Followers

Tuesday, 13 April 2021

डॉ अंबेडकर ने सबसे पहले आगाह किया था कि भक्त सामाजिक और राजनीति में तानाशाही को जन्म देते हैं।



बीते छह दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार उन खतरों का सामना किया है जिनके प्रति डॉ भीमराव अंबेडकर ने सबसे पहले चेताया था,

*🇮🇳14 अप्रैल 2021🇮🇳*
*🛑🛑🛑डॉ बाबासाहेब अंबेडकर के जन्म दिवस मनाने के विषय के अंतर्गत उन्हीं के भक्तों के लिए खास बाबासाहेब डॉक्टर आंबेडकर की चेतावनी🛑🛑🛑*


*डॉ भीमराव अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में भारतीय लोकतंत्र के लिए तीन बड़े खतरे बताए थे.*  ताज्जुब की बात है कि ये सभी परिस्थितियां अतीत में देश देख चुका है. वर्तमान में भी इसके छिटपुट उदाहरण मौजूद हैं.


*(1) उनकी पहली चेतावनी* जनता द्वारा *सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनाई जाने वाली गैरसंवैधानिक प्रक्रियाओं पर थी.* 
अपने भाषण में अंबेडकर सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति में संविधान प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग जरूरी बताते हुए कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि हमें खूनी क्रांतियों का तरीका छोड़ना होगा, अवज्ञा का रास्ता छोड़ना होगा, असहयोग और सत्याग्रह का रास्ता छोड़ना होगा.’ यहां अंबेडकर यह भी कहते हैं कि लक्ष्य हासिल करने के कोई संवैधानिक तरीके न हों तब तो इस तरह के रास्ते पर चलना ठीक है लेकिन संविधान के रहते हुए ये काम अराजकता की श्रेणी में आते हैं और इन्हें हम जितनी जल्दी छोड़ दें, हमारे लिए बेहतर होगा.

*संविधान निर्माता की लोकतंत्र के लिए यह पहली चेतावनी कितनी सही थी ओर है भी*  आजादी के बाद हम इसके कई उदाहरण देख चुके हैं. नक्सलवाद का उभार, जम्मू-कश्मीर का अलगाववादी आंदोलन, उत्तर-पूर्वी राज्यों में चल रहे विद्रोही आंदोलन आज भले ही राष्ट्रीय स्तर पर हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा न हों, लेकिन जहां भी ये विद्रोही गतिविधियां चल रही हैं वहां लोकतंत्र देश के बाकी हिस्सों की तरह मजबूत नहीं है.

*(2) डॉ अंबेडकर के इस भाषण में दूसरी चेतावनी यह थी कि भारत सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र न रहे बल्कि यह सामाजिक लोकतंत्र का भी विकास करे.*
उनका मानना था कि यदि देश में जल्दी से जल्दी *आर्थिक-सामाजिक असमानता की खाई नहीं पाटी गई यानी सामाजिक लोकतंत्र नहीं लाया गया तो यह स्थिति राजनीतिक लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाएगी.* उन्होंने अपने भाषण में कहा है, ‘राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को मान रहे होंगे. लेकिन सामाजिक और आर्थिक ढांचे की वजह से हम अपने सामाजिक-आर्थिक जीवन में एक व्यक्ति की कीमत एक नहीं मानते... *हम कब तक हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को नकारते रहेंगे?*... यदि हम लंबे अरसे तक यह नकारते रहे तो ऐसा करके अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे होंगे...’

**‘धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा पतन का निश्चित रास्ता है और जो आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है’*"*

हमने अभी देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जिन हिंसक और अलगाववादी आंदोलनों का जिक्र किया उनके व्यापक समर्थन की एक बड़ी वजह सामाजिक लोकतंत्र विकसित न कर पाने की हमारी नाकामयाबी भी है. यदि बंगाल-आंध्र प्रदेश या केरल के किसानों को वाजिब हक मिलते तो वहां कभी-भी नक्सलवाद इतनी मजबूती से जड़ें नहीं जमा पाता. केरल ने इस दिशा में बहुत अच्छा काम किया है और इसका नतीजा है कि वहां अब नक्सली हिंसा तकरीबन खत्म हो चुकी है. देश के सबसे प्रगतिशील इस राज्य में शायद लोकतंत्र अपने सबसे बेहतर स्वरूप में है.


अपने इसी भाषण में डॉ अंबेडकर लोकतंत्र के लिए एक🛑 *(3) तीसरा खतरा बताते हैं और जो वर्तमान राजनीति में बिल्कुल साफ-साफ देखा जा सकता है.*🛑

डॉ अंबेडकर ने संविधान सभा के माध्यम से आम लोगों को चेतावनी दी थी कि वे *किसी भी राजनेता के प्रति अंधश्रद्धा न रखें नहीं तो इसकी कीमत लोकतंत्र को चुकानी पड़ेगी.*
(इन मे स्वयं डॉक्टर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और उनके भक्त गण भी गिने जा सकते हैं।)

*{*धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है शायद,  लेकिन राजनीति में, 🛑भक्ति या 🛑नायक पूजा 🛑पतन का निश्चित रास्ता है और जो आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है’।।*
*डॉ बी आर अम्बेडकर}*

दिलचस्प बात है कि उन्होंने यहां राजनीति में सीधे-सीधे *भक्त और भक्ति की बात की है.* .......वे अपने भाषण में कहते हैं, ‘*महान लोग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया उनके प्रति कृतज्ञ रहने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन कृतज्ञता की भी एक सीमा है*..... ........ *दूसरे देशों की तुलना में भारतीयों को इस बारे में ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है. भारत की राजनीति में भक्ति या आत्मसमर्पण या नायक पूजा दूसरे देशों की राजनीति की तुलना में बहुत बड़े स्तर पर अपनी भूमिका निभाती है.*  *धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा पतन का निश्चित रास्ता है और जो आखिरकार तानाशाही पर खत्म होता है.’*

इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपने एक आलेख में कहते हैं कि अंबेडकर ने उस समय गांधी, नेहरू और सरदार पटेल के लिए जनता में अंधश्रद्धा देखी थी. इस स्थिति में ये नायक किसी सकारात्मक आलोचना से भी परे हो जाते हैं और शायद यही समझते हुए अंबेडकर ने अपने भाषण में राजनीतिक भक्ति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था. बदकिस्मती से भारतीय राजनीति में यह बीमारी काफी गहरी है. 

*‘महान लोग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया उनके प्रति कृतज्ञ रहने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन कृतज्ञता की भी एक सीमा है’*

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रचलित ‘भक्त’ शब्द अब आम बोलचाल की भाषा में भी इस्तेमाल होने लगा है. सोशल मीडिया में यह स्थिति है कि प्रधानमंत्री की आलोचना पर किसी को भी हजारों गालियां पड़ने की पूरी गारंटी ली जा सकती है. तानाशाही प्रवृत्ति का आरोप उनके ऊपर भी लगता है. ये ठीक वही स्थितियां हैं जिनके बारे में डॉ अंबेडकर ने अपने भाषण में जिक्र किया था और जिन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाता है.

