोज़ नए नए शिकार न कर सकें, देश एक बड़ी आबादी के साथ छेड़ छाड़ न कर सकें और किसी मुत्रालय में यदि कोई अन्य व्यक्ति जाये तो उसे असहजता न हो ।

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