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Friday, 18 August 2017

भारत में नवउदारवाद की चौथाई सदी

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*भारत में नवउदारवाद की चौथाई सदी : पृष्ठभूमि और प्रभाव*
✍ *आनन्द*
ऑनलाइन लिंक - http://ahwanmag.com/archives/7093
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2016 के जुलाई महीने में तथाकथित आर्थिक सुधारों की शुरुआत के 25 वर्ष पूरे हो गये। 1991 में जुलाई के महीने में ही तत्कालीन नव-निर्वाचित कांग्रेस सरकार का नेतृत्व कर रहे पी. वी. नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मन्त्री मनमोहन सिंह की जोड़ी ने भारत की अर्थव्यवस्था के स्वरूप में ढाँचागत बदलावों की आधारशिला रखी थी और उदारीकरण, निजीकरण व भूमण्डलीकरण की नीतियों को सुसंगत ढंग से लागू करने की शुरुआत की थी। इन नव-उदारवादी नीतियों की शुरुआत के 25 वर्ष पूरे होने पर भारत के शासक वर्ग और उसके हित साधने वाले बुद्धिजीवियों, अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों ने जमकर जश्न मनाया। देश के प्रमुख अख़बारों में ढेरों लेख लिखे गये और टीवी चैनलों पर तमाम कार्यक्रम आयोजित किये गये जिनमें इन तथाकथित सुधारों की मुक्त कंण्ठ से प्रशंसा की गयी। अधिकांश लेखों और टीवी कार्यक्रमों में यह मानकर चला गया कि इन सुधारों से देश का भला हुआ और हर तबके की जिन्दगी ‍बेहतर  हुई। अगर कोई बहस थी तो वह इस बात को लेकर थी कि इन सुधारों की  रफ़्तार संतोषजनक रही अथवा नहीं। कुछ कार्यक्रमों में बहस का दिखावा करने के लिये इन तथाकथित सुधारों के आलोचक के तौर पर संसदीय जड़वामन वामपन्थियों को भी आमंत्रित किया गया। ये जड़वामन विदूषक नवउदारवाद के खिलाफ़़‍ गत्ते की तलवार भाँजते  वक्त इस सच्चाई को बेशर्मी से दबा गये कि नवउदारवाद के इन 25 वर्षों में वे खुद केन्द्र  और राज्य दोनों ही स्तरों पर नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के पाप में भागीदार रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने नवउदारवाद की जो आलोचना प्रस्तुत की उसमें भी इस प्रकार के कुतर्क किये मानो 1991 के पहले भारत में समाजवादी व्यवस्था थी और देश की जनता खुशहाली में जी रही थी। नवउदारवाद का विरोध करते हुए समाधान के तौर पर ये जड़वामन उसी नेहरूवादी समाजवाद के युग की वापसी के लिये तर्क गढ़ते हैं, जोकि अब मुमकिन नहीं है।

*नवउदारवादी नीतियों के लागू होने की पृष्ठभूमि*

सच्चाई तो यह है कि 1991 में नवउदारवादी नीतियों को सुसंगत ढंग से लागू करने की जो शुरुआत हुई थी वो *आज़ादी के बाद से जारी पब्लिक-सेक्टर पूँजीवाद के संकट से निजात पाने के लिये भारत के पूँजीपति वर्ग की सोची-समझी रणनीति थी और इस रूप में नवउदारवादी नीतियाँ तथाकथित नेहरूवादी समाजवादी नीतियों की तार्किक परिणति थीं।* 1947 में भारत के नवजात बुर्जुआ वर्ग ने सत्ता तो हासिल कर ली थी, लेकिन उस समय वह इतना परिपक्व नहीं था कि वह अपने दम पर देश में बुनियादी और अवरचनागत उद्योगों का ताना-बाना खड़ा कर सकता। साथ ही भारत का पूँजीपति वर्ग अपनी राजनीतिक आज़ादी को भी खोना नहीं चाहता था और इसलिये वह पूरी तरह से विदेशी पूँजी पर निर्भर नहीं होना चाहता था। इसी वजह से आज़ादी के पहले ही *1944 में जारी बॉम्बे  प्लान या टाटा-बिड़ला प्लान में भारत में पब्लिक सेक्टर के प्रभुत्व  वाले पूँजीवादी विकास के रास्ते की बात की गयी थी जिसमेंं जनता की हाड़-तोड़ मेहनत से अर्जित की गयी बचत से पूँजीवादी विकास की आधारशिला तैयार करने का ब्लूप्रिंण्ट मौजूद था। आज़ादी के बाद भारत के पूँजीपति वर्ग ने इसी ब्लूप्रिंण्ट पर अमल करते हुए पब्लिक-सेक्टर पूँजीवाद का रास्ता  अपनाया जिसमेंं बुनियादी और अवरचनागत उद्योगों- जिनमें फ़टाफ़ट मुनाफ़ा नहीं कमाया जा सकता था में पब्लिक सेक्टर (सार्वजनिक क्षेत्र) की प्रमुख भूमिका और उपभोक्ता  वस्तुओं के उत्पादन -जिसमेंं फ़टाफ़ट मुनाफ़ा कमाया जा सकता था -में निजी क्षेत्र की प्रमुख भूमिका तय की गयी।* यानी पब्लिक सेक्टर को अर्थव्यवस्था की कमाण्डिंग चोटियों पर होना था। इसके साथ ही इस मॉडल का अहम पहलू आर्थिक स्वावलम्बन के लिये आयात प्रतिस्थापन की नीति थी जिसके तहत विदेशी वस्तुओं के आयात पर नियंत्रण के लिये पाबन्दियों के प्रावधान किये गये। चूँकि उस दौर में दुनिया भर में समाजवाद की ज़बर्दस्त लोकप्रियता थी, इसलिये भारत के शासक वर्ग ने अपने पूँजीवादी चरित्र को ढँकने के लिये और आम जनता की आँख में धूल झोंकने के लिये इस राज्य  पूँजीवाद को निहायत ही धूर्ततापूर्ण ढंग से समाजवाद का नाम दिया।

पब्लिक सेक्टर पूँजीवाद ने देश के पूँजीवादी विकास के लिये आवश्यक बुनियादी और अवरचनागत क्षेत्रों का विकास तो किया, लेकिन जल्द ही पूँजीवादी विकास के इस मॉडल के अन्तर्विरोध भी सामने आने लगे। 1951-1965 तक औद्योगिक उत्पादन में तेज़ी देखने के बाद 1960 के उत्तरार्द्ध में भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गयी और 1970 के दशक में भी मन्दी का ही दौर रहा। पब्लिक सेक्ट‍र पूँजीवाद का जो ढाँचा आज़ादी के फ़ौरन बाद पूँजीपति वर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए खड़ा किया गया था, वही अब पूँजी के निर्बाध प्रवाह में अड़चनें पैदा कर रहा था और परिपक्व  होते पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े की अन्तहीन हवस की राह में बाधा बनने लगा था।

1970 के दशक से ही पूँजीपतियों के हितों की नुमाइन्दगी करने वाले बुद्धिजीवी और अर्थशास्त्री भारत की अर्थव्यवस्था में लाइसेंस-परमिट राज के रूप में राज्य की दखलन्दाज़ी की और पूँजीपतियों के उपक्रमों में मुनाफ़ा कमाने की सीमाओं पर लगी तमाम पाबन्दियों (मसलन एमआरटीपी नियंत्रण, आयात पर लगे नियंत्रण, कीमतों पर नियंत्रण,प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआयी) पर लगे नियंत्रण आदि) एवं जनता को दी जाने वाली सब्सिडी की आलोचना करने लगे थे और भारतीय अर्थव्यवस्था  में बेरोकटोक मुनाफ़ा कमाने के लिये ऐसी सारी जकड़नों को तोड़कर नंगे रूप में मुक्त बाज़ार वाले पूँजीवादी मॉडल की पैरोकारी करने लगे थे (उदाहरण के लिये जगदीश भगवती और पद्मा देसाई)। कम ही लोग यह जानते हैं कि वास्तव में 1991 में सुसंगत ढंग से नवउदारवादी नीतियों का आग़ाज़ करने से पहले ही एक सीमित स्तर पर इन नीतियों की शुरुआत 1980 के दशक में ही हो चुकी थी। 1980 के दशक के मध्य  में राजीव गाँधी सरकार ने एक सीमित हद तक अर्थव्यवस्था  का उदारीकरण किया था जिसके तहत 30 उद्योगों में लाइसेंस की आवश्यकता हटायी गयी थी, एमआरटीपी की सीमा (पूँजीवादी घरानों के मुनाफ़े पर लगी पाबन्दी  को लचीला किया गया था और आयात पर प्रतिबन्धों में छूट दी गयी थी।