**डॉ बी आर आंबेडकर**
25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण से अनुवादित,

🙏 *अंतिम कथन🙏*
🛑 यहां चेतावनी सिर्फ पक्ष विपक्ष और तानाशाही में मानने वाले लोगों के लिए ही नहीं है लेकिन खुद डॉ बाबासाहेब आंबेडकर में अपने भक्तों को भी दे दी है। *जो उन्हे समजनी चाहिए*)🙏

Thursday, 8 April 2021

इटली के कोरोना से मृत मरीज का पोस्टमार्टम कोरोना का पर्दाफाश .


*BREAKING NEWS*
दुनिया की बड़ी खबर, 
इटली ने किया मृत कोरोना मरीज का पोस्टमार्टम,
हुआ बड़ा खुलासा
इटली विश्व का पहला देश बन गया है जिसनें एक कोविड-19 से मृत शरीर पर अटोप्सी  (पोस्टमार्टम) किया और एक व्यापक जाँच करने के बाद पता लगाया है कि वायरस के रूप में कोविड-19 मौजूद नहीं है, बल्कि यह सब एक बहुत बड़ा ग्लोबल घोटाला है। लोग असल में “ऐमप्लीफाईड ग्लोबल 5G इलैक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन (ज़हर)” के कारण मर रहे हैं।

इटली के डॉक्टरों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कानून का उल्लंघन किया है, जो कि करोना वायरस से मरने वाले लोगों के मृत शरीर पर आटोप्सी (पोस्टमार्टम) करने की आज्ञा नहीं देता ताकि किसी तरह की वैज्ञानिक खोज व पड़ताल के बाद ये पता ना लगाया जा सके कि यह एक वायरस नहीं है, बल्कि एक बैक्टीरिया है जो मौत का कारण बनता है, जिस की वजह से नसों में ख़ून की गाँठें बन जाती हैं यानि इस बैक्टीरिया के कारण ख़ून नसों व नाड़ियों में जम जाता है और यही मरीज़ की मौत का कारण बन जाता है।
इटली ने इस वायरस को हराया है, ओर कहा है कि “फैलीआ- इंट्रावासकूलर कोगूलेशन (थ्रोम्बोसिस) के इलावा और कुछ नहीं है और इस का मुक़ाबला करने का तरीका आर्थात इलाज़ यह बताया है……..
ऐंटीबायोटिकस (Antibiotics tablets}
ऐंटी-इंनफ्लेमटरी ( Anti-inflamentry) और
ऐंटीकोआगूलैटस ( Aspirin) को लेने से यह ठीक हो जाता है।
ओर यह संकेत करते हुए कि इस बीमारी का इलाज़ सम्भव है, विश्व के लिए यह संनसनीख़ेज़  ख़बर इटालियन डाक्टरों द्वारा कोविड-19 वायरस से मृत लाशों की आटोप्सीज़ (पोस्टमार्टम) कर तैयार की गई है। कुछ और इतालवी वैज्ञानिकों के अनुसार वेन्टीलेटर्स और इंसैसिव केयर यूनिट (ICU) की कभी ज़रूरत ही नहीं थी। इस के लिए इटली में अब नए शीरे से प्रोटोकॉल जारी किए गए है ।
CHINA इसके बारे में पहले से ही जानता था मगर इसकी रिपोर्ट कभी किसी के सामने उसने सार्वजनिक नहीं की ।
कृपया इस जानकारी को अपने सारे परिवार, पड़ोसियों, जानकारों, मित्रों, सहकर्मीओं को साझा करें ताकि वो कोविड-19 के डर से बाहर निकल सकें ओर उनकी यह समझ मे आये कि यह वायरस बिल्कुल नहीं है बल्कि एक बैक्टीरिया मात्र है जो 5G रेडियेशन के कारण उन लोगो को नुकसान पहुँचा रहा है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है। यह रेडियेशन इंफलामेशन और हाईपौकसीया भी पैदा करता है। जो लोग भी इस की जद में आ जायें उन्हें Asprin-100mg और ऐप्रोनिकस या पैरासिटामोल 650mg लेनी चाहिए । क्यों…??? ….क्योंकि यह सामने आया है कि कोविड-19 ख़ून को जमा देता है जिससे व्यक्ति को थ्रोमोबसिस पैदा होता है और जिसके कारण ख़ून नसों में जम जाता है और इस कारण दिमाग, दिल व फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिसके कारण से व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और सांस ना आने के कारण व्यक्ति की तेज़ी से मौत हो जाती है।
इटली के डॉक्टर्स ने WHO के प्रोटोकॉल को नहीं माना और उन लाशों पर आटोप्सीज़ किया जिनकी मौत कोविड-19 की वजह से हुई थी। डॉक्टरों ने उन लाशो की भुजाओं, टांगों ओर शरीर के दूसरे हिस्सों को खोल कर सही से देखने व परखने के बाद महसूस किया कि ख़ून की नस-नाड़ियां फैली हुई हैं और नसें थ्रोम्बी से भरी हुई थी, जो ख़ून को आमतौर पर बहने से रोकती है और आकसीजन के शरीर में प्रवाह को भी कम करती है जिस कारण रोगी की मौत हो जाती है। इस रिसर्च को जान लेने के बाद इटली के स्वास्थ्य-मंत्रालय ने तुरंत कोविड-19 के इलाज़ प्रोटोकॉल को बदल दिया और अपने पोज़िटिव मरीज़ो को एस्पिरिन 100mg और एंप्रोमैकस देना शुरू कर दिया। जिससे मरीज़ ठीक होने लगे और उनकी सेहत में सुधार नज़र आने लगा। इटली स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ही दिन में 14000 से भी ज्यादा मरीज़ों की छुट्टी कर दी और उन्हें अपने अपने घरों को भेज दिया।
स्रोत: *इटली स्वास्थ्य मंत्रालय*

👆Send to Other Group

गदीरे खुम की हदीस . WhatsApp acopy

हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का आखिरी खुतबा
इस्लाम मजहब के आखरी पैगंबर हजरत मोहम्मद मुस्तफा  सल्लल्लाहो वाले वसल्लम  । रसूलुल्लाह का आखिरी हज का खुत्बा 
मैदान-ए-अरफ़ात(मक्काह) में 9 ज़िल्हिज्ज् ,10 हिजरी को मोहम्मद सल.अलैहि वसल्लम ने हज का आखरी ख़ुत्बा दिया था। बहोत अहम संदेश दिया था। गौर से पढे हर बात बार बार पढे सोचे कि कितना अहम संदेश दिया था 

1. ऐ लोगो ! सुनो, मुझे नही लगता के अगले साल मैं तुम्हारे दरमियान मौजूद हूंगा, मेरी बातों को बोहत गौर से सुनो, और इनको उन लोगों तक पहुंचाओ जो यहां नही पहुंच सके। 

2. ऐ लोगों ! जिस तरह ये आज का दिन ये महीना और ये जगह इज़्ज़त ओ हुरमत वाले हैं, बिल्कुल उसी तरह दूसरे मुसलमानो की ज़िंदगी, इज़्ज़त और माल हुरमत वाले हैं। ( तुम उसको छेड़ नही सकते )

