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Tuesday, 20 April 2021

क्या इन सवालो के जवाब दुनिया मे होंगे.

-----------"पाखण्ड क्या है दिमाग लगाओ"------------

क्या ब्रम्हा के चार सिर हो सकते है ?

क्या श्रंगी रिषि हिरनी से पैदा हो सकते है ?

क्या द्रोणाचार्य दोने से पैदा हो सकते है ?

क्या पारा रिषि पारे से पैदा हो सकते हैं ?

क्या हनूमान अंजनी के कान से पैदा हो सकते है ?

क्या कर्ण सूर्य से पैदा हो सकते है ?

क्या गणेश मैल से पैदा हो सकते है ?

क्या जनक अपने मरे पिता कि जॉघ से पैदा हो सकते है ?

क्या राम खीर खाने से पैदा हो सकते है ?

क्या सीता जी घड़ा से पैदा हो सकती है ?

क्या लव कुश को बाल्मीक जी घास से पैदा कर सकते हैं ?

क्या मनु की छींक से इछ्वाकु पैदा हो सकते हैं ?

क्या जालन्धर जल से पैदा हो सकता है ?

क्या मकरध्वज मछली से पैदा हो सकता है ?

क्या सोने की लंका राख हो सकती है ?

क्या हनूमान सूर्य को निगल सकते है ?

क्या हिरण्यक्ष प्रथ्वी को उठा सकता है ?

क्या पत्थर पानी पर तैर सकते है ?

क्या जुआ खेल कर द्रोपदी स्त्री को 
जुवॉ मे हारने वाले युधिष्ठिर धर्मराज हो सकते है ?

जो चीज मुख से खाई जाती है वह अमासय अथवा आंत मे जाती है और बच्चा गर्भासय से पैदा होता है तो दशरथ की रानियों ने खीर खाई तो कैसे खाई जो गर्भासय मे प्रवेश कर गई और राम लक्ष्मण भरत सत्रुध्न पैदा हुये ?

जागो बहुजन मूलनिवासी जागो।
        
बता दो उन ढोंगियों को जो धर्म के नाम पर तुम्हारा शोषण करते है।

और तुम्हे अॉखों के होते हुये भी अन्धा बना रहे है....
 
मिट्टी की देवी ,पत्थर के महादेव ,गोबर को गणेश कर तुमसे सब पुजवा रहे है।

लोग कहते है कि ब्रम्हा ने श्रष्टि बनाई उनके

1.  मुख से ब्राह्मण पैदा हुय

2. उनके हॉथों से क्षत्रिय पैदा हुये
               
3. पेट से वैश्य पैदा हुये 

4. पैरो से सूद्र पैदा हुये

लेकिन मुस्लमान सिख्ख इसाई...?

पशु पक्षी कीड़े मकोड़े ये ब्रम्हा  के किस अंग से पैदा हुये क्या ये श्रष्टि मे नही आते है ?

अगर आते है तो ये ब्रम्हा जी के किस अंग से पैदा हुये..?

 
"दिमाग लगाओ और सत्य असत्य को जानो पाखण्डवाद ,ब्राह्मणवाद, मनुवाद को मिटा कर विज्ञान के पथ पर चलो...।

Monday, 19 April 2021

સમસ્યાનું નિરાકરણ:નવસારી ખાટકીવાડ મસ્જિદ-દરગાહના વિવાદનો સુખદ અંત આવતા બંને પક્ષે રાહત.

19 april 2021 Safteamguj.

એક સપ્તાહ પહેલા કોર્ટના હુકમથી મસ્જિદને સિલ કરી દેવામાં આવી હતી.

નવસારીમાં આવેલ ખાટકીવાડ મસ્જિદમાં એક સપ્તાહ પહેલા કોર્ટના હુકમને લઇને પ્રાંત અધિકારી અને ડીડીઓની હાજરીમાં ચુસ્ત પોલીસ બંદોબસ્ત વચ્ચે મસ્જિદ સિલ કરવામાં આવી હતી. જો કે તે જ દિવસથી નવસારી અને વડોદરાના ટ્રસ્ટીઓ વચ્ચે સમાધાનના પ્રયાસો હાથ ધર્યા હતા અને બને પક્ષો વચ્ચે સમાધાન થયું હોવાની માહિતી મળી છે.