लेकिन सुसंगत ढंग से उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्डलीकरण की नवउदारवादी नीतियों का आग़ाज़ 1991 में नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी ने किया। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था भुगतान सन्तुलन के भीषण संकट से गुज़र रही थी। विदेशी मुद्रा भण्डार तेजी से घटकर लगभग 1 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया था जो महज़ 2 सप्ताह तक का आयात कर सकने में सक्षम था। भारत के विदेशी कर्ज़ में डिफ़ॉल्टर की नौबत आ गयी थी। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में हालाँकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पहले के मुक़ाबले तेज़ी देखने को आयी थी, लेकिन यह तेज़ी राजकोषीय प्रेरण की वजह से आयी थी जिसकी वजह से राजकोषीय घाटा भी बढ़कर जीडीपी के 10 प्रतिशत के आसपास पहुँच गया था। इस राजकोषीय घाटे को पाटने के लिये विदेशों से ऋण लिये गये जिसकी वजह से देश के कुल बाहरी कर्ज़ में ज़बर्दस्त बढ़ोत्तरी हुई। बाहरी कर्ज़ जो 1984-85 में 35 बिलियन डॉलर था, 1990-91 तक बढ़कर 69 बिलियन डॉलर हो गया था। 1990 में खाड़ी युद्ध की वजह से तेल की क़ीमतों में उछाल और अप्रवासी भारतीयों द्वारा वापस देश में भेजी जाने वाली रक़म (रेमिटांसेज़) में कमी ने इस समस्या को और गम्भीर कर दिया।

अर्थव्यवस्था के इस गम्भीर संकट ने भारत के शासक वर्ग को वह मौका दिया जिससे वह नेहरूवादी समाजवाद (पढ़िये राज्य पूँजीवाद) के लबादे को उतार फेंकने की हसरत को पूरी कर सका और यह वह परिस्थिति थी जिसमेंं नवउदारवाद की नीतियों पर अमल करने की खुले आम घोषणा की गयी। राजकोषीय घाटे पर क़ाबू पाने के नाम पर सरकार के कल्याणकारी मद में भारी कटौती की घोषणा की गयी — जिसका सीधा असर आम जनता की ज़िन्दगी पर पड़ने वाला था। इससे भी अहम बदलाव तथाकथित संरचनागत सुधार के रूप में किये गये जिसके तहत तथाकथित लाइसेंस-परमिट राज की पुरानी व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए 18 क्षेत्रों के अलावा अन्य सभी क्षेत्रों में लाइसेंस की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र के लिये आरक्षित उद्योगों की संख्या को 17 से कम करके 8 कर दिया गया (जिसे बाद के वर्षों में और कम किया गया)। सार्वजनिक उपक्रमों को औने-पौने दामों में निजी हाथों में देने के लिये विनिवेश की प्रक्रिया आरम्भ की गयी। विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन देने के नाम पर आयात शुल्क में भारी कटौती की घोषणा की गयी। विदेशी निवेश पर लगी पाबन्दियों को क्रमश: कम से कम करने की शुरुआत की गयी। इसके अतिरिक्त कर सुधारों और वित्तीय क्षेत्र के सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर की गयी और आने वाले वर्षों में इस प्रतिबद्धता को पूरा करते हुए धनिकों पर लगने वाले करों में भारी कटौती की गयी एवं वित्तीय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निजी खिलाड़ियों को उतारने के लिये अनुकूल माहौल बनाया गया।

भारतीय अर्थव्यवस्था में संरचनागत बदलाव लाने वाली नवउदारवादी नीतियों का अन्तरराष्ट्रीय परिवेश भी समझना बेहद ज़रूरी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में नवउदारवाद की शुरुआत 1970 के दशक में हुई जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उभरे साम्राज्यवाद के नये चौधरी अमेरिका की अर्थव्यवस्था 1950 के दशक और 1960 के दशक के शुरुआती वर्षों के दौरान अपना स्वर्ण ‍युग देखने के बाद मन्दी के भँवरजाल में आ फँसी थी। विश्व पूँजीवाद के इस स्वर्ण-युग की मुख्य  वजह द्वितीय विश्वयुद्ध में हुई बड़े पैमाने पर तबाही से उत्पन्न हुई निवेश की नयी सम्भावनाएँ थीं। इस सम्भावना का भरपूर लाभ उठाते हुए विशेषकर अमेरिका के पूँजीपति वर्ग ने जमकर मुनाफ़ा कमाया और दुनिया भर में कम्युनिस्ट आन्दोलन के उभार से अपने देश के मज़दूर वर्ग को बचाने के मक़सद से कल्याणकारी राज्य की कीन्सियाई नीतियों को अपनाते हुए इस मुनाफ़े का एक हिस्सा  मज़दूर वर्ग को रियायत भी दी।

लेकिन 1960 के दशक के उत्तरार्द्ध में इस कीन्सियाई नुस्ख़े की हवा निकलनी शुरू हो चुकी थी। 1970 के दशक तक आते-आते अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह मन्दी के भँवरजाल में फँस चुकी थी। साथ ही साम्राज्यवादी विश्व में अमेरिका की चौधराहट पर भी बुरा असर तब पड़ा जब डॉलर-गोल्ड स्टैं्डर्ड (जिसके तहत विदेशी व्यापार में डॉलर को सोने के समान माना जाता था) ख़त्म हो गया और डॉलर के अलावा कई अन्य  मुद्राओं में विदेशी व्यापार करना सम्भव होने लगा। ये वो हालात थे जिनमें नवउदारवादी युग की शुरुआत होती है जिसके तहत कीन्सियाई कल्याणकारी (वेल्फेयर) राज्य को अलविदा (फेयरवेल) कहा गया और जनता को दी गयी तमाम सहूलियतों और रियायतों को छीनने की क़वायद शुरू की गयी। यह अर्थव्यवस्था के बड़े पैमाने पर वित्तीयकरण का भी दौर था। चूँकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मुनाफ़े की दर अपने संतृप्तता के बिन्दु तक पहुँच चुकी थी, इसलिये मुनाफ़ा कमाने के नये अवसर ढूँढने के लिये पूँजी ने तीसरी दुनिया के देशों की ओर रुख किया। उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं के आन्तरिक संकटों का लाभ उठाते हुए विश्व मुद्रा कोष (आयीएमएफ) और विश्व बैंक के ज़रिये उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं में विदेशी व्यापार और विदेशी निवेश पर लगी तमाम बाधाओं को ख़त्म करने के लिये प्रोत्साहित करते हुए उन्हें़ विश्व  अर्थव्यवस्था से नत्थी किया और राष्ट्र  राज्यों  की सीमाओं के आर-पार पूँजी की बेरोकटोक आवाजाही को सुगम बनाया। तीसरी दुनिया के देशों में नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के पहले प्रयोग लातिन अमेरिकी देशों में हुए। इसी क्रम में भारत में 1991 के भुगतान सन्तुलन के संकट ने ऐसी परिस्थिति पैदा की जिसमेंं भारत में भी नवउदारवाद के युग की शुरुआत हुई। ग़ौरतलब है कि यह ऐसी परिस्थिति थी जिसमेंं भारत के बुर्जुआ वर्ग के हित और साम्राज्यवाद के हित दोनों एक-दूसरे से मिल गये थे। इसलिये ऐसा कहना ग़लत होगा कि साम्राज्यवादियों ने आयीएमएफ और विश्वबैंक के ज़रिये भारतीय बुर्जुआ वर्ग की मर्जी के बगैर उस पर ये नीतियाँ जबरन थोप दी। यह सच है कि आयीएमएफ ने कर्ज़ के बदले में संरचनागत समायोजन कार्यक्रम के तहत उदारीकरण, निजीकरण और भूमण्ड लीकरण की नीतियों को लागू करने की शर्त रखी थी। लेकिन यह भी सच है कि भारत का बुर्जुआ वर्ग खुद भी इन नीतियों का लागू करने की प्रबल इच्छा रखता था और भुगतान संकट ने उसे वह मौका दे दिया जिसका उसने भरपूर लाभ उठाते हुए नेहरूवादी समाजवाद (राज्य पूँजीवाद) का लबादा उतार फेंका और नंगे रूप में अपने असली चरित्र की घोषणा की।