3. लोगों के माल और अमानतें उनको वापस कर दो। 

4. किसी को तंग न करो, किसी का नुकसान न करो, ताकि तुम भी महफूज़ रहो। 

5. याद रखो, तुम्हे अल्लाह से मिलना है, और अल्लाह तुम से तुम्हारे आमाल के बारे में सवाल करेगा। 

6. अल्लाह ने सूद(ब्याज) को खत्म कर दिया, इसलिए आज से सारा सूद खत्म कर दो। (माफ कर दो )

7. तुम औरतों पर हक़ रखते हो, और वो तुम पर हक़ रखती है, जब वो अपने हुक़ूक़ पूरे कर रही हैं तो तुम भी उनकी सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करो। 

8. औरतों के बारे में नरमी का रवय्या अख्तियार करो, क्योंकि वो तुम्हारी शराकत दार और बेलौस खिदमत गुज़ार रहती हैं। 

9. कभी ज़िना के करीब भी मत जाना

10. ऐ लोगों !! मेरी बात ग़ौर से सुनो, सिर्फ अल्लाह की इबादत करो, 5 फ़र्ज़ नमाज़ें पूरी रखो, रमज़ान के रोज़े रखो, और ज़कात अदा करते रहो, अगर इस्तेताअत हो तो हज करो।

11. हर मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। तुम सब अल्लाह की नज़र में बराबर हो। बरतरी सिर्फ तक़वे की वजह से है। 

12. याद रखो ! तुम सब को एक दिन अल्लाह के सामने अपने आमाल की जवाबदेही के लिए हाज़िर होना है, खबरदार रहो ! मेरे बाद गुमराह न हो जाना। 

13. *याद रखना ! मेरे बाद कोई नबी नही आने वाला, न कोई नया दीन लाया जाएगा, मेरी बातें अच्छी तरह समझ लो।*

14. मैं तुम्हारे लिए दो चीजें छोड़ के जा रहा हूँ, क़ुरआन और मेरी सुन्नत, अगर तुमने उनकी पैरवी की तो कभी गुमराह नही होंगे। 

15. सुनो ! तुम लोग जो मौजूद हो, इस बात को अगले लोगों तक पहुंचाना, और वो फिर अगले लोगों तक पहुंचाए। और ये मुमकिन है के बाद वाले मेरी बात को पहले वालों से ज़्यादा बेहतर समझ ( और अमल ) कर सके। 
 
फिर आपने आसमान की तरफ चेहरा उठाया और कहा
16. *ऐ अल्लाह ! गवाह रहना, मैंने तेरा पैग़ाम तेरे बंदों तक पहुंचा दिया*

हम पर भी फ़र्ज़ है इस पैगाम को सुने, समझे, अमल करें और इसको आगे दुसरो तक़ भी भेजे ताकि अहम बाते सीखे 

(या रब इसको लिखने वाले, पढ़ने वाले ओर दुसरो तक़ पोहचाने वाले की हर परेशानि‍या दूर कर ओर उनको दुनिया ओर अखिरत मे कामयाबी अता कर ओर तेरे सिवा किसी का मोहताज ना बना.... आमीन या रब) 

Reference ; ( सही अल-बुखारी, हदीस न. 1623 ) इस्लाम मजहब के पैगंबर

कोरोना महामारी के बाद अब बिल गेट्स ने की दो अगली आपदाओं की भविष्यवाणी.2015

  • बिल गेट्स ने कोरोना वायरस महामारी की भविष्यवाणी वर्ष 2015 में ही कर दी थी।
  • माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बोले- कोरोना के बाद अब दो और खतरनाक बीमारियां आएंगी।
  • दी चेतावनी कि कोरोना के बाद अब श्वसन और जलवायु संबंधी महामारी आएंगी।


नई दिल्ली। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक और अध्यक्ष बिल गेट्स ने 2015 में ही कोरोना वायरस जैसी महामारी की चेतावनी दी थी। कोरोना वायरस के बाद अब गेट्स ने दो और आपदाओं की चेतावनी दी है। गेट्स का कहना है कि कोरोना के बाद अब दो ऐसी भयानक विपदाएं आने वाली हैं, जो इंसान को झकझोर के रख देंगी।

BIG NEWS: कोरोना वायरस से ठीक हो चुके व्यक्तियों में वैक्सीन का एक शॉट ही कारगर

वर्ष 2015 में बिल गेट्स की दी हुई भविष्यवाणी 2020 में सच साबित हुई। अभी लोग कोरोना जैसी भयानक महामारी से उबरे भी नहीं हैं और आम जनता तक वैक्सीन पहुंची भी नहीं है, ऐसे वक्त में गेट्स की ये भविष्यवाणी क्या कोहराम मचाएगी, सोचने वाली बात है।

बिल गेट्स के हिसाब से अब कोरोना वायरस से भी भयानक आपदाएं लोगों के ऊपर मंडराने वाली हैं। गेट्स ने ये भविष्यवाणी इसलिए भी की ताकि लोग पहले से ही सतर्क हो जाए और भविष्य में आने वाले इस संकट से अपना बचाव कर सकें।

👆👆👆👆👆👆👆👆👆👆👆👆

उपर की तस्वीर किो लकबर के लिये यंहा क्लिक करे.



पुरी खबर देखने के लिये यंहा क्लिक करे.

👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇


Wednesday, 7 April 2021

હવે મોટો પ્રશ્ન છે કોરોનાના બીજા મોજાના ડૅમેજ કન્ટ્રોલનો

06 April 2021

૨૪ માર્ચ, ૨૦૨૦ના રોજ ૨૧ દિવસનો રાષ્ટ્રવ્યાપી લૉકડાઉન જાહેર કરાયો ત્યારે આપણે ત્યાં કોરોનાના ૫૦૦ કેસ હતા અને તેને કારણે ૧૦ મૃત્યુ નોંધાયા હતા. આજે એક વર્ષ પછી પરિસ્થિતિ કાંઈક જુદી છે. પહેલું મોજું સપ્ટેમ્બર ૨૦૨૦ના અંત સુધીમાં ટોચ પર પહોંચ્યું અને ફેબ્રુઆરી ૨૦૨૧માં નવા કેસની સંખ્યા સતત ઘટતી જતા મહામારીનો અંત નજીક દેખાવા લાગ્યો.
આપણી એ ગણતરી છેતરામણી સાબિત થઈ અને ફરી એકવાર રોજિંદા ધોરણે નવા કેસ જેટ સ્પીડે વધવા માંડ્યા. એ પહેલાં મોજાનું વિસ્તરણ છે કે બીજું મોજું આપણે એની અવઢવમાં રહ્યા. કદાચ પાછલે દરવાજેથી એ બીજું મોજું પ્રવેશી પણ ગયું.એ અંતર્ગત છેલ્લા મળતા આંકડા પ્રમાણે રોજના નવા કેસ ૬૦,૦૦૦ આસપાસ પહોંચી ગયા. મહારાષ્ટ્ર અને મુંબઈ માટે એ આંક ૩૬,૦૦૦ અને ૫૫૦૦ ઉપર પહોંચી ગયો. હવે એના સામના માટે આપણો અનુભવ કામે લગાડવો પડશે.
 