નવસારી ટાટા સ્કૂલ રોડ ખાતે આવેલ ખાટકીવાડ મસ્જિદ માં આવેલ સૈયદ અમીર એ મિલ્લત ની દરગાહ આવેલ છે. મસ્જિદ પક્ષ અને દરગાહ પક્ષનો 14 વર્ષથી વિવાદ ચાલતો હતો. જેનો અંત તાજેતરમાં વડોદરા ખાતે મળેલી મિટિંગમાં આવ્યો હતો. વધુમાં 14 વર્ષ દરમિયાન થયેલ 18 મિટિંગ નિષ્ફળતા બાદ મસ્જિદ પક્ષ તરફથી આશ્વાસન આપવામાં આવ્યું હતું કે, અમો નવસારીના સમજદાર મુસ્લિમ હોઈ આ વિવાદનો હંમેશ માટે નિવારણ કરશું અને અમોએ કરેલ સમજૂતી બંને પક્ષને માન્ય રહેશે. તેવી રજુઆત થઈ હતી.

વડોદરા ખાતે આવેલ ખાનકાહ એહલે સુન્નતના ગાદી પતિ સૈયદ મોઈનનુદીન બાવા સાહેબ દરગાહ તરફથી અને જનાબ સબ્બીરભાઈ મદદ (કુરેશી) ટ્રસ્ટી મસ્જિદ તરફથી તેમજ બંને પક્ષના અગ્રણીઓએ સાજીદભાઈ ઝવેરી, ઝુબીન કુરેશી, બુરહાનભાઈ મલેક, આશીફભાઈ બરોડાવાળા, અંજુમભાઈ શેખ વગેરે અને વડોદરાથી જનાબ મુસ્તુફાભાઈ હાલોલ, બાબુભાઈ વકીલ, નુરુલ્લાભાઈ પઠાણ, મોહમદ હાજી સિદ્દીકભાઈ, મોઇન ભાઈ મકરાણી વગેરેની હાજરીમાં ચાર મુદ્દા પર સમાધાન થયું હતું. હવે આ સમાધાન કોર્ટમાં રજૂ કરવામાં આવશે પછી મસ્જિદ બાબતે નામદાર કોર્ટ નિર્ણય લેશે. આ બાબતે નવસારીમાં જાણ થવાથી મુસ્લિમ સમાજમાં આનંદની લાગણી છવાઈ હતી.

કઈ બાબતો વચ્ચે સમાધાન થયું

  • મજાર શરીફને અડીને આવેલ દાદર તેમજ મજારની ઉપરથી થયેલ દાદરનું બાંધકામ દૂર કરવું.
  • મજારની જમણી બાજુએ આવેલ સંડાસોનું બાંધકામ દુર કરી ત્યાંથી મજાર પર જવાનો એક દરવાજો રાખવો.
  • ઈ :સ 2007 પહેલા આવેલ બે મજાર જે આપે સ્લેબ નીચે દબાવેલ છે, તેને પાછા બહાર કાઢવા અને ત્રણે મજારનું રિનોવેસન દરગાહ પક્ષ પોતાને ખર્ચે કરશે
  • ઈ:સ 2007 પહેલા જે રીતે મસ્જિદમાં વાર્ષિક ઉર્સનું આયોજન થતું હતું, તે રીતે થશે જેમાં મસ્જિદ ટ્રસ્ટ સહકાર આપશે.

આ દરેક મુદ્દા પર મસ્જિદ પક્ષ તૈયાર થયો હતો. આ સમજૂતી પત્ર હવે માન્ય ગુજરાત હાઈ કોર્ટમાં મૂકી ટૂંક સમયમાં મસ્જિદનું સીલ ખોલવાની પ્રક્રિયા શરૂ થશે.



‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’- कोरोना के साथ भी, कोरोना के बाद भी आने वाला हे मनुष्य के लिये गुलाम बनाने वाली नितीया.

‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ स्थापित करने के लिए दुनिया की महाशक्तियाँ पूरी तन्मयता से लगी हुई हैं। यह एक ऐसा लंबा विराम है जिसमें दर्शकों के सामने पर्दा गिरा दिया गया है और ग्रीन रूम में अभिनेता पोशाक बदल रहे हैं। जब पर्दा उठेगा तो मंच पर साज- सज्जा बदली हुई होगी।
image courtesy : Al Jazeera

कोरोना के साथ चलते हुए दुनिया बदल रही है। दबी ज़ुबान से कुछ जानकार यह मान भी रहे हैं कि कोरोना एक बीमारी या महामारी नहीं है। अगर उनकी बात में लेशमात्र भी सच्चाई है तो वाकई कोरोना एक समयावधि है। एक काल-खंड है। एक अंतराल है। जिसे बीतना ही है। लेकिन यह तब तक नहीं बीतेगा जब तक पूरी दुनिया में पूंजीवाद का नया ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ स्थापित होकर अमल में नहीं आ जाता। चूंकि दुनिया के तमाम देश अलग-अलग भू-राजनैतिक परिस्थितियों में बसे हुए हैं और इस विविधता से भरी दुनिया में किसी एक दिन कोरोना की समाप्ति की घोषणा नहीं की जा सकती है इसलिये अलग-अलग देशों के लिए यह काल-खंड या समयावधि अलग- अलग हो सकती है।

Parliament: कोरोना के बाद न्यू वर्ल्ड ऑर्डर हो रहा तैयार, भारत को भी बनना होगा मजबूत प्लेयरः PM मोदी


‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’ स्थापित करने के लिए दुनिया की महाशक्तियाँ पूरी तन्मयता से लगी हुई हैं। यह एक ऐसा लंबा विराम है जिसमें दर्शकों के सामने पर्दा गिरा दिया गया है और ग्रीन रूम में अभिनेता पोशाक बदल रहे हैं। जब पर्दा उठेगा तो मंच पर साज- सज्जा बदली हुई होगी। कलाकार कमोबेश वही होंगे लेकिन उनके परिधान से लेकर चाल चरित्र बदल चुके होंगे। इस बदलाव में कालावधि का ध्यान रखा जाएगा। ताकि दर्शक उस नाटक को निरंतरता में ही देखे।

नाटक या सिनेमा की खूबी यही होती है कि दर्शक अपने स्थान पर ही बैठा रहता है और मंच सज्जा, संगीत संयोजन और प्रकाश संयोजन के प्रभाव और कलाकारों की रूप-सज्जा में फेर बदल करके उसे समय से आगे-पीछे ले जाया जा सकता है। दर्शक इसे कला कहते हैं और उस कला के प्रभाव में आकर उसी के साथ समय के उलट-फेर में हिचकोले खाने लगते हैं।

यह कला वैश्विक स्तर पर एक विराट रंगमंच पर उतर आयी है। दुनिया के अधिकांश देशों के नागरिक इस विराट मंच के प्रेक्षक बना दिये गए हैं। वो टकटकी लगाए देख रहे हैं जो उनके सामने घटित हो रहा है। वो वह भी देखेंगे जो उनके सामने आने वाले समय में घटित होगा।

अन्य देशों के बारे में, उन देशों के कलाकारों के बारे में, उन देशों के दर्शकों के बारे में कुछ सूचनाओं के आधार पर अटकलें लगाईं जा सकती हैं लेकिन अपने प्यारे भारतवर्ष में घटित होती घटनाओं के बारे में, दर्शकों की प्रतिक्रियाओं के बारे में और अपने कलाकारों के बारे में बहुत कुछ ठोस रूप से बताया जा सकता है।