*नवउदारवादी नीतियों का प्रभाव*  

25 वर्ष पहले भारत में नवउदारवादी नीतियों के लागू होने की पृष्ठभूमि जानने के बाद आइये देखते हैं कि इन नीतियों पर अमल से भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के जो लम्बेे-चौड़े दावे किये जा रहे हैं उनमें कितनी सच्चाई है। इन नीतियों के पैरोकार यह दावा करते नहीं थकते कि इनकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था 1965 के बाद से जारी सुस्ती से उबर गयी और उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। मज़े की बात तो यह है कि यह दावा निहायत ही बेशर्मी से आज के दौर में भी किया जा रहा है जब पूरा विश्व  पूँजीवादी मन्दी के भँवरजाल में फँसा हुआ है और पिछले कई वर्षों से भारतीय अर्थव्य वस्था की रफ़्तार भी सुस्त  पड़ चुकी है। जिन आँकड़ों की बाज़ीगरी करके नवउदारवादी नीतियों के बेशर्म पैरोकार तथाकथित आर्थिक सुधारों की तारीफ़ के पुल बाँधते हैं उन्हीं को क़रीब से देखने पर इन दावों का खोखलापन भी साफ़ दिख जाता है। मिसाल के लिये नवउदारवाद के दौर में जीडीपी वृद्धि की दर पर सीना चौड़ा करते वक्त ये पैरोकार यह भूल जाते हैं कि इस वृद्धि के अनुपात में रोज़गार के अवसरों का सृजन नहीं हुआ है। भारतीय अर्थव्यवस्था  के जीडीपी के संघटन की पड़ताल करने से विकास के दावे की पोल खुल जाती है। जीडीपी का 52 प्रतिशत से भी अधिक सेवा क्षेत्र से आता है, जबकि उद्योग का योगदान 30 प्रतिशत से भी नीचे है व कृषि का योगदान 17 प्रतिशत के आसपास है। नवउदारवाद के शुरुआती दौर से भारत का बुर्जुआ वर्ग देश को दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के सपने देखता रहा है। लेकिन इन नीतियों के लागू होने के 25 वर्ष बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का दबदबा यह साफ़ दिखा रहा है कि यह शेखचिल्ली का सपना ही साबित हुआ है। अब मोदी सरकार इसी शेखचिल्ली के पुराने सपने की रीपैकेजिंग करके ‘मेक इन इण्डिया’ के नाम से ज़ोर-शोर से बेच रही है।

*नवउदारवाद के दौर में रोज़गार के आँकड़ों को देखने पर यह साफ़ हो जाता है कि रोज़गार के अवसर अव्वलन तो बहुत कम पैदा हुए, लेकिन जितने रोज़गार पैदा भी हुए उनमें से अधिकांश अनौपचारिक क्षेत्र में पैदा हुए जिसका अर्थ है साम‍ाजिक असुरक्षा में बढ़ोत्तरी।* संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 1991-2013 के बीच भारत में 30 करोड़ रोज़गार चाहने वालों में से आधे से भी कम अर्थात 14 करोड़ को ही काम मिल सका। जिनको काम मिला भी उनमें से 60% को साल भर काम नहीं मिलता। कुल रोज़गार में से सिर्फ 7% ही संगठित क्षेत्र में हैं बाकी 93% असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों को न कोई निश्चित मासिक वेतन मिलता है और न ही प्रोविडेंण्ट फण्ड या कोई अन्य सामाजिक सुरक्षा का लाभ।

नवउदारवाद के पैरोकार पूँजीवादी मीडिया के ज़रिये भले ही आम लोगों को होने वाले लाभों की अफ़वाहें उड़ायें, आँकड़े चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि उदारीकरण के 25 वर्षों के दौरान हुए रोज़गार-विहीन विकास का मुख्य लाभ बड़े पूँजीवादी घरानों को ही हुआ है। इन 25 वर्षों में पूँजी संचय कितनी तेज़ी से बढ़ा है इसे कुछ आँकड़ों से ही समझा जा सकता है। भारत में 1990 के दशक के मध्य में सिर्फ़ 2 अरबपति (डॉलर अरबपति) थे, 2016 तक अरबपतियों की संख्या 111तक पहुँच गयी। इस दौरान अरबपतियों की सम्पत्ति जीडीपी के 1 प्रतिशत से बढ़कर जीडीपी के 10 प्रतिशत से भी अधिक हो गयी। क्रेडिट स्विस की एक हालिया रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि देश की कुल सम्पदा का 50 फ़ीसदी हिस्सा शीर्ष के सिर्फ़ 1 प्रतिशत लोगों के पास इकट्ठा हो गया है। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह नवउदारवादी नीतियों का स्वाभाविक नतीजा है। बड़े पूँजीपतियों के अलावा मध्य वर्ग के एक छोटे से तबके के भी नवउदारवादी नीतियों की वजह से वारे-न्यारे हुए। कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाले पेशेवरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, नामी-गिरामी पत्रकारों, सरकारी नौकरी में उच्च  पदों पर कार्यरत अधिकारियों, ठेकेदारों, सट्टेबाज़ों, दलालों आदि की जमात को इन नीतियों की वजह से ज़बर्दस्त लाभ हुआ। इसी तबके के लिये शॉपिंग मॉल, लक्ज़री अपार्टमेंट, महँगी गाड़ियाँ ‍और विलासिता के अन्य‍ साज़ो-समान पिछले 25 सालों में बहुत तेज़ी से उपलब्ध हुए हैं। यही वजह है कि यह खाया-पीया-अघाया शासक वर्ग का टुकड़खोर तबका व्यापक समाज के दुखों-तकलीफ़ों को नज़र अन्दाज करके इन नीतियों के पक्ष में बेशर्मी से दलीलें पेश करता है।

1991 में नवउदारवादी नीतियों को लागू करने की शुरुआत से ही मनमोहन सिंह और मोन्टेक सिंह अहलूवालिया जैसे बेशर्म पैरोकार लोगों को तसल्ली रखने की सलाह देते आये हैं। वे कहते आयें हैं कि जब समाज के शीर्ष पर सम्पदा इकट्ठी हो जायेगी तो धीरे-धीरे रिसकर समाज के निचले तबकों तक भी पहुँचेगी। सच्चाई इन नवउदारवादी पैरोकारों के विश्ले षण की ठीक उलट है। सच तो यह है कि नवउदारवादी नीतियों की वजह से समाज के शीर्ष पर मुट्ठी भर लोगों के पास जो सम्पदा एकत्र हो रही है, वह बहुसंख्यक आबादी का खून चूसकर, उन्हें  इंसानी जिन्दगी की बुनियादी ज़रूरतों से भी महरूम करके अमानवीय हालात में जीने पर मजबूर करके ही हो रही है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक ने अपने एक अध्ययन में दिखाया है कि नवउदारवाद के दौर में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता तेज़ी से घटकर औपनिवेशिक काल से भी नीचे के स्तर पर जा पहुँची है। नवउदारवाद के पैरोकार प्रति व्यक्ति कैलोरी के मापदण्ड  से आज के दौर में ग़रीबी मापने की बजाय मूल्य सूचकांको का उपयोग करके आँकड़ों की बाज़ीगरी के ज़रिये नवउदारवाद के दौर में ग़रीबी कम होती हुई दिखाते हैं। यदि प्रति व्यक्ति प्रति दिन कैलोरी के वास्तविक मापदण्ड से ग़रीबी की पड़ताल की जाय (2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन शहरों में और 2200 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रति दिन देहातों में) तो हम पाते हैं कि शहरों और देहातों दोनों में नवउदारवाद के दौर में ग़रीबी बढ़ी है। ज़ाहिर है कि इसमें ईंधन, आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि का ख़र्च को शामिल करके सम्पूर्णता में जीवन स्तर को देखने पर परिस्थिति और ख़ौफ़नाक नज़र आयेगी क्यों‍कि निजीकरण की वजह से ये सभी बुनियादी ज़रूरतें नवउदारवाद के दौर में बहुत महँगी हुई हैं। 2004 में अर्जुनसेन गुप्ता  कमेटी की रिपोर्ट में यह तथ्य उभर कर सामने आया था कि देश की 77 फ़ीसदी आबादी बीस रूपये या उससे कम की प्रतिदिन की आमदनी पर गुज़ारा करती है। मज़दूरों और निम्न  मध्यवर्ग के अतिरिक्त  नवउदारवादी पूँजी की मार छोटे मालिकों पर भी पड़ी है। छोटे-मझौले किसान, छोटे दुकानदार और व्यापारी इस दौर में बड़ी संख्या में तबाह और बरबाद होकर सर्वहारा की कतारों में शामिल हुए हैं। किसानों की आत्म हत्याओं की घटनाओं में बढ़ोत्तरी सीधे तौर पर नवउदारवाद का ही नतीजा है। इसके अतिरिक्त नवउदारवादी दौर में खनिज सम्पदा के दोहन के लिये देशी-विदेशी पूँजी को दी गयी छूट की वजह से आदिवासियों को बड़े पैमाने पर उनके जल, जंगल और ज़मीन से तबाह किया गया है। ज़ाहिरा तौर पर अन्य वर्गों की तबाही-बरबादी ही वह कारक है जिसने समाज के शीर्ष पर बैठे पूँजीपति वर्ग की सम्पत्ति नें दिन-दूनी रात-चौगुनी रफ़्तार से इज़ाफ़ा किया है।