દેશવ્યાપી લૉકડાઉનના રૂપમાં લેવાયેલ ઝડપી અૅકશનની સફળતાના પુરાવા આપણી સામે છે જ. એ જે સમય મળ્યો તેમાં ભવિષ્યમાં ઊભી થનારી 
ગંભીર પરિસ્થિતિના સામના માટે આપણા હેલ્થકૅર ઇન્ફ્રાસ્ટ્રકચરને મજબૂત કરવાના આપણા આશયને સફળતા મળી. મોટા પ્રમાણમાં જાનહાનિ અટકાવવા માટેની એ ડૅમેજ કન્ટ્રોલ કવાયત સફળ થઈ.

હવે નિષ્ણાતો અને સંશોધનાત્ક અભ્યાસનાં તારણો એ નિષ્કર્ષ પર આવ્યા છે કે આપણે ત્યાં કોવિડ-19નું બીજું મોજું શરૂ થઈ ગયું છે અને રોજના કેસ વધતા રહી ૧૫ એપ્રિલ સુધીમાં ટોચ પર પહોંચશે. પછી ધીમે ધીમે ઘટતા રહીને મેના અંત સુધીમાં તે કન્ટ્રોલમાં આવશે. મુંબઈમાં એ કેસ રોજના ૧૦,૦૦૦ની ટોચ પર પણ પહોંચી શકે. દેશમાં રોજના સૌથી વધુ કેસ નોંધાવી રહેલ ૧૦ જિલ્લામાંના નવ જિલ્લા મહારાષ્ટ્રમાં છે અને લગભગ ૭૪૦ જિલ્લામાંથી ૬૬ જિલ્લાઓ રોજના નવા કેસનો મોટા ભાગનો હિસ્સો ધરાવે છે. પંજાબ, કેરલા, કર્ણાટક, ગુજરાત અને મધ્ય પ્રદેશ પણ વધારે અસરગ્રસ્ત થતા જાય છે.

આ આંકડાઓને અને માર્ચ ૨૦૨૦ના સંજોગોના ફેરફારને લક્ષમાં રાખીને આપણે આપણી વ્યૂહરચના બદલવી પડશે.

સવાલ આ પહેલું મોજું છે કે બીજું એ નથી, એ જે પણ હોય તે, આપણે માટે અગ્રક્રમ તો  કોરોનાના ચાલુ તબક્કાને (રોજના વધતા કેસને) બનતી ત્વરાએ કાબૂમાં  લાવવાનો  છે, જેથી   જાનહાનિ ઓછામાં ઓછી અને આર્થિક નુકસાન પણ જેટલું બને તેટલું ઓછું થાય. 

વધતા કેસ વચ્ચે પણ મૃત્યુનો દર ૨૦૨૦ કરતાં ઓછો છે એનો યશ જાય છે આપણી સ્વાસ્થ્ય અંગેની માળખાકીય સુવિધાઓના સુધારાને. ઉપરાંત કોરોના પૉઝિટિવ થઈ ચૂકેલ કેટલાક દરદીઓ અને વૅક્સિનેશનને કારણે પ્રજાના અમુક વર્ગમાં કોવિડ-19 સામેના ઘટેલા જોખમને પણ તેનો કેટલોક યશ મળે જ. કોરોના સામે લડી લેવાની આપણી માનસિક ઇમ્યુનિટી (શારીરિક ઇમ્યુનિટી તો ખરી જ)એ પણ મોટો ભાગ ભજવ્યો જ હોય. 

 મૃત્યુનો દર ઘટાડવામાં નવા વાઇરસનું જોર ઓછું થયું છે કે નહીં એ અંગેના અભ્યાસના આખરી તારણો હજી ઉપલબ્ધ થયાં નથી. બે નવા વાઇરસનું ટ્રાન્સમિશન તો ઝડપી પુરવાર થયું છે. મહારાષ્ટ્ર અને અન્ય પાંચથી છ રાજ્યો કોવિડ-19 માટેની હૉટ-બેડ સમાન પુરવાર થયા છે અને રોજ વધતા નવા કેસમાં તેમનો હિસ્સો ૮૦ ટકા જેટલો છે, પણ તેને કારણે આખા દેશ સામેનું જોખમ ઓછું થતું નથી. જરા ચૂક્યા તો કોવિડ-19ના મરણનું પ્રમાણ પણ ૨૦૨૦ કરતાં વધી જવાની સંભાવના નકારી શકાય તેમ નથી.

 આ આંકડાઓ આપણને કોરોનાને નાથવા માટેની નવી વ્યૂહરચના ઘડવામાં કામે લાગી શકે.

કેન્દ્ર સરકારે પ્રાદેશિક અને સ્થાનિક લૉકડાઉન અને પ્રતિબંધો માટેની છૂટ રાજ્ય સરકારોને આપી જ છે. એટલે આખા રાજ્યમાં નહીં, પણ કોરોના માટેના હૉટ-સ્પૉટ કે કલસ્ટર ગણાય તેવા સ્થાનિક લૉકડાઉનથી વધુ જોખમવાળા પ્રદેશોને આઇસોલેટ કરાય તો કડક સર્વવ્યાપી લૉકડાઉનથી થતાં મોટા આર્થિક નુકસાનને સીમિત કરી શકાય. મહારાષ્ટ્રમાં પણ નાઇટ કરફ્યુ દાખલ કરાયો છે.
કેન્દ્ર સરકારે ૧ એપ્રિલથી ૪૫ વરસની ઉપરના બધા નાગરિકો માટે વૅક્સિનેશનની છૂટ આપી છે. કોરોનાના કન્ટ્રોલ માટે જરૂરી બધા નાગરિકોને જ્યારે ટૂંક સમયમાં વૅક્સિન આપી શકાય તેમ ન હોય તો વૅક્સિન માટેની પરવાનગી એજ ગ્રુપ કરતાં, આરોગ્ય સેતુ અૅપની મદદથી નોખા તારવેલ હૉટ-સ્પૉટ પ્રદેશોમાં પુખ્ત ઉંમરના બધા નાગરિકો માટે તાત્કાલિક આપવી જોઈએ. જે પ્રદેશો ઓછા અસરગ્રસ્ત છે તેમને ભલે પછીના તબક્કે વૅક્સિનેશન માટે આવરી લેવાય તો પણ વધુ પડતા નુકસાનની સંભાવના ઓછી છે.

કોઈ કુદરતી આફત સમયે જ્યાં ન પહોંચી શકાય તેવા અસરગ્રસ્ત વિસ્તારમાં સર્વાઇવલ કિટ (તત્કાલ પૂરતા જીવનગુજારા માટેની સાધનસામગ્રી અને દવાઓ) હેલિકૉપ્ટર દ્વારા અૅર-ડ્રોપ કરીને પૂરી પડાય છે તેવી રીતે વૅક્સિન માટે યુદ્ધના ધોરણે કોવિડ-19 માટેના હૉટ-સ્પૉટની પસંદગી કરી શકાય.