दुनिया रुकी नहीं है। फिलवक्त वह अपनी धुरी पर ही घूम रही है। जो जहां था वो वहीं है। मंच पर चित्र बदल रहे हैं। प्रसंग बदल रहे हैं और किरदार बदल रहे हैं। भारतवर्ष भी अपनी धुरी पर पकड़ बनाए हुए इस घूमती हुई धरती से अपनी संगत बनाए हुए है। दो महीने के सम्पूर्ण लॉकडाउन से उपजी एकरसता अब टूटने लगी है। हिंदुस्तान में अच्छा ये है कि यहाँ मनोरंजन के लिए बहुत कुछ है। अपने-अपने घरों में कैद लोगों के सामने एक टेलीविजन है। डिजिटल तकनीकी से युक्त सर्विस प्रोवाइडर्स हैं। और अनगिनत चैनल हैं। हर चैनल पर कुछ न कुछ एक्स्लुसिव चल रहा है। इसके अलावा इन्टरनेट है, एंड्रायड फोन्स हैं, फेसबुक है, वाट्सएप है, नेटफ्लिक्स है, एमाज़ोन प्राइम है, ज़ी 5 है, हॉट स्टार है जिन पर नयी नयी फिल्में हैं, वेब सीरीज हैं।

यहाँ की राजनीति भी मनोरंजन है। उसमें गहरे संदेश भी हैं लेकिन उन्हें डी-कोड करने की सलाहीयतें नहीं हैं या बहुत कम हैं इसलिए तर्क-वितर्क के खलल नहीं हैं।

कुछ दावे हैं, कुछ वादे हैं, कुछ संकल्प हैं कुछ सिद्धियाँ हैं, कुछ एजेंडे हैं, कुछ गफ़लतें हैं, कुछ भरोसे हैं, कुछ निराशाएं हैं। कहीं चुनाव हैं, कहीं उप-चुनाव हैं, कहीं सरकारों की उठा-पटक है, तो कहीं डिजिटल रैलियाँ हैं तो इनके बीच सभी जगहों से आ रही स्वास्थ्य सेवाओं के कुप्रबंधन की नाकाबिले गौर खबरें भी हैं। बेरोजगारी है, महंगाई है, रेंगती हुई अर्थव्यवस्था है। ढहती हुई संस्थाएं हैं, औचित्यहीन होता सेक्युलरिज़्म है, अहंकारी और एकतरफ तराजू का पलड़ा झुकाये बैठा न्याय-तंत्र है आखिरकार एक दम तोड़ता हुआ 70 साल का बूढ़ा लोकतन्त्र है। लेकिन यह सब मंच के एक हिस्से का ब्यौरा है। जो कमोबेश पहले से मौजूद था।

कोरोना नामक इस कालावधि में जो नया है वो है बीमार हो चुके या बीमारी से जूझते या बीमार हो जाने की भरपूर संभावनाओं के बीच लोगों की कलुषित प्रवृत्तियों को बाहर लाना जबकि इस अवस्था में और इस अवधि में इन्हें बाहर नहीं आना था। इस देश में नया है, बीमारों के प्रति नज़रिया। बीमारी फैलाने के लिए कुछ लोगों की शिनाख्त और उसके बहाने एक पुराने एजेंडे की खुराक की असीमित सप्लाई। मुफ्त मुफ्त मुफ्त।

कोरोना को एक अंतराल या समयावधि कहने की ज़ुर्रत दो महीने पहले नहीं होती। पर आज है क्योंकि सरकारों के आचरण से उनकी प्राथमिकताओं से यह लग नहीं रहा है कि कोरोना वाकई एक संकट है या सबको एक साथ अपनी जद में ले सकने की ताक़त रखने वाली कोई विकराल बीमारी या महामारी है।

देश के शीर्षस्थ नेताओं ने अपने आचरण से यह बार- बार बताया है कि यह एक अंतराल ही है जिसका चयन आप अपनी सुविधा से कर सकते हैं। आप जब चाहें कोरोना पॉज़िटिव हो सकते हैं। जब चाहें क्वारींटाइन हो सकते हैं। आप एकांतवास में जा सकते हैं। आप चाहें तो दो दिन पहले की कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट को धता बताकर बाहर आ सकते हैं (संदर्भ शिवराज सिंह चौहान)। आप चाहें तो संक्रमण के संदेह में 14 दिन पाँच सितारा हस्पताल में मेडिकल टूरिज़म कर सकते हैं और किसी अन्य शहर में लगी पेशी में पेश होने से खुद को बचा सकते हैं (संदर्भ संबित पात्रा)। आप चाहें तो कोरोना काल में किसी बड़े पाँच सितारा हस्पताल का विज्ञापन कर सकते हैं और इस तोहमत से भी बच सकते हैं कि विज्ञापन करने वाले खुद उस उत्पाद का इस्तेमाल नहीं करते (संदर्भ-अमिताभ बच्चन)।