नवउदारवाद के उत्साही पैरोकार इन नीतियों के पक्ष में एक अन्य  दलील यह देते हैं कि इनके लागू होने के बाद से भारत के विदेशी मुद्रा भण्डार में ज़बर्दस्त बढ़ोत्तरी हुई है। जहाँ 1991 में विदेशी मुद्रा भण्डार 1 बिलियन डॉलर तक सिमट गया था, वहीं अब वह बढ़कर 360 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया है जो 11 महीनों के आयात के समतुल्य है। यह आँकड़ा भी भ्रामक है क्यों कि इससे यह सच्चांई सामने नहीं आती है कि नवउदारवाद के दौर में 3 वर्षों को छोड़ अन्य वर्षों में देश के भुगतान सन्तुलन के चालू खाते में घाटे की स्थिति रही है। चालू खाते में घाटे का अर्थ यह है कि देश में जितनी विदेशी मुद्रा वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात के ज़रिये आ रही है उससे कहीं  ज्यादा विदेशी मुद्रा वस्तुओं और सेवाओं के आयात के ज़रिये देश से बाहर जा रही है। फिर भी अगर विदेशी मुद्रा भण्डार बढ़ा है तो इसका कारण यह है कि विदेशी निवेशकों और ऋणदाताओं ने ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा और ब्याज़ कमाने के लिये भारत के शेयर बाज़ार में अन्धाधुन्ध निवेश किया है। ज़ाहिर है कि यह निवेश कब वापस ले लिया जायेगा इसका कोई भरोसा नहीं है। अमेरिका में ब्याज़ दरों की दरों के बढ़ने की अटकल होने मात्र से भारत के विदेशी मुद्रा बाज़ार और शेयर बाज़ार में हड़कम्प मच जाता है कि कहीं विदेशी निवेशक अपना निवेश वापस न खींच लें। स्पष्ट है कि मौजूदा समय में पर्याप्त विदेशी मुद्रा भण्डार होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था चन्द विदेशी निवेशकों के रहमोकरम पर निर्भर है, यह पहले से कहीं ज्यादा  ‍अस्थिर है और विश्व अर्थव्यवस्था से नत्थी हो जाने की वजह से संकट की सम्भावना पहले से कई गुना बढ़ गयी है।

जहाँ 1990 के दशक से पहले तक अर्थव्यवस्था़ में विकास का मुख्य इंजन सरकारी खजाने से दिया जाने वाला राजकोषीय प्रेरक था, वहीं नवउदारवादी दौर में विकास को मुख्य प्रेरक बैंकों द्वारा निजी क्षेत्र को दिया जाने वाला कर्ज़ है, जिसे क्रेडिट बुलबुला भी कहा जा रहा है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाज़ार में अन्धाधुन्ध निवेश की वजह से अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरलता की स्थिति पैदा हुई है जिसका लाभ उठाकर बैंकों ने निजी क्षेत्र को (विशेषकर इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में) बेतहाशा ऋण दिये हैं। जहाँ 1989-90 में बैंक क्रेडिट और जीडीपी का अनुपात 22 प्रतिशत था, वहीं अब यह बढ़कर 50 प्रतिशत से भी ऊपर पहुँच गया है। ज़ाहिर है बैंकों द्वारा निजी क्षेत्र को दिये गये ऋण में बेतहाशा बढ़ोत्तरी से उनकी अदायगी में डिफॉल्ट की सम्भावना भी बढ़ी है जिससे समूची अर्थव्यवस्था  की अस्थिरता भी बढ़ी है। बैंकों के नॉन परफार्मिंग एसेट्स (एनपीए, यानी ऐसे ऋण जिनकी अदायगी नहीं हो पा रही है) में बढ़ोत्तरी—पिछले 5 वर्षों में 6 प्रतशित से बढ़कर 11.5 प्रतिशत— हाल में मीडिया की सुर्खियों में रही है जो क्रेडिट बुलबुले के फूटने का सूचक है। ज़ाहिर है जिस जीडीपी वृद्धि के दावे पर नवउदारवाद का पूरा ढाँचा टिका है उसका भी भविष्य अनिश्चित नज़र आ रहा है। 2008 से जारी विश्वव्यापी मन्दी की निरन्तरता की वजह से यह अनिश्चितता और बढ़ी है।

इस प्रकार हम पाते हैं कि नवउदारवाद के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था  शेयर बाज़ार में दुनिया भर के सट्टेबाज़ों की आवारा पूँजी और बैंकों के क्रेडिट के बुलबुले पर टिकी हुई एक जुआघर अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी है। ऐसी जुआघर अर्थव्यवस्था का प्रतिबिम्बन राजनीति और संस्कृति में झलकना लाज़िमी है। यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं है कि नवउदारवाद के पिछले 25 वर्ष भारत में हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार के भी वर्ष रहे हैं। इस फ़ासीवादी उभार के प्रमुख सामाजिक आधार नवउदारवादी  नीतियों से उजड़े निम्न बुर्जुआ वर्ग और उदीयमान खुशहाल मध्य वर्ग रहे हैं। इस फ़ासीवादी उभार ने नवउदारवादी नीतियों को लागू करने से होने वाले सामाजिक असन्तोष व आक्रोश को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ गुस्से के रूप में भटकाकर भारत के बुर्जुआ वर्ग का हितपोषण किया है। साम्प्रदायिक फ़ासिस्ट  ताक़तों द्वारा समाज में फैलाये गये धार्मिक उन्माद की वजह से बुर्जुआ राज्यसत्ता के लिये जनता के अधिकारों को छीनना आसान हो जाता है। नवउदारवादी दौर में श्रम कानूनों को ज्यादा से ज्यादा  पूँजीपतियों के पक्ष में करके मेहनतकश तबके के रहे-सहे अधिकार भी तेज़ी से छीने गये हैं। नवउदारवादी दौर में दलितों, महिलाओं सहित समाज के हर कमज़ोर तबके के खिलाफ़ बर्बर हिंसा की वारदातों में भी बढ़ोत्तरी देखने में आयी है। साथ ही सांस्कृतिक क्षितिज पर भी नवउदारवादी दौर की छाप देखने को मिलती है। साहित्य -कला, फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों आदि में घोर प्रतिगामी, स्त्री-विरोधी, पोंगापन्थी, धार्मिक कट्टरपन्थी और अंधराष्ट्रवादी विचारों, मूल्योंं और मान्यताओं का घटाटोप सा छाया हुआ है। नेहरूवादी समाजवाद का लबादा तो 1991 में ही उतारा जा चुका था, पिछले 25 वर्षों के दौरान नेहरूवादी खोखली धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा भी नोचकर फेंका जा चुका है और पूँजी की बर्बर तानाशाही अब साफ़ देखी जा सकती है। इस प्रकार नवउदारवाद सामाजिक-राजनीतिक पटल पर चहुँओर घनघोर अँधेरेे का दौर लेकर आया है। लेकिन नवउदारवाद-पूर्व नेहरूवादी समाजवाद के दौर में वापसी की उल्टी यात्रा करके इस अँधेरी सुरंग से बाहर नहीं निकला जा सकता है। इससे बाहर निकलने के लिये हमें अतीत की ओर नहीं बल्कि भविष्य की ओर मुँह करना होगा। नवउदारवादी दौर में पूँजीपति वर्ग विलासिता की जिन मीनारों पर रंगरलियाँ मना रहा है उनके चारों ओर बदहाली में जीती हुई आम जनता का समन्दर है। यह परजीवी वर्ग अनन्तकाल तक इन मीनारों पर रंगरलियाँ नहीं मना सकता। जनता के समन्दर में उठने वाली क्रान्तिकारी लहर द्वारा पूँजीपति वर्ग को विलासिता की इन मीनारों से उतारकर इतिहास के संग्रहालय में डाला जाना तय है। लेकिन क्रान्तिकारी ताक़तों को उस लहर का इन्तजार करने की बजाय अभी से ही उसकी तैयारी करनी चाहिए।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-अगस्‍त 2017 अंक में प्रकाशित
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Thursday, 17 August 2017

डोकटर मुस्लिम होने की वजाहसे अच्छे काम करे तबभी सकमे

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*मासूम बच्चों के हत्यारे  भाजपाइयों के आईटी सेल का खेल*

✍🏼नितेश शुक्ला

खबर आयी कि
यूपी में 60 से ज्यादा बच्चे इसलिए मारे गए क्योंकि हॉस्पिटल के पास ऑक्सिजन नही था। ऑक्सिजन सप्लाई की कंपनी ने 63 लाख बकाया भुगतान न होने के कारण सप्लाई बंद कर दिया। एक डॉक्टर कफील अहमद ने बच्चों को बचाने की काफी कोशिश की और अपने एटीएम से पैसे खर्च कर दूसरे अस्पतालों से सिलेंडर खरीदे जिससे कि कुछ बच्चे बचाये जा सके।
पर तभी
बीजेपी आईटी सेल ने एक झूठा मैसेज फैला दिया कि डॉक्टर कफील ऑक्सिजन सिलिंडर अपने प्राइवेट क्लीनिक पर भेजता था इसलिए ऑक्सिजन खत्म हो गयी।
*अब पूरा मामला इस बात पर केंद्रित हो गया कि डॉक्टर कफील चोर थे कि नहीं।* हमलोग डॉक्टर के बचाव में लग गए कि
▪डॉक्टर कफील HOC (एडहॉक) के अंतर्गत डॉक्टर थे तो वो प्राइवेट प्रैक्टिस कर सकते थे
▪ हॉस्पिटल का ऑक्सिजन सप्लाई विभाग उनके अंदर था ही नहीं। उनको तभी पता चला जब उनको बताया गया कि ऑक्सिजन खत्म हो गयी है।
▪ हॉस्पिटल में छोटे सिलेंडर नही आते थे जिनकी चोरी की जा सके। बेड टू बेड सप्लाई पाइपलाइन थी तो बड़े सिलेंडर आते थे।
▪  *साथ ही ऑक्सिजन सिलेंडर की कीमत बहुत कम होती है, 1320 लीटर ऑक्सिजन रिफिल की कीमत करीब 400 ₹ तक होती है। इसलिए किसी प्राइवेट क्लीनिक वाले को चुराने की जरूरत ही नही है क्योंकि इसकी खपत भी प्राइवेट क्लीनिक पर बहुत कम होती है।*