બે વૅક્સિન વચ્ચેનો સલામત સમયગાળો નવા સંશોધન પ્રમાણે છથી આઠ અઠવાડિયાંનો (જે પહેલાં ચારથી છ અઠવાડિયાંનો ગણાતો હતો) હોઈ બીજો ડોઝ મોડો આપી શકાય તેમ હોઈ પહેલા ડોઝ માટે પ્રજાના થોડા વધુ મોટા વર્ગને આવરી લેવાની શક્યતા પણ ઊભી થઈ છે. કોરોનાનું બીજું મોજું આપણા પર સવાર થઈ જાય અને અકલ્પનીય નુકસાન પહોંચાડે તે પહેલાં સમયસર આપણે આપણી નવી વ્યૂહરચના અમલમાં મૂકવી પડશે.
વૅક્સિનના બીજા ડોઝ પછી ઇમ્યુનિટી ડેવલપ થતાં બે-એક અઠવાડિયાં લાગતાં હોઈ પહેલા ડોઝમાં અસરગ્રસ્ત વિસ્તારના જેટલા વધુ લોકોને બનતી ત્વરાથી આવરી લેવાશે તેટલું દેશનું નુકસાન ઓછું થશે.
દેશનો યુવા વર્ગ તેમના ઑફિસ અને ધંધાકીય કાર્યો અને રોકાણોને લીધે કોરોના માટે સુપર-સ્પ્રેડર સાબિત થયો છે. સામાજિક અને ધાર્મિક પ્રસંગો પણ ડિસિપ્લિનના અભાવે સુપર-સ્પ્રેડર સાબિત થયા છે. એટલે હોળી-ધુળેટી, બીહુ અને ઇસ્ટરના તહેવારોની ઉજવણી બાબતે જેટલા રિસ્ટ્રિકશન્સ મુકાશે તેટલું દેશને નુકસાન ઓછું થશે.

રિઝર્વ બૅન્કના મતે રોજેરોજ ઝડપથી વધી રહેલ નવા કેસને હળવાશથી લઈ શકાય નહીં. તે આપણે માટે જરૂરથી ચિંતાનો વિષય છે. બિઝનેસની ઝડપ તાજેતરના અઠવાડિયાઓમાં વધી રહેલ કેસને કારણે ધીમી પડી રહી હોવાના સંકેતો મળી રહ્યા છે તો પણ ભારતના આર્થિક વિકાસની ઝડપ ધીમી પડે તેવા સંજોગો હજી દેખાતા નથી. દેશની કેન્દ્રવર્તી બૅન્કનો આ આશાવાદ આશ્વાસનરૂપ છે.
તો પણ મુંબઈની બગડતી પરિસ્થિતિ સારા દેશની પ્રગતિને પાછળ ધકેલી શકે એ ભુલાવું ન જોઈએ. રોજના નવા કેસ ૧૫, સપ્ટેમ્બર ૨૦૨૦ આસપાસના (૯૮,૦૦૦ જેટલા) ટોચના સ્તર ભણી મક્કમ ઝડપે આગળ વધી રહ્યા છે તેના પર અંકુશ રાખવા કોઈ એક સાધન કારગત ન જ નીવડે.  Abdul Hafiz Lakhani Ahmedabad GUJARAT

Friday, 2 April 2021

देश के NGO और सामाजिक संस्थान को लेकर बहोत अहम जानकारी प्राप्त करे.

📮___________________📮
*ग़ैर-सरकारी संगठनों का सरकारी तन्त्र*
✍ अपूर्व मालवीय
🖥 http://www.mazdoorbigul.net/archives/12550
➖➖➖➖➖➖➖➖
अगर आप किसी भी सरकारी विभाग में जायें और सरकारी योजनाओं की जानकारी लें तो निम्न जवाब सामान्य तौर पर मिलेगा – ”हमारे विभाग की बहुत सी कल्याणकारी योजनाएँ हैं और इन योजनाओं को विभिन्न एनजीओ के सहयोग के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।” 

*ज़्यादातर सरकारी विभागों की यही स्थिति है। सरकारी योजनाओं में ग़ैर-सरकारी संगठनों की घुसपैठ को समझा जा सकता है। नब्बे के दशक में जब भारत में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयीं, उस समय हमारे देश में एनजीओ की संख्या क़रीब एक लाख थी। आज इन नीतियों ने जब देश की मेहनतकश जनता को तबाह-बर्बाद करने में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रख छोड़ी है, इनकी संख्या 32 लाख 97 हज़ार तक पहुँच चुकी है (सीबीआई की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट में दाखि़ल रिपोर्ट)। यानी देश के 15 लाख स्कूलों से दुगने और भारत के अस्पतालों से 250 गुने ज़्यादा!*

अकेले उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ही 5 लाख 48 हज़ार एनजीओ हैं। दिल्ली जैसे छोटे राज्य में 76000 एनजीओ हैं। उत्तराखण्ड में 16674 गाँव हैं, लेकिन एनजीओ हैं 51675! यानी तीन एनजीओ प्रति गाँव। *उत्तराखण्ड में साठ फ़ीसदी से अधिक एनजीओ का काम ग्रामीण विकास पर केन्द्रि‍त है। लेकिन उत्तराखण्ड के गाँवों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। जो कम्पनियाँ यहाँ पर्यावरण, जंगलों, पहाड़ों, नदियों के विनाश के लिए जि़म्मेदार हैं, वही कम्पनियाँ इन मुद्दों को लेकर गोष्ठी, सेमिनार और कैम्प आदि लगाया करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्र को भी बड़े-बड़े एनजीओ ट्रस्ट, धर्मार्थ सेवा संगठनों ने अपने शिकंजे में जकड़ लिया है।* अभी उत्तराखण्ड सरकार ने 300 सरकारी विद्यालयों को “10 से कम बच्चे आ रहे थे, का तर्क देकर” बन्द कर दिया। सिर्फ़ यहीं तक यह मामला नहीं रुका। इसके साथ ही इन सरकारी विद्यालयों की इमारतों को विद्या भारती (फ़ासिस्ट संगठन आरएसएस की संस्था) को दे दिया। अब जहाँ बच्चे ही नहीं आ रहे थे, उन स्कूलों का विद्या भारती क्या करेगी, यह सोचा जा सकता है। सरकार चार जि़लों के उन जवाहर नवोदय विद्यालयों को भी बन्द करने जा रही है, जिनमें अच्छी-ख़ासी संख्या में ग़रीब घरों के बच्चे आते हैं। उत्तराखण्ड में शिक्षा को लेकर ‘अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन’ सबसे अधिक काम करता है। पहाड़ों के कई स्कूलों को इसने गोद लिया है। उत्तराखण्ड में ज़्यादातर विश्वविद्यालय, कॉलेज बाबाओं-महन्तों के ट्रस्ट द्वारा संचालित हो रहे हैं। यही हाल स्वास्थ्य का है। स्वास्थ्य में मैक्स, फ़ोर्टिस जैसी कम्पनियों की दख़ल तो है ही, साथ ही बाबाओं-महन्तों के ट्रस्ट द्वारा संचालित कई मेडिकल कॉलेज सरकारी अस्पतालों को गोद लेकर ख़ूब मुनाफ़ा कमा रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के डोईवाला तहसील में एक सरकारी अस्पताल है, जो अब स्वामी राम हिमालयन हॉस्पिटल ट्रस्ट की देख-रेख में संचालित होता है। सरकारी अस्पताल में आये थोड़े से भी गम्भीर मरीजों को हिमालयन में रेफ़र कर दिया जाता है। सरकारी अस्पताल में ज़्यादातर ग़रीब-मेहनतकश ही आते हैं जो बमुश्किल ही पैसा देकर अपना इलाज करवा सकते हैं। लेकिन हिमालयन अस्पताल में भेजकर उनसे ठीक-ठाक फ़ीस वसूल ली जाती है। सुधीर नाम के व्यक्ति बताते हैं कि उनका रोड एक्सीडेण्ट हो गया था। ‘परिवार के लोग सरकारी अस्पताल लाये तो यहाँ के डॉक्टर ने हिमालयन रेफ़र कर दिया। मैं ठीक तो हो गया लेकिन क़र्ज़ के बोझ से दब गया।’