किसी बड़े समारोह का आमंत्रण नहीं मिला तो सवालों की आबरू रखने के लिए भी यह कोरोना रूपी अंतराल एक सहूलियत देता है। इससे पहले कि लोग पूछें आपको बुलाया नहीं गया? आप तपाक से कह सकें कि पॉज़िटिव आ गया। और फिर ट्विटर पर जाकर सर्वसाधारण को सूचित कर दें।

ये सब आचरणगत बदलाव हैं। कोरोना जो तथाकथित रूप से आपको कफन से ढंकने आया था आपने उसे अपने धतकर्म ढंकने के काम ले लिया। जो यहाँ सरकार हैं उनके लिए देह की दूरी एक अचूक युक्ति साबित हुई। जिसे कल तक बुराई भी माना जाता था आज एहतियात में बदल गयी है। इस पूरी समयावधि में अपने-अपने चुनाव-क्षेत्र के जन प्रतिनिधि कहाँ रहे? यह पूछने वाला कोई नहीं क्योंकि कोरोना है। जो बीमारी नहीं अंतराल है। पहले से ही राजनैतिक व्यवहार और आचरण में चली आ रही यह दूरी इस अंतराल में वैधता पा जाती है। यह कोरोना वारीयर्स क्यों नहीं बने जबकि इन्हें अपनी जनता के साथ इस संकट में होना था? यह एक अनुत्तरित सवाल रहेगा। कोरोना से निपटने के लिए पुलिस है, स्वास्थ्य कर्मी हैं, सफाई कर्मी है और मीडिया है। क्यों नहीं पहले दिन से जन प्रतिनिधियों को इस संकट का सामने करने में अगुवाई दी गयी? जो जन प्रतिनिधि इसे स्वास्थ्यगत कारणों के रूप में देख रहे हैं उन्हें यह बात तब ठीक से समझ में आएगी जब यह अंतराल बीत जाने पर उन्हें पता चलेगा कि ऐसे कितने निर्णय जिनमें उनकी भागीदारी ज़रूरी थी, लिए जा चुके हैं। उनकी गैर-मौजूदगी में उनकी शक्तियाँ छीन ली गईं।

यहाँ उल्लेखनीय यह भी है कि देश में नीति आयोग के साथ ही सारी बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय जन प्रतिनिधियों की भूमिका खत्म की जा चुकी है। इनके स्थान पर स्पेशल पर्पज़ व्हीकल जैसे नए पद सृजित हो चुके हैं। मसलन इंडस्ट्रीयल कोरिडोर्स, मैन्यूफैक्चरिंग जोन्स, विशेष आर्थिक क्षेत्र आदि  अलबत्ता ये अनभिज्ञ थे और अब जब वापस काम पर लौटेंगे तो अपनी कुर्सी तलाश करेंगे। यह तय है कि देश में तमाम यान्त्रिकी का सम्पूर्ण कॉर्पोरेटीकरण इस अंतराल का सबसे बड़ा ‘आउट कम’ होने जा रहा है।

यह नया वर्ल्ड ऑर्डर जिसमें दूरी एक केन्द्रीय तत्व है हमारे जीवन के हर पहलू पर असर करने वाला है। इस दूरी को अशोक वाजपेयी ने एक व्याख्यान में बहुत दिलचस्प अंदाज़ में बताया है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। वो कहते हैं कि – “हमारी राष्ट्रीय कल्पना से गरीब गायब हो चुके होंगे। राष्ट्र की सारी कल्पनाएं भद्र लोक, उच्च वर्ग और मध्य वर्ग तक सिमट गई होंगी। इस विराट राष्ट्रीय कल्पना से वही नहीं होंगे जो सबसे ज़्यादा होंगे। सत्ता की नागरिकता से, मध्य वर्ग की दूरी अपने अंत:करण से, पुलिस की दूरी सुरक्षा से, न्यायतंत्र की दूरी न्याय से, राजनीति की नीति से, मजदूरों की दूरी रोजगार से”।