पर इस बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात थी वो पीछे चली गयी कि
1. अगर कंपनी ने ऑक्सिजन सप्लाई बंद कर दी तो तुरंत अस्पताल प्रशासन ने दूसरा इंतज़ाम क्यो नहीं किया?
2. अगर 10 लाख अधिकतम बकाया भुगतान की सीमा थी तो 63 लाख भुगतान बकाया होने तक अस्पताल प्रशासन ने पैसे भुगतान क्यों नहीं किये?
3. अगर अस्पताल के पास पैसे नही थे तो उसने सरकार को कब नोटिस भेजा ?
4. क्या योगी सरकार ने इस नोटिस पर कोई एक्शन लिया?
5. क्या ऑक्सीजन सप्लाई कंपनी ने सप्लाई बंद करने से पहले कोई नोटिस भेजा?
भेज तो कितने दिन पहले और उसपर हॉस्पिटल प्रशासन ने क्या एक्शन लिया जब उसको पता था कि स्टॉक में ऑक्सीजन ज्यादा नहीं है?
6. आखिर कौन असली जिम्मेदार है जिसकी लापरवाही से इतनी शर्मनाक घटना हुई?

ये वो सवाल हैं जो आज देश के हर नागरिक को उठाना चाहिए। पर हमलोग डॉक्टर  कफील को ही बचाने तक सीमित हो गए।
*यही तो बीजेपी आईटी सेल चाहता था की हम असली मुद्दे से भटक कर एक फ़र्ज़ी न्यूज़ को फ़र्ज़ी साबित करने में लग जाएं। और असली दोषी साफ-साफ बच के निकल जाएं।*

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Update added - 17 Aug -  यह छोटा सा कमेंट दो दिन पहले का है। इसके बाद नदी में काफी पानी बह गया है। जो कमेटी सरकार ने गठित की थी उसकी रिपोर्ट भी आ गई है और उसके हिसाब से डॉक्टर काफिल निर्दोष हैं। यह भी सामने आ गया है की काफी पहले से ही अस्पताल को कंपनी भुगतान के बारे में पत्र लिख रही थी। यही पत्र मुख्यमंत्री को भी भेजे गए थे इसलिए योगी आदित्यनाथ का यह दावा भी झूठा है कि भुगतान  के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।

भाजपा के लिए यह कोई पहला मुद्दा नहीं है अपने सोशल ट्रॉल्स की संख्या के दम पर यह सोचते हैं कि झूठ को सच की तरह दिखा देंगे। जब इंदौर में पिछले से पिछले महीने 15 लोगों की मौत हुई थी तब भी सामने आया था कि वहां ऑक्सीजन की कमी थी पर उस घटना को भाजपा ने दबा दिया था।

यह उसी हिटलर के अनुयाई हैं जो लाखों बच्चों को गैस चेंबर में झोंकने के बाद भी पश्चाताप नहीं महसूस करता था।

यहुदी की चाल पुरी दुनिया का विकास अपने नाम

*मुस्लिम और गेर मुसलमान*.  दोनो थोडा धीरज और थोडा ध्यान से पढ़ें :--

** 250 वर्ष का इतिहास खंगालने पर पता चलता है , कि आधुनिक विश्व मतलब 1800 के बाद , जो दुनिया मे तरक़्क़ी हुई , उसमें पश्चिमी मुल्को यानी सिर्फ *यहूदी और ईसाई* लोगो का ही हाथ है ! *हिन्दू और मुस्लिम* का इस विकास मे 1% का भी योगदान नही है !
** आप देखिये के 1800 से लेकर 1940 तक *हिंदू और मुसलमान* सिर्फ बादशाहत या गद्दी के लिये लड़ते रहे !
अगर आप दुनिया के *100 बड़े वैज्ञानिको* के नाम लिखें , तो बस *एक या दो नाम हिन्दू और मुसलमान* के मिलेंगे !
** पूरी दुनिया मे *61 इस्लामी मुल्क* है , जिनकी जनसंख्या *1.50 अरब* के करीब है और कुल *435 यूनिवर्सिटी* है !
दूसरी तरफ *हिन्दू की जनसंख्या 1.26 अरब* के क़रीब है और *385 यूनिवर्सिटी* है !
जबकि *अमेरिका* मे 3 हज़ार से अधिक और *जापान* मे 900 से अधिक *यूनिवर्सिटी* है !
*ईसाई* दुनिया के *45% नौजवान यूनिवर्सिटी* तक पहुंचते हैं ! वहीं *मुसलमान नौजवान 2%* और *हिन्दू नौजवान 8 %* तक *यूनिवर्सिटी* तक पहुंचते हैं !
दुनिया के *200 बड़ी यूनिवर्सिटी* मे से *54 अमेरिका , 24 इंग्लेंड , 17 ऑस्ट्रेलिया , 10 चीन , 10 जापान ,  10 हॉलॅंड , 9 फ़्राँस , 8 जर्मनी , 2 भारत और 1 इस्लामी मुल्क* में हैं !
** अब हम आर्थिक रूप से देखते है !
*अमेरिका* का *जी. डी. पी 14.9 ट्रिलियन डॉलर* है !
जबकि पूरे *इस्लामिक मुल्क* का कुल *जी. डी. पी 3.5 ट्रिलियन डॉलर* है ! वहीं *भारत का 1.87 ट्रिलियन डॉलर* है !
दुनिया मे इस समय *38,000 मल्टिनॅशनल कम्पनियाँ* हैं ! इनमे से *32000 कम्पनियाँ* सिर्फ *अमेरिका* और *युरोप* में हैं !
अब तक दुनिया के *15,000 बड़े अविष्कारों* मे *6103 अविष्कार* अकेले *अमेरिका* में और *8410 अविष्कार ईसाइयों या यहूदियों* ने किये हैं !
दुनिया के *50 अमीरो* में *20 अमेरिका* , *5 इंग्लेंड* , *3 चीन* , *2 मक्सिको* , *2 भारत* और *1 अरब मुल्क* से हैं !
** अब आपको बताते है , कि हम *हिन्दू और मुसलमान जनहित , परोपकार या समाज सेवा* मे भी *ईसाईयों और यहूदियों से पीछे* हैं !  *रेडक्रॉस दुनिया* का सब से *बड़ा मानवीय संगठन* है , इस के बारे मे बताने की जरूरत नहीं है !
** बिल गेट्स ने *10 बिलियन डॉलर* से *बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन* की बुनियाद रखी , जो कि पूरे *विश्व के 8 करोड़ बच्चो* की सेहत का ख्याल रखती है !
जबकि हम जानते है , कि भारत में कई अरबपति हैं !
*मुकेश अंबानी* अपना घर बनाने मे 6000 करोड़ खर्च कर सकते हैं और *अरब का अमीर शहज़ादा* अपने स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकते हैं ! मगर *मानवीय सहायता* के लिये दोनों ही आगे नही आ सकते हैं !
** यह भी जान लीजिये की *ओलंपिक खेलों* में *अमेरिका* ही सब से *अधिक गोल्ड* जीतता है ,  हम खेलो में भी आगे नहीं !
** *हम अपने अतीत पर गर्व तो कर सकते हे , किन्तु व्यवहार से स्वार्थी ही है ! आपस में लड़ने पर अधिक विश्वास रखते हैं !*
** *मानसिक रूप में आज भी हम विदेशी व्यक्ति से अधिक प्रभावित हैं ! अपनी संस्कृति को छोड़ कर , विदेशी संस्कृति अधिक अपनाते हैं !*

*" बस हर हर महादेव और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाने मे , हम सबसे आगे हैं ! अब जरा सोचिये , कि हमें किस तरफ अधिक ध्यान देने की जरुरत है ! क्यों ना हम भी दुनिया में मजबूत स्थान और भागीदारी पाने के लिए प्रयास करें । बजाय विवाद उत्पन्न करने के और हर समय हिन्दु - मुस्लिम करने के , खुद की और देश की तरक़्क़ी पे ध्यान दें !