*उत्तराखण्ड के पहाड़, जंगल अपनी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों, वानस्पतिक विविधताओं आदि के लिए जाने जाते हैं। लेकिन यहाँ की “सरकार इन जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों के दोहन-संवर्द्धन के साथ ही इनके वास्तविक मूल्य लगा पाने में नाकाम है।” इसलिए इसकी जि़म्मेदारी बाबा रामदेव एण्ड कम्पनी को दे दी है। ये वही बाबा हैं जो काला धन और भ्रष्टाचार पर ज़ोर-शोर से प्रचार करते आज से चार-पाँच साल पहले दिखा करते थे। इन महोदय के पास क़रीब 100 ट्रस्ट, सोसायटी और कम्पनियाँ हैं, जो जन-कल्याण का काम करती हैं। अभी फि़क्की के एक सम्मेलन में इन्होंने बताया कि अभी तक उनकी कम्पनी 11 हज़ार करोड़ का जन-कल्याण कर चुकी है और अभी वे कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण में एक लाख करोड़ का जन-कल्याण करना चाहते हैं। बाबा जी का जन-कल्याण जानने के लिए जब इनका खाता-बही देखा गया तो पता चला कि पतंजलि की बिल्डिंग की सफ़ेदी-सफ़ाई भी “जन-कल्याण” है! वहाँ 12 घण्टे काम करने वाले ‘मज़दूर-कर्मचारी’ नहीं बल्कि “सेवक” हैं जिनके परिवार के गुज़ारे एवं सेवा के लिए बाबा कुछ सेवा फल मासिक तौर पर “जन-कल्याण” के नाम पर प्रदान करते हैं!* बाक़ी आप जानते ही हैं कि समय-समय पर जो “जन-कल्याणकारी” योग-शिविर लगता है और अलग-अलग स्तर के जो करोड़ों रुपये के शुल्क बाबा योग सिखाने का लेते हैं, वो तो “जन-कल्याण” है ही!

*सेवा के नाम पर अपने ही कर्मचारियों का शोषण*

ये “जन-कल्याणकारी” संस्थाएँ अपने कर्मचारियों का शोषण करने में भी गुरेज़ नहीं करतीं। बहुत से एनजीओ, सोसायटी स्व-रोज़गार के उद्यम चलाते हैं। पहाड़ों में या दूरदराज के गाँवों में स्थानीय जड़ी-बूटियाँ, सब्जि़याँ, अचार या किसी क्राफ़्ट की वस्तुएँ आदि लेकर शहरों में हाई-क्लास सोसायटी के बीच में उसकी मार्केटिंग करते हैं और ख़ूब मुनाफ़ा कमाते हैं। लेकिन इन्हें बनाने वाले, जड़ी-बूटियों को जंगलों से लाने, उसकी प्रोसेसिंग, पैकिंग करने या इसकी मार्केटिंग में लगे कर्मचारियों तक को उनके श्रम की वाजिब क़ीमत तक नहीं मिलती।

पिछले साल देहरादून में एक बड़े ट्रस्ट राफ़ेल राइडर शशाया इण्टरनेशनल सेण्टर (जहाँ विकलांग बच्चों का इलाज, देखरेख और पढ़ाई आदि होती है) के कर्मचारियों ने अपने वेतन बढ़ाने के लिए आन्दोलन किया। 15-20 साल तक काम करने वाले इन कर्मचारियों को केवल 6000-7000 हज़ार रुपये ही मासिक वेतन दिये जा रहे थे। वहाँ के कर्मचारियों ने बताया कि पहले तो हम कम तनख़्वाह के बावजूद कुछ भी नहीं बोलते थे, क्योंकि हम यह मानकर चलते थे कि ये सेवा का काम है। लेकिन हमने देखा कि इसके प्रबन्धक, मैनेजिंग कमेटी के लोग विलासिता से रह रहे हैं। जब-तब वे अपनी तनख़्वाहें बढ़ा लेते हैं। जब हमारी बात आती है तो संसाधनों और पैसे की कमी का रोना रोते हैं। जबकि यहाँ सालों-साल कुछ-न-कुछ निर्माण का काम भी चलता रहता है। इससे भी यहाँ का मैनेजमेण्ट अपनी जेब गर्म करता है। जब इस ट्रस्ट के 2015-16 के वार्षिक वित्तीय हिसाब को देखा गया तो पता चला कि उस वर्ष इसे विदेशों से 3 करोड़ 62 लाख 3 हज़ार, 1 करोड़ 87 लाख 84 हज़ार का भारतीय अनुदान और ख़ुद राफ़ेल की आय 8 लाख 49 हज़ार थी। इसकी फ़ण्डिंग रतन टाटा समूह, ओएनजीसी, मैक्स इण्डिया, आरईजीई फ़ाउण्डेशन से होती है। करोड़ों की सलाना आय के बावजूद ये अपने कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं देता है।

ये सिर्फ़ राफ़ेल का ही मामला नहीं है। रामदेव एण्ड कम्पनी के मज़दूर भी न्यूनतम वेतन और श्रम क़ानूनों के तहत मिलने वाली तमाम सुविधाओं के लिए हड़ताल कर चुके हैं। आपने गोरखपुर के गीता प्रेस के मज़दूरों के आन्दोलन के बारे में सुना ही होगा, जो सम्मानजनक वेतन की माँग कर रहे थे। गीता प्रेस ने इसका ख़ूब प्रचार किया कि धर्मार्थ कार्यों के लिए चलने वाली संस्था इतनी तनख़्वाह कैसे दे सकती है! लेकिन इसकी मैनेजमेण्ट ने यह नहीं बताया कि कैसे इसकी वितरण शाखाएँ पूरे देश में बढ़ती जा रही हैं? मैनेजमेण्ट ने यह भी नहीं बताया कि उसकी किताबों की वार्षिक बिक्री क़रीब 54 करोड़ रुपये है।

असल में किसी बड़े एनजीओ का वार्षिक बजट सैकड़ों-हज़ारों मिलियन्स या कई बिलियन डॉलर्स हो सकता है। 1999 में ही ‘अमेरिकन एसोसियेशन ऑफ़ रिटायर्ड पर्सन्स’ का बजट 540 मिलियन डॉलर्स से अधिक था! अधिकतर एनजीओ अपने वित्त के लिए सरकारों पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं। सरकारें जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में राजस्व की कमी का रोना रोती हैं, जबकि इससे ज़्यादा की राशि को तमाम एनजीओ की गतिविधियों के लिए दे देती हैं। इन एनजीओ के मालिक व मैनेजमेण्ट देशी-विदेशी फ़ण्डिंग से विलासिता की ज़िन्दगी जीते हैं, जबकि इसमें काम करने वाले कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं मिलता है। बहुत से नौजवान एनजीओ आदि में काम करके बमुश्किल अपना जेब-ख़र्च निकाल पाते हैं, लेकिन वे यह सोचकर अपने दिल को ख़ुश किये रहते हैं कि वे समाज-सेवा का काम कर रहे हैं।