लिखना, भूलने के विरुद्ध एक कार्यवाही है। इसलिए यह भी लिखा जाना चाहिए कि इस ‘अंतराल को अवसर’ में बदलने का हुंकार किसी और ने नहीं देश के प्रधानमंत्री ने भरी थी और उन्होंने इसे करके दिखाया है। जो काम मंच पर दर्शकों के आगे पर्दा डाले बिना नहीं हो सकते थे वो काम अब किए जा रहे हैं बिना किसी संकोच, लिहाज और नीति के। जो काम इस अंतराल के बीत जाने के बाद किए जा सकते थे वो भी अभी ही निपटा लिए जा रहे हैं। तमाम निगमों, सरकारी कंपनियों, इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेचना हो या सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने वाली नीतियां बनाना और लागू करना हो। सरकार की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबाना हो। सब कुछ इसी दौर में अविलंब किया जाना है।

देश अब अनलॉक हो चुका है लेकिन राजनैतिक कार्यक्रमों (असल में नागरिक जुटान, प्रतिरोध या प्रदर्शन) आज भी वर्जित हैं। धार्मिक कांड किए जा सकते हैं। सरकारोन्मुखी सामाजिक काम भी किए जा सकते हैं। यह एक स्थायी कायदा होने जा रहा है जो भी इस न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के लिए मुफीद होगा।

(लेखक पिछले 15 सालों से सामाजिक आंदोलनों से जुड़कर काम कर रहे हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)




Thursday, 15 April 2021

इतिहास मे कई महा बिमारियां फैली हे.

हारून रशीद के दौर में एक बहुत बडी महामारी फेल गयी इस महामारी के असरात समरकन्द से लेकर बगदाद तक और कूफ़ा से लेकर मराकीज़ तक ज़ाहिर होने लगे, हारून रशीद ने महामारी से निपटने के लिए तमाम तदबीरें अपना ली गल्ले के गोडाउन खोल दिये, टेक्स माफ कर दिए, पूरी सल्तनत में सरकारी लंगरखाने क़ायम कर दिए। और तमाम उमरा व ताजीरों को मुतास्सिरिन की मदद केलिए मुबलाइज़ कर दिया मगर इसके बावाजूद अवाम की हालत ठीक ना हुई। 

एक रात हारून रशीद बहुत टेंशन में थे, उन्हें नींद भी नही आ रही थी, टेंशन के इस आलम में उनके वज़ीर याह्या बिन खालिद को तलब किया। याह्या बिन खालिद हारून रशीद के उस्ताद भी थे। याह्या बिन खालिद ने बचपन से हारून रशीद की तरबियत की थी। हारून रशीद ने याह्या बिन खालिद से कहा उस्ताद! मुझे ऐसी कहानी या ऐसी दास्तान सुनाए जिसे सुनने के बाद मुझे करार आ जाये। याह्या बिन खालिद मुस्कुराये और अर्ज़ किया बादशाह सलामत। मैने अल्लाह के किसी नबी की हयाते तय्यैबा में एक दास्तान पढ़ी थी, दास्ताने मुकद्दस किस्मत और अल्लाह की रज़ा की सबसे बड़ी और शानदार तश्बी है। अगर आप इज़ाजत दे तो वो दास्तान आपके सामने दोहरा दु। बादशाह ने बैचेनी से फ़र्माया या उस्ताद! बिल्कुल फरमाइए।