Saturday, 15 April 2017

इस्लामकी पेहचान के लीये एक नजर

इस्लाम आ चुका है आपके जीवन में Islam means
1. हिंदू धर्म की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा आज तक तय नहीं है जबकि इस्लाम कीपरिभाषा तय है।
2. हिंदू भाई बहनों के लिए कर्तव्य और अकर्तव्य कुछ भी निश्चित नहीं है। एक आदमी अंडा तक नहीं छूता और अघोरी इंसान की लाश खाते हैं जबकि दोनों ही हिंदू हैं।
जबकि एक मुसलमान के लिए भोजन में हलाल हराम निश्चित है।
3. हिंदू मर्द औरत के लिए यह निश्चित नहीं है कि वे अपने शरीर को कितना ढकें ?, एक अपना शरीर ढकता है और दूसरा पूरा नंगाही घूमता है।
जबकि मुस्लिम मर्द औरत के लिए यह निश्चित है कि वे अपने शरीर का कितना अंगढकें ?
4. हिंदू के लिए उपासना करना अनिवार्य नहीं है बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के बाद भी लोग हिंदू कहलाते हैं।
जबकि मुसलमान के लिए इबादत करना अनिवार्य है और ईश्वर का इन्कार करने के बाद उसे वह मुस्लिम नहीं रह जाता।
5. केरल के हिंदू मंदिरों में आज भी देवदासियां रखी जाती हैं और औरतों द्वारा नाच गाना तो ख़ैर देश भर के हिंदूमंदिरों में होता है। इसे ईश्वर का समीप पहुंचने का माध्यम माना जाता है।
जबकि मस्जिदों में औरतों का तो क्या मर्दों का भी नाचना गाना गुनाह और हराम है और इसे ईश्वर से दूर करने वाला माना जाता है।
6. हिंदू धर्म ब्याज लेने से नहीं रोकता जिसकी वजह से आज ग़रीब किसान मज़दूर लाखों की तादाद में मर रहे हैं।
जबकि इस्लाम में ब्याज लेना हराम है।
7. हिंदू धर्म में दान देना अनिवार्य नहीं है। जो देना चाहे, दे और जो न देना चाहे तो वह न दे और कोई चाहे तो दान में विश्वास ही न रखे।
जबकि इस्लाम में धनवान पर अनिवार्य है कि वह हर साल ज़रूरतमंद ग़रीबों को अपने माल में से 2.5 प्रतिशत ज़कात अनिवार्य रूप से दे। इसके अलावा फ़ितरा आदि देने के लिए भी इस्लाम में व्यवस्था की गई है।
8. हिंदू धर्म में ‘ब्राह्मणों को दान‘ देने की ज़बर्दस्त प्रेरणा दी गई है।
जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह व्यवस्था दी है कि हमारी नस्ल में से किसी को भी सदक़ा-ज़कात मत देना। दूसरे ग़रीबों को देना। हमारे लिए सदक़ा-ज़कातलेना हराम है।
9. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही मानते हैं कि वेद के अनुसार पतिकी मौत के बाद विधवा अपना दूसरा विवाह नहीं कर सकती।
जबकि इस्लाम में विधवा को अपना दूसरा विवाह करने का अधिकार है बल्कि इसे अच्छा समझा गया है कि वह दोबारा विवाह करले।
10. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही यज्ञ करने को बहुत बड़ा पुण्य मानते हैं।
जबकि इस्लाम में यह पाप माना गया है कि आग में खाने पीने की चीज़ें जला दी जाएं।खाने पीने की चीज़ें या तो ख़ुद खाओ या फिर दूसरे ज़रूरतमंदों को दे दो। ऐसा कहा गया है।
11. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वर्ण व्यवस्था को मानते हैं और वर्णों की ऊंच नीच और छूत छात को भी मानते हैं।
जबकि इस्लाम में न वर्ण व्यवस्था है और नही छूत छात। इस्लाम सब इंसानों को बराबर मानता है और आजकल हिंदुस्तानी क़ानून भीयही कहता है और हिंदू भाई भी इसी इस्लामीविचार को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।
12. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वैदिक धर्म की परंपरा का पालन करते हुए चोटी रखते हैं और जनेऊ पहनते हैं।
जबकि इस्लाम में न तो चोटी है और न ही जनेऊ।
13. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वेद के अनुसार 16 संस्कार को मानते हैं, जिनमें एक विवाह भी है। इस संस्कार के अनुसार पत्नी अपने पति के मरने के बादभी उसी की पत्नी रहती है और उससे बंधी रहती है। पति तो पत्नी का परित्याग कर सकता है लेकिन पत्नी उसे त्याग नहीं सकती।
जबकि इस्लाम में निकाह एक क़रार है जो पति की मौत से या तलाक़ से टूट जाता है और इसके बाद औरत उस मर्द की पत्नी नहीं रह जाती। वह अपनी मर्ज़ी से अपना विवाह फिर से कर सकती है। इस्लाम में पति तलाक़ दे सकता है तो पत्नी के लिए भी पति से मुक्ति के लिए ख़ुलअ की व्यवस्था की गई है।
अब हो यह रहा है कि सनातनी और आर्य समाजी, दोनों ही ख़ुद वेद की व्यवस्था से हटकर इस्लामी व्यवस्था को फ़ोलो कर रहे हैं। विधवाओं के पुनर्विवाह वे धड़ल्ले से कररहे हैं। जब मुसलमानों ने अपने निकाह को विवाह की तरह संस्कार नहीं बनाया तो फिर हिंदू भाई अपने संस्कार को इस्लामी निकाह की तरह क़रार क्यों और किस आधार परबना रहे हैं ?
जिस व्यवस्था पर विश्वास है, उस पर चलने के बजाय वे इस्लामी व्यवस्था का अनुकरण क्यों कर रहे हैं ?
14. विवाह को संस्कार मानने का नतीजा यह हुआ कि विधवा औरतों को हज़ारों साल तक बड़ी बेरहमी से जलाया जाता रहा। यहां तक कि इस देश में मुसलमान और ईसाई आए और उनके प्रभाव और हस्तक्षेप से हिंदुओं कीचेतना जागी कि सती प्रथा के नाम पर विधवाको जलाना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है और तबउन्होंने अपने धर्म को उनकी छाया प्रति बना लिया और लगातार बनाते जा रहे हैं।
15. विवाह की तरह ही गर्भाधान भी एक हिंदू संस्कार है। जब किसी पति को गर्भाधान करना होता है या अपनी पत्नि से किसी अन्य पुरूष का नियोग करवाना होता है तो वह 4 पंडितों को बुलवाता है और वे चारों पंडित पूरे दिन बैठकर वेदमंत्र पढ़ते हैं। उसके घर में खाते पीते हैं। उसके घर में यज्ञ करते हैं। उस यज्ञ से बचे हुए घी को मलकर औरत नहाती है और फिर पूरी बस्ती में घूम घूम कर बड़े बूढ़ों को बताती है कि आज उसके साथ क्या होने वाला है ?
बड़े बूढ़े अपनी अनुमति और आशीर्वाद देते हैं, तब जाकर पति महाशय या कोई अन्य पुरूष उस औरत के साथ वेद के अनुसार सहवासकरता है।
जबकि इस्लाम में गर्भाधान संस्कार ही नहीं है और पत्नि को किसी ग़ैर मर्द के साथ सोने के लिए बाध्य करना बहुत बड़ा जुर्म और गुनाह है।
मुसलमान पति पत्नी जब चाहे सहवास कर सकते हैं। शोर पुकार मचाकर लोगों को इसकी इत्तिला देना इस्लाम में असभ्यता और पाप है।
आजकल हिंदू भाई भी इसी रीति से अपनी पत्नियों को गर्भवती कर रहे हैं क्योंकियही रीति नेचुरल और आसान है।
धर्म सदा ही नेचुरल और आसान होता है।
मुश्किल में डालने वाली चीज़ें ख़ुद ही फ़ेल हो जाती हैं। लोग उनका पालन करना चाहें तो भी नहीं कर पाते। शायद ही आजकल कोई गर्भाधान संस्कार करता हो। इस्लामी रीति से पैदा होने के बावजूद इस्लाम पर नुक्ताचीनी करना केवल अहसानफ़रामोशी है। जिसका कारण अज्ञानता है।
16. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों के नज़्दीक धर्म यह है कि पत्नि से संभोगतब किया जाए जबकि उससे संतान पैदा करने की इच्छा हो। इसके बिना संभोग करने वाला वासनाजीवी और पतित-पापी माना जाता है।
जबकि इस्लाम में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। इस्लामी व्यवस्था यही है कि पति पत्नी जब चाहें तब आनंद मनाएं। उन्हें आनंदित देखकर ईश्वर प्रसन्न होता है। आजकल हिंदू भाई भी इसी इस्लामी व्यवस्था पर चल रहे हैं।
18. शंकराचार्य जी के अनुसार हरेक वर्ण और लिंग के लिए वेद को पढ़ने और पढ़ाने की आज़ादी नहीं है।
जबकि क़ुरआन सबके लिए है। किसी भी रंगो-नस्ल के नर नारी इसे जब चाहंे तब पढ़ सकते हैं।
19. इसी के साथ हिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में चार आश्रम भी पाए जाते हैं।
ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम
अति संक्षेप में 8वें वर्ष बच्चे का उपनयन संस्कार करके उसे वेद पढ़ने के लिए गुरूकुल भेज दिया जाए और बच्चा 25 वर्ष तक वीर्य की रक्षा करे। इसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं। लेकिन हमारे शहर का संस्कृत महाविद्यालय ख़ाली पड़ा है। शहर के हिंदू उसमें अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते ही नहीं जबकि शहर के कॉन्वेंट स्कूल हिंदू बच्चों से भरे हुए हैं। जहां सह शिक्षा होती है और जहां वीर्य रक्षा संभव ही नहीं है, जहां वेद पढ़ाए ही नहीं जाते,
जहां धर्म नष्ट होता है, हिंदू भाई अपने बच्चों को वहां क्यों भेजते हैं ?
ख़ैर हमारा कहना यह है कि आजकल हिंदू भाईब्रह्मचर्य आश्रम का पालन नहीं करते और न ही वे 50 वर्ष का होने पर वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए जंगल जाते हैं औरसन्यास आश्रम भी नष्ट हो चुका है।
आज हिंदू धर्म के चारों आश्रम नष्ट हो चुके हैं और हिंदू भाई अब अपने घरों में आश्रम विहीन वैसे ही रहते हैं जैसे कि मुसलमान रहते हैं क्योंकि इस्लाम में तोये चारों आश्रम होते ही नहीं।
ज़रा सोचिए कि अगर इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति होता तो उसमें भी वही सब होताजो कि हिंदू धर्म में हज़ारों साल से चलाआ रहा है और उन बातों से आज तक हिंदू जनमानस पूरी तरह मुक्ति न पा सका।
चार आश्रम, 16 संस्कार, विधवा विवाह निषेध, नियोग, वर्ण-व्यवस्था, छूत छात, ब्याज, शूद्र तिरस्कार, देवदासी प्रथा, ईश्वर के मंदिर में नाच गाना, चोटी, जनेऊ और ब्राह्मण को दान आदि जैसी बातें जो किहिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में पाई जाती हैं, उन सबसे इस्लाम आखि़र कैसे बच गया ?
इन बातों के बिना इस्लाम को हिंदू धर्म की छाया प्रति कैसे कहा जा सकता है ?
हक़ीक़त यह है कि इस्लाम किसी अन्य धर्म की छाया प्रति नहीं है बल्कि ख़ुद ही मूलधर्म है और पहले से मौजूद ग्रंथों में धर्म के नाम पर जो भी अच्छी बातें मिलती हैं वे उसके अवषेश और यादगार हैं, जिन्हें देखकर लोग यह पहचान सकते हैं कि इस्लाम सनातन काल है, हमेशा से यही मानव जाति का धर्म है।
ईश्वर के बहुत से नाम हैं। हरेक ज़बान में उसके नाम बहुत से हैं। उसके बहुत से नामों में से एक नाम ‘अल्लाह‘ है। यह नाम क़ुरआन में भी है और बाइबिल में भी और संस्कृत ग्रंथों में भी।ईश्वर का निज नाम यही है लेकिन उसके निज नाम को ही भुला दिया गया। ईष्वर के नाम को ही नहीं बल्कि यह भी भुला दिया गया कि सब एक ही पिता की संतान हैं। सब बराबर हैं। जन्म से कोई नीच और अछूत है ही नहीं। ऐसा तब हुआ जब आदम और नूह (अ.) को भुला दिया गया जिनका नाम संस्कृत ग्रंथों में जगह जगह आया है। इन्हें यहूदी, ईसाई और मुसलमान सभी पहचानते हैं। हिंदू भाई इन्हें ऋषि कहते हैं और मुसलमान इन्हें नबी कहते हैं। इनके अलावा भी हज़ारों ऋषि-नबी आए और हर ज़माने में आए और हर क़ौम में आए। सबने लोगों को यही बताया कि जिसने तुम्हें पैदा किया है तुम्हारा भला बुराबस उसी एक के हाथ में है, तुम सब उसी की आज्ञा का पालन करो। ऋषियों और नबियों ने मानव जाति को हरेक काल में एक ही धर्म की शिक्षा दी। । वे सिखाते रहे और लोग भूलतेरहे। आखि़रकार पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया में आए और फिर उसी भूले हुए धर्म को याद दिलाया और ऐसे याद दिलाया कि अब किसी के लिए भूलना मुमकिन ही न रहा।
जब दबंग लोगों ने कमज़ोरों का शोषण करने के लिए धर्म में बहुत सी अन्यायपूर्ण बातें निकाल लीं, तब ईश्वर ने क़ुरआन के रूप में अपनी वाणी का अवतरण पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अन्तःकरण पर किया और पैग़म्बरसाहब ने धर्म को उसके वास्तविक रूप में स्थापित कर दिया। जिसे देखकर लोगों ने ऊंच नीच, छूतछात और सती प्रथा जैसी रूढ़ियों को छोड़ दिया। बहुतों ने इस्लाम कहकर इस्लाम का पालन करना आरंभ कर दिया और उनसे भी ज़्यादा वे लोग हैं जिन्होंने इस्लाम के रीति रिवाज तो अपनालिए लेकिन इस्लाम का नाम लिए बग़ैर। इन्होंने इस्लामी उसूलों को अपनाने का एक और तरीक़ा निकाला। इन्होंने यह किया कि इस्लामी उसूलों को इन्होंने अपने ग्रंथों में ढूंढना शुरू किया जो कि मिलने ही थे। अब इन्होंने उन्हें मानना शुरू कर दिया और दिल को समझाया कि हम तो अपने ही धर्म पर चल रहे हैं।
ये लोग हिंदू धर्म के प्रवक्ता बनकर घूमते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से पहचान सकते हैं। ये वे लोग हैं जिनके सिरों पर आपको न तो चोटी नज़र आएगी और न ही इनके बदन पर जनेऊ और धोती। न तो ये बचपन में ये गुरूकुल गए थे और न ही 50 वर्ष का होने पर ये जंगल जाते हैं। हरेक जाति के आदमी से ये हाथ मिलाते हैं। फिर भी ये ख़ुद को वैदिक धर्म का पालनकर्ता बताते हैं।
ख़ुद मुसलमान की छाया प्रति बनने की कोशिश कर रहे हैं और कोई इनकी चालाकी को न भांप ले, इसके लिए ये एक इल्ज़ाम इस्लाम पर ही लगा देते हैं कि ‘इस्लाम तो हिंदू धर्म की छायाप्रति है‘
ये लोग समय के साथ अपने संस्कार और अपने सिद्धांत बदलने लगातार बदलते जा रहे हैंऔर वह समय अब क़रीब ही है जब ये लोग इस्लाम को मानेंगे और तब उसे इस्लाम कहकर ही मानेंगे।
तब तक ये लोग यह भी जान चुके होंगे कि ईश्वर का धर्म सदा से एक ही रहा है। ‘
एक ईश्वर की आज्ञा का पालन करना‘ ही मनुष्य का सनातन धर्म है। अरबी में इसी को इस्लाम कहते हैं। इस्लाम का अर्थ है ‘ईश्वर का आज्ञापालन।‘