*रँगे सियारों की समाज-सेवा*

क्या आप आड़ू के पेड़ में आम फलने की कल्पना कर सकते हैं? या गेहूँ की फ़सल बोकर गन्ना काटने की उम्मीद कर सकते हैं? नहीं न! उसी तरह क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, कॉर्पोरेट्स या पूँजीपति जो पूरी दुनिया के मेहनतकशों को लूट रहे हैं, इनके द्वारा खड़े किये गये एनजीओ, ट्रस्ट, धर्मार्थ सेवा संगठन आदि वास्तव में जनता की सेवा के लिए हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि एक तरफ़ ये पूँजीपति अपने मुनाफ़े के लिए मेहनतकशों की हड्डियों को भी पाउडर बनाकर बेच देंगे, संसाधनों पर कब्ज़े के लिए युद्ध तक छेड़ देंगे, खाद्यानों को बर्बाद करके उसको अपने गोदामों में सड़ा देंगे, भुखमरी का संकट खड़ा कर देंगे, लेकिन इसके बाद वही पूँजीपति, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने ट्रस्ट, एनजीओ के माध्यम से समाजसेवा का काम करेंगे? आखि़र इन पूँजीपतियों की दयालुता, सहृदयता का राज क्या है? दोनों हाथों से जनता को लूटने वाले ये रँगे सियार आखि़र बीच-बीच में समाजसेवी-खैरात की दुकानें क्यों सजाते हैं? अब आप थोड़ा असमंजस में पड़ गये होंगे। इस असमंजस को दूर करने के लिए चलिए एनजीओ आदि की राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति पर थोड़ी चर्चा की जाये।

*नक़ाब के पीछे की सच्चाई*

वैसे देखा जाये तो मानव सेवा, समाज सेवा का काम कोई नया नहीं है। मध्यकाल में धर्म और उससे जुड़ी संस्थाएँ ये काम बख़ूबी किया करती थीं। लेकिन इसके साथ ही ये संस्थाएँ मौजूदा व्यवस्था को वैधता भी प्रदान किया करती थीं। जनता के बीच ये भ्रम बनाने में कि राजा ही हमारा वास्तविक प्रतिनिधि है, राजा की इच्छा ही ईश्वर की इच्छा है और राजा की सेवा ही हमारा धर्म है, ये सोच बनाने में इन्हीं धार्मिक संस्थाओं का ही योगदान होता था। इस कारण इन मठों, मन्दिरों, चर्च आदि को राजे-रजवाड़ों, सामन्तों आदि से अकूत धन-दौलत, ज़मीन इत्यादि मिला करती थी और ये संस्थाएँ पूरी निष्ठा के साथ अपने हुक्मरानों के कि़लों की हिफ़ाज़त किया करती थीं। अब आप कहेंगे कि ये तो पुराने ज़माने की बात है। चलिए नये ज़माने पर आते हैं –

*नये ज़माने का पुराना भ्रम*

वर्तमान शासकों को इन एनजीओ, ट्रस्ट की क्या ज़रूरत? अभी चर्चा हुई कि धार्मिक संस्थाएँ पुराने शासकों की वैधता की गारण्टी थीं। आज के शासक वैधता किससे प्राप्त करते हैं? ग्राम्शी ने बताया है कि मीडिया से। सिर्फ़ मीडिया से ही! नहीं! ये स्वयंसेवी संगठन, ट्रस्ट, एनजीओ आदि भी आज के शासकों को वैधता के सर्टिफि़केट प्रदान करते हैं। कैसे?

ये जनता के बीच उस भ्रम को पैदा करते हैं कि इस व्यवस्था में छोटे-छोटे सुधार करके इसको बेहतर बनाया जा सकता है। ये बताते हैं कि जनता की तबाही-बर्बादी की जि़म्मेदार यह पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था नहीं बल्कि कुछ शासकों की ग़लत नीतियाँ, भ्रष्टाचार आदि है – जिसको ठीक किया जा सकता है।

आप जानते हैं कि 20वीं शताब्दी क्रान्तियों, जन-संघर्षों और युद्ध की शताब्दी रही है। ये वो दौर रहा है जब भारत सहित तीसरी दुनिया के तमाम देशों की जनता उपनिवेशवाद, अर्द्धउपनिवेशवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ सड़कों पर थी। इसी दौर में रूस के मज़दूरों ने समाजवादी क्रान्ति की। इन संघर्षों और क्रान्तियों ने पूँजीपतियों और साम्राज्यवादी देशों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अपने लूट के साम्राज्य को बचाये रखने और सम्भावित क्रान्तियों के डर से साम्राज्यवादियों ने अपनी रणनीति को बदला। कुछ देशों में अपने जूनियर पार्टनरों को, कुछ में अपने पिट्ठुओं को, कुछ में सैनिक तानाशाहों को सत्ता सौंपी। नवस्वाधीन देशों में भी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी लूट की नीतियाँ बदस्तूर जारी रहीं और इन नीतियों के कारण होने वाली तबाही-बर्बादी, शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जन-संघर्ष भी जारी रहे। हमारे देश में भी आज़ादी के बाद तेलंगाना, तेभागा, पुनप्रा-वायलार, नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ ही आपातकाल के दौर के संघर्षों का इतिहास रहा है। ये जनसंघर्ष कहीं पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्तियों में न बदल जायें, इसके लिए ज़रूरी था कि ऐसे संगठन खड़े किये जायें जो जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन को दिशाहीन कर सकें। जनता में इसी व्यवस्था को बेहतर बनाने का भ्रम पैदा कर सकें।

*हमारे हितैषी पूँजी के सरपरस्त गुलाम हैं*

दूसरे विश्व युद्ध के बाद तीसरी दुनिया के तमाम देशों में स्वयंसेवी संगठन, ट्रस्ट, एनजीओ आदि बहुतायत में उठ खड़े हुए। ये मानवाधिकार के मुद्दे, दलित-उत्पीड़न, आदिवासी उत्पीड़न, जल-जंगल-ज़मीन, पर्यावरण, स्त्री-प्रश्न आदि-आदि पर हस्तक्षेप करते दिखायी देते हैं। लेकिन ये कभी-भी इन सारे सवालों को पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था से जोड़कर नहीं प्रस्तुत करते, बल्कि इन सवालों को अलग-अलग टुकड़ों में हल करने का समाधान प्रस्तुत करते हैं। ये पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए पूँजीपतियों, उनकी सरकारों, और साम्राज्यवादियों से गुहार लगायेंगे! शासकों के दमन-उत्पीड़न की नीतियों के ख़िलाफ़ न्यायपालिका से गुहार लगायेंगे! लेकिन कभी-भी जनता को क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए लामबन्द नहीं करेंगे।