किसी जंगल मे एक बंदरिया सफर केलिए रवाना होने लगी, उसके साथ एक बच्चा था, वह बच्चे को साथ नही ले जा सकती थी चुनांचे वह शेर के पास गई, उसने अर्ज़ किया जनाब आप जंगल के बादशाह है। में सफर पर रवाना होने वाली हूं, मेरी ख्वाइश है आप मेरे बच्चे की जिम्मेदारी आप खुद ले लो, शेर ने हामी भर ली। बंदरिया ने अपना बच्चा शेर के हवाले कर दिया। शेर ने बच्चा कंधे पर बैठा लिया बंदरिया सफर पर रवाना हो गई। अब शेर बच्चे को रोज़ाना कंधे पर बैठाता और जंगल मे अपने रोजमर्रा के काम करता रहता। एक दिन वह जंगल मे घूम रहा था के अचानक आसमान से एक चील ने गोता लगाया शेर के करीब पहुंची बंदरिया का बच्चा उठाया, और आसमान में गुम हो गई। शेर जंगल मे भागता दौड़ता रहा, लेकिन वह चील को ना पकड़ सका। याह्या बिन खालिद रुके चेन की सांस ली, और हारून रशीद को अर्ज़ किया:

"बादशाह सलामत! चंद दिन बाद बंदरिया वापस आई और शेर से अपने बच्चे का मुतालबा किया, शेर ने शर्मिंदगी से जवाब दिया तुम्हारा बच्चा तो चील ले गई है, बंदरिया को गुस्सा आ गया और उसने चिल्लाकर कहा: "तुम कैसे बादशाह हो ? तुम एक अमानत की हिफाज़त नही कर सकते ? तुम ये सारे जंगल का निज़ाम कैसे चलाओगे ? शेर ने अफसोस से अपना सर हिलाया और बोला में ज़मीन का बादशाह हूँ, अगर ज़मीन से कोई आफत तुम्हारे बच्चे की तरफ बढ़ती तो में रोक लेता। मगर ये आफत आसमान से उतरी थी। और आसमान की आफ़तें सिर्फ और सिर्फ आसमान वाला ही रोक सकता है। 

ये कहानी सुनाने के बाद याह्या बिन खालिद ने हारून रशीद से अर्ज़ किया: "बादशाह सलामत! ये आफत भी अगर ज़मीन से निकली होती तो आप रोक लेते, ये आसमान का अज़ाब है, इसे सिर्फ अल्लाह तआला ही रोक सकता है। चुनांचे आप इसे रोकने केलिए बादशाह ना बने, फ़क़ीर बने ये आफत रुक जाएगी। 

दुनियां में आफ़तें दो किस्म की होती है, आसमानी मुसीबतें और ज़मीनी आफ़तें, आसमानी आफत से बचने केलिए अल्लाह तआला का राज़ी होना ज़रूरी होता है, जबके ज़मीनी आफत के बचाव केलिए इंसान का मुत्तहिद होना ज़रूरी होता है।   

याह्या बिन खालिद ने हारून रशीद से कहा था आसमानी आफत उस वक़्त तक खत्म नही होती, जबतक इंसान अपने रब को राजी ना करदें। आप इस वक़्त का मुकाबला बादशाह बनकर नही कर सकेंगे। चुनांचे अपने आप को फ़क़ीर बनाये। अल्लाह के हुजूर गिर जाए, उससे मदद मांगे, दुनिया के तमाम मसाइल उसके हल के दरमियान सिर्फ इतना फ़ासला होता है जितना माथे और "जानमाज़ में होता है। दोस्तों अपने मसाइल केलिए हम सात समंदर पार तो जा सकते है। लेकिन माथे और जानमाज़ के दरमियान के मौजूद चंद इंच का फ़ासला तैह नही कर सकते। 

मेरे दोस्तों इस कहानी से मुराद ये है के अल्लाह भी हमसे इस वक़्त नाराज़ है, पूरी दुनिया के ऊपर एक छोटे से वायरस को ऐसे मुसल्लत कर दिया है के तमाम दुनिया को रोककर रख दिया है। तमाम दुनिया के कारोबार रुक गए।

जब कोई शख़्स अपने किसी करीबी से नाराज होता है तो उसे अपने घर पर बुलाना भी पसंद नही करता। अब हम इससे अंदाज़ा लगा सकते है, खानाए काबा पर जाने से रोक लगा दी, मस्जिदों में जाने से रोक लगा दी। मगर तौबा के दरवाजे आज भी खुले है। बस हमें बादशाह से फ़क़ीर बनना है। इंशाअल्लाह, 

अल्लाह ये मसला चुटकी में हल कर देगा।

कोरोना वायरस लॉकडाउन के बीच सरकार ने कंपनियों को राहत देने के लिए कानून में किया बड़ा बदलाव.

SAFTEAM 15 APRIL 2021

कोरोना वायरस लॉकडाउन के बीच सरकार ने कंपनियों को राहत देने के लिए कानून में किया बड़ा बदलाव.

कोरोना वायरस (Coronavirus Pandemic) की वजह से कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान में राहत देने के लिए सरकार (Government of India) ने बड़ा फैसला लेते हुए IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) में बदलाव किया है. आइए जानें इसके बारे में...

नई दिल्ली.  सरकार ने एक अध्यादेश (Ordinance) के जरिए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC-Insolvency and Bankruptcy Code) में बदलाव कर दिया है. इस संसोधन के बाद कोविड-19 महामारी की वजह से जिन कंपनियों ने डिफॉल्ट किया है, उन्हें उनके लेंडर्स (कर्ज़ देने वाली बैंक या कंपनी) IBC (कोर्ट) में नहीं घसीट सकते हैं. सरकार ने ऑर्डिनेंस के जरिए IBC के सेक्शन 7, 9 और 10 को फिलहाल सस्पेंड कर दिया है. अगर आसान शब्दों में कहें तो आपने कारोबार चलाने के लिए बैंक में कर्ज लिया है और लोन नहीं चुकाने की वजह से अगर आपको डर हैं कि कहीं आप पर आईबीसी के तहत कार्रवाई न हो जाए तो  इसका इंतजाम कर दिया गया है. केंद्र सरकार ने दिवाला से संबंधिन एक नए अध्यादेश को लागू करने की मंजूरी दे दी है. ये कानून आपको कर्जों से फिलहाल राहत देने में मददगार है.

मार्च तक मिली कंपनियों को राहत- कोरोनवायरस और लॉकडाउन की वजह से 60 दिनों तक आर्थिक गतिविधियां ठप रहीं जिसके वजह से कई कंपनियों ने डिफॉल्ट कर दिया है.


ऑर्डिनेंस के मुताबिक, 25 मार्च 2020 के बाद से अगले 6 महीने या 1 साल तक किसी भी कंपनी के खिलाफ CIRP का आवेदन नहीं किया जा सकता यानी उन्हें IBC में लेकर नहीं जाया जा सकता.

केंद्रीय कैबिनेट ने 3 जून को उस प्रस्ताव को पास कर दिया जिसमें IBC के तहत इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया पर फिलहाल रोक लगा दी गई है.


सरकार ने इस प्रक्रिया पर अभी इसलिए रोक लगाई है क्योंकि अभी डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों की संख्या बहुत ज्यादा है.ऑर्डिनेंस के मुताबिक, डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों पर सेक्शन 10 A 25 मार्च से अगले छह महीने या 1 साल तक लागू नहीं होगा.

क्या है आईबीसी-इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के अंतर्गत कर्ज न चुकाने वाले बकाएदारों से निर्धारित समय के अंदर कर्ज वापसी के प्रयास किए जाते हैं. इस कोशिश से बैंकों की आर्थिक स्थिति में कुछ हद तक सुधार जरूर हुआ है.




कुंभ मेले को लेकर सरकारी बजेत को लेकर कुच रिपोर्ट .

SAFTEAM 

15 APRIL 2021

Haridwar Kumbh 2021 : कोरोना का झटका, 4000 करोड़ का कुंभ 800 करोड़ में सिमटा

न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 14 Dec 2020 10:31 AM IST

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कुंभ मेला 2021: आपको कुंभ नहाने का मिल सके पुण्य, इसके लिए रेलवे ने की बड़ी तैयारी

Updated on: December 10, 2020, 07.00 AM IST,

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Kumbh Mela 2021 : केंद्र सरकार ने कुंभ मेला के लिए 375 करोड़ रुपए दिए

मुख्य संवाददाता , देहरादून।Last Modified: Thu, May 07 2020. 08:15 AM IST

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Haridwar Kumbh 2021: कुंभ को लेकर केंद्र सरकार ने जारी की गाइडलाइन, श्रद्धालुओं को रखना होगा इस बात का ध्