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Friday, 14 April 2017

मुस्लिम स्वतंत्र सेनानियो की लिस्ट

इन मुस्लिम स्वतंत्रा सेनानियों ने आज़ादी के लिए अपनी जान दे दी, जनता ने इन्हें भुला दिया By Kamran - August 14, 2016 31057 0   15 अगस्त भारत के ऐतिहास सबसे महत्वपूर्ण तारिख हैं, आज ही के दिन भारत ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद होकर एक स्वतंत्र राज्य बना था. इस दिन को हम दिवस स्वन्त्रता दिवस के नाम से जानते हैं. भारत को ब्रिटिश हुकूमत आज़ादी दिलाने में अनगिनत स्वतंत्रा सेनानियो ने अपनी जान की क़ुरबानी दी. हम देखते हैं कि जब भी स्वतंत्रा सेनानियो की बात आती हैं तो मुस्लिम स्वतंत्रा सेनानियो के नाम पर सिर्फ एक ही नाम सामने निकल कर आता हैं. और स्वतंत्रता संग्राम के मुस्लमान क्रांतकारियो को इतिहास के पन्नो से मिटा दिया गया हैं.  जब-कभी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बात होती है तो मुस्लिम समुदय से सिर्फ एक ही नाम सामने अत हैं. जहाँ देखो वहीं दिखाई देता है. लेकिन उसके अलावा किसी का नाम नज़र नहीं आता हैं. उस नाम से आप भी अच्छी तरह वाकिफ हैं, जी हाँ वह और कोई नहीं ‘अशफ़ाक़ उल्लाह खान’ का नाम दिखाई देता हैं. तो मुद्दा यह हैं कि क्या सिर्फ अशफ़ाक़ उल्लाह खान भारत के स्वतंत्रा आंदोलन में शामिल थे. इसके अलावा एक और नाम हैं मौलाना अबुल कलाम आज़ाद” जिसे देखकर हमने भी यही समझ लिया कि मुसलमानो में सिर्फ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अशफ़ाक़ उल्लाह खान के बाद दुसरे ऐसे मुस्लमान थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा थे जिन्होने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन मे हिस्सा लिया था. जब मैं अपने स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहा था, तो उस दौरान मैंने इतिहास से सम्बंधित जितनी भी किताबे पढ़ी उन सभी में मैंने अशफ़ाक़ उल्लाह खान के अलावा किसी भी मुसलमान का नाम स्वतंत्रा आंदोलन में शामिल नहीं मिला. बल्कि अगर अस्ल तारिख का गहन अध्यन किया जाये, तो आप देखेगे 1498 की शुरुआत से लेकर 1947 तक मुस्लमानो ने विदेशी आक्रमणकारियो से जंग लड़ते हुए अपनी जानो को शहीद करते हुए सब कुछ क़ुरबान कर दिया. इतिहास के पन्नों में अनगिनत मुस्लिम हस्तियों के नाम दबे पड़े हैं जिन्होने भारतीय स्वतंत्रा आंदोलन में अपने जीवन का बहुमूल्य योगदान दिया जिनका ज़िक्र भूले से भी हमें सुनने को नहीं मिलता हैं. जबकि अंग्रेजों के खिलाफ भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता है.  शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० का अंग्रेज़ो के खिलाफ फतवा 1772 मे शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० ने अंग्रेज़ो के खिलाफ जेहाद का फतवा दे दिया ( हमारे देश का इतिहास 1857 की मंगल पांडे की क्रांति को आज़ादी की पहली क्रांति मन जाता हैं) जबकि सचाई यह है कि शाह अब्दुल अज़ीज़ रह ० 85 साल पहले आज़ादी की क्रांति की लो हिन्दुस्तानीयो के दिलों मे जला चुके थे. इस जेहाद के ज़रिये उन्होंने कहा के अंग्रेज़ो को देश से निकालो और आज़ादी हासिल करो. यह फतवे का नतीजा था कि मुस्लमानो के अन्दर एक शऊर पैदा होना शुरू हो गया के अंग्रेज़ लोग फकत अपनी तिजारत ही नहीं चमकाना चाहते बल्कि अपनी तहज़ीब को भी यहां पर ठूसना चाहते है. हैदर अली और टीपू सुल्तान की वीरता हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया. टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसा योद्धा भी था जिसकी दिमागी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए. अंग्रेजों से लोहा मनवाने वाले बादशाह टीपू सुल्तान ने ही देश में अंग्रेजो के ज़ुल्म और सितम के खिलाफ बिगुल बजाय था, और जान की बाज़ी लगा दी मगर अंग्रेजों से समझौता नहीं किया. टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए. टीपू की बहादुरी को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें विश्व का सबसे पहला राकेट आविष्कारक बताया था. बहादुर शाह ज़फ़र बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे. उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया. इस जंग में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई. 1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था. यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला. इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया. विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रिटेनी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले 10 वर्षों तक चला. ग़दर आंदोलन गदर शब्द का अर्थ है विद्रोह, इसका मुख्य उद्देश्य भारत में क्रान्ति लाना था. जिसके लिए अंग्रेज़ी नियंत्रण से भारत को स्वतंत्र करना आवश्यक था.गदर पार्टी का हैड क्वार्टर सैन फ्रांसिस्को में स्थापित किया गया, भोपाल के बरकतुल्लाह ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे जिसने ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था. ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई. फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज़तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था. खुदाई खिदमतगार मूवमेंट लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में खुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया जो की एक ऐतिहासिक आन्दोलन था. विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी. उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई. जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया. अलीगढ़ आन्दोलन सर सैय्यद अहमद खां ने अलीगढ़ मुस्लिम आन्दोलन का नेतृत्व किया. वे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक काल में राजभक्त होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी थे. उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों का समर्थन किया. 1884 ई. में पंजाब भ्रमण के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए सर सैय्यद अहमद खाँ ने कहा था कि, हमें (हिन्दू और मुसलमानों को) एक मन एक प्राण हो जाना चाहिए और मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए. यदि हम संयुक्त है, तो एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक सहायक हो सकते हैं। यदि नहीं तो एक का दूसरे के विरूद्ध प्रभाव दोनों का ही पूर्णतः पतन और विनाश कर देगा. इसी प्रकार के विचार उन्होंने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में भाषण देते समय व्यक्त किये. एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था कि, हिन्दू एवं मुसल्मान शब्द को केवल धार्मिक विभेद को व्यक्त करते हैं, परन्तु दोनों ही एक ही राष्ट्र हिन्दुस्तान के निवासी हैं. सर सैय्यद अहमद ख़ाँ द्वारा संचालित ‘अलीगढ़ आन्दोलन’ में उनके अतिरिक्त इस आन्दोलन के अन्य प्रमुख नेता थे. नजीर अहमद चिराग अली अल्ताफ हुसैन मौलाना शिबली नोमानी यह तो अभी चुनिंदा लोगो के नाम हमने आपको बातये हैं. ऐसे सैकड़ो मुसलमान थे जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपने जीवन को कुर्बान कर देश को आज़ाद कराया. इतना ही नहीं मुस्लिम महिलाओ में बेगम हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है. पर अफ़सोस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इतने मुस्लमानो के शहीद होने के बाद भी हमको मुस्लमानो के योगदान के बारे में नहीं बताया जाता. अंग्रेज़ो के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाले मुस्लमान नवाब सिराजुद्दौला शेरे-मैसूर टीपू सुल्तान हज़रत शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी हज़रात सयेद अहमद शहीद हज़रात मौलाना विलायत अली सदिकपुरी अब ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी शहज़ादा फ़िरोज़ शाह मोलवी मुहम्मद बाकिर शहीद बेगम हज़रत महल मौलाना अहमदुल्लाह शाह नवाब खान बहादुर खान अजीज़न बाई मोलवी लियाक़त अली अल्लाहाबाद हज़रत हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मकई हज़रत मौलाना मुहम्मद क़ासिम ननोतवी मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूद हसन हज़रत मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही हज़रत मौलाना अनवर शाह कश्मीरी मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली हज़रत मौलाना किफायतुल्लाह सुभानुल हिन्द मौलाना अहमद सईद देहलवी हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी सईदुल अहरार मौलाना मुहम्मद अली जोहर मौलाना हसरत मोहनी मौलाना आरिफ हिसवि मौलाना अबुल कलम आज़ाद हज़रत मौलाना हबीबुर्रहमान लुधयानवी सैफुद्दीन कचालू मसीहुल मुल्क हाकिम अजमल खान मौलाना मज़हरुल हक़ मौलाना ज़फर अली खान अल्लामा इनायतुल्लाह खान मशरिक़ी डॉ.मुख़्तार अहमद अंसारी जनरल शाहनवाज़ खान हज़रत मौलाना सयेद मुहम्मद मियान मौलाना मुहम्मद हिफ्जुर्रहमान स्योहारवी हज़रत मौलाना अब्दुल बरी फिरंगीमहली खान अब्दुल गफ्फार खान मुफ़्ती अतीक़ुर्रहमान उस्मानी डॉ.सयेद महमूद खान अब्दुस्समद खान अचकजाई रफ़ी अहमद किदवई युसूफ मेहर अली अशफ़ाक़ उल्लाह खान बैरिस्टर आसिफ अली हज़रत मौलाना अताउल्लाह शाह बुखारी अब्दुल क़य्यूम अंसारी

Monday, 3 April 2017

गुजरात वडावली दंगो के बाद ऐस.पी मुलाकात

Date :- 02/04/17

वडावली दंगो के बाद .....एक हफ्ते बाद प्रशाशन वाले गाव वालों से मिलने के लिए आये .....उन्होंने वादा किया निष्पक्ष इंक्वायरी होगी .....कानून अपने हिसाब से काम करेगा .......

पाटन एस पी साहब और कलेक्टर साहब के सामने एक बहन और जमाते इस्लामी हिन्द के जानाब अब्दुलकादिर साहब की जबरदस्त स्पीच .........

जनाब अब्दुल कादिर साहब ने कहा के जब दंगा शुरू था साहब तब यहाँ के पी आई साहब के पास लोग बचाव के लिए गए हमें बचाओ घर जलाए मारे पीटे ....तब पी आई साहब ने साफ़ कहा था के हम पर ऊपर से दबाव है तो ऐस पी साहब यहाँ तो सबसे ऊपर आप थे तो क्या आपका ही दबाव था ?????

बहन ने कहा घर हमारे जले मार हैमेने खाई मरे हम और हमपर एफ आई आर ?? कहा का इन्साफ है ये सर ??

जनाब अब्दुल कादिर साहब ने कहां ये मजलूम लोग है इन्हें प्रशाशन से अबतक हेल्प नहीं की जो आपकी जिम्मेदारी है सर बल्कि मुस्लिम तंज़ीमो ने किया जो किया यहाँ पर .......ऐसा क्यों ??

बेलेन्स बनाने के लिए दोनों तरफ से धरपकड़ नहीं होनी चाहिए ये मजलूम है इन्हें कसूर कोई नहीं इनकी न हो जो गुन्हेगार है उन्हें सज़ा मिले .........

उन्होंने वादा किया ये सब करके निष्पक्ष इंक्वायरी का .....

कच्छ Demolition 2026 Riport।

कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों,  इस रिपोर्ट को तैयार करने का...