    मज़े की बात यह है कि 1960 के दशक में जहाँ अमेरिकी साम्राज्यवाद परस्त सैनिक तानाशाहियाँ क़ायम हुईं या नवस्वाधीन देशों के शासकों ने अपनी नीतियों के लिए जनता का दमन किया, उन देशों में फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन ने जनहित क़ानून के निर्माण की दिशा में ख़ूब काम किया। मुक़दमेबाजी से सम्बन्धित ढेर सारे संगठन उठ खड़े हुए जैसे – विमेंस लॉ फ़ण्ड, एनवायरमेण्टल डिफ़ेंस फ़ण्ड, नेचुरल रिसोर्सेज डिफ़ेंस काउंसिल आदि-आदि। ‘अमेरिकी वॉच’ जैसे संगठन दमन-उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पैनी निगाह रखने लगे और जनता में इस विचार को स्थापित करने का काम करने लगे कि विद्रोह मूर्ख शासकों की नीतियों का परिणाम होते हैं। लुब्बेलुबाब यह कि जिन्होंने पर्यावरण को तबाह किया उनके द्वारा खड़े किये एनजीओ ने पर्यावरण पर चीख़ना-चिल्लाना शुरू किया, जिन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुँध दोहन किया उनके ट्रस्टों ने प्राकृतिक संसाधनों की हिफ़ाज़त का रोना रोया, जिन्होंने अपने मुनाफ़े के लिए जनता का दमन और क़त्लेआम किया उनके स्वयंसेवी संगठन मानवाधिकारों के पैरोकार हो गये।

अब आप ख़ुद सोचिए कि देशी-विदेशी फ़ण्डिंग एजेंसियों, सरकारों आदि से लाखों-करोड़ों का अनुदान प्राप्त करने वाली इन संस्थाओं की राजनीति क्या है? क्या कारण है कि ये संस्थाएँ तीसरी दुनिया के उन देशों में सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं, जहाँ क्रान्तिकारी परिवर्तन की सम्भावनाएँ मौजूद हैं? अपने चेहरे पर मानवीय मुखौटा लगाये हुए ये पूँजी के मालिकों के गुलाम हैं जो यह नहीं चाहते कि जनता एकजुट होकर उनकी बनी-बनायी व्यवस्था को नेस्तनाबूद कर दे। ये जनता को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटकर उसकी वर्गीय एकजुटता को तोड़ने का काम करते हैं। इसके साथ ही ये क्रान्तिकारी बनने की सम्भावना से लैस नौजवानों को सुधारवाद की घुट्टी पिलाकर उन्हें वेतनभोगी समाज-सुधारक बना देते हैं। एनजीओ के इस ख़तरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र को समझने और उसे बेनक़ाब करने की आज सख्त ज़रूरत है।
मज़दूर बिगुल, जनवरी 2019 अंक में प्रकाशित 
➖➖➖➖➖➖➖➖
🖥 प्रस्‍तुति - Uniting Working Class
👉 *हर दिन कविता, कहानी, उपन्‍यास अंश, राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक विषयों पर लेख, रविवार को पुस्‍तकों की पीडीएफ फाइल आदि व्‍हाटसएप्‍प, टेलीग्राम व फेसबुक के माध्‍यम से हम पहुँचाते हैं।* अगर आप हमसे जुड़ना चाहें तो इस लिंक पर जाकर हमारा व्‍हाटसएप्‍प चैनल ज्‍वाइन करें - http://www.mazdoorbigul.net/whatsapp
चैनल ज्वाइन करने में कोई समस्या आए तो इस नंबर पर अपना नाम और जिला लिख कर भेज दें - 9892808704 
🖥 फेसबुक पेज - 
https://www.facebook.com/mazdoorbigul/
https://www.facebook.com/unitingworkingclass/
📱 टेलीग्राम चैनल - http://www.t.me/mazdoorbigul

हमारा आपसे आग्रह है कि तीनों माध्यमों व्हाट्सएप्प, फेसबुक और टेलीग्राम से जुड़ें ताकि कोई एक बंद या ब्लॉक होने की स्थिति में भी हम आपसे संपर्क में रह सकें।

Sunday, 28 March 2021

क्या भारत बनेगा विकासशील देश? भारत के नागरिकों के हालात कैसे हे?


किसी भी भारतीय से पूछिए कि भारत का विकास कैसा होना चाहिए?तो अधिकतर का जवाब यही होगा कि अमेरिका की तर्ज़ पर भारत भी विकसित राष्ट्र बने। लेकिन ठहरिए! अमेरिकी अपने एक निर्दोष नागरिक की कस्टोडियल मौत के बाद आंदोलित हो गए थे। लेकिन भारतीय गृह मंत्रालय के मुताबिक़ भारत मे हर दिन पांच लोग पुलिस के ज़ेरेहिरासत मरते हैं। यह रिपोर्ट 2019-20 की है, जिसमें गृहमंत्रालय ने बताया था कि भारत में हर दिन औसतन पांच लोग पुलिस के ज़ेरेहिरासत जान गंवाते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में 2019-20 में 400 लोग न्यायिक हिरासत मारे गए हैं। इसके बाद मध्यप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र का नंबर है। इन राज्यों में भी 2019-20 में न्यायिक हिरासत में औसतन प्रत्येक राज्य में 100 से अधिक लोग मारे गए हैं। ये ऐसी मौतें हैं जिसके खिलाफ कोई आंदोलन नहीं होता, कहीं काली पट्टी बांधकर मोमबत्ती जुलूस भी नहीं निकाला जाता है। आपको याद होगा कि बीते वर्ष कोरोना काल में अमेरिका में जार्ज फ्लाॅयड नाम के काले शख्स की पुलिस द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस हत्या के खिलाफ अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश #BlackLivesMatter की तख़्तियां हाथों में लेकर सड़को पर उतर आए थे। इधर भारतीय गृहमंत्रालय तो खुद स्वीकार कर रहा है कि हर दिन औसतन पांच लोग पुलिस कस्टडी या न्यायिक हिरासत में अपनी जान गंवाते हैं लेकिन इसके बावजूद इन घटनाओं के ख़िलाफ विरोध के स्वर सुनाई नहीं देते। शनिवार को यूपी के अंबेडकरनगर मे पुलिस के ज़ेरे हिरासत ज़ियाउद्दीन की हत्या हो गई। सवाल फिर वही है कि भारतीय समाज अमेरिकियों की तर्ज़ पर इस तरह के अपराध के ख़िलाफ कब अभियान चलाएगा? क्या सिर्फ चमचमाती सड़कें, ऊंची-ऊंची इमारतें बनाना ही विकसित राष्ट्र का पैमाना हैं? हक़ीक़त यह है कि मानवाधिकारों एंव मानवीय मूल्यों की रक्षा के बिना ये तमाम चीज़ें बेईमानी हैं। जिस समाज में मानवीय मूल्यों, मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती, वह समाज कुछ भी हो सकता है लेकिन उसे विकसित समाज नहीं कहा जा सकता।।

*Wasim Akram Tyagi✍✍*

कच्छ Demolition 2026 Riport।

कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों,  इस रिपोर्ट को तैयार करने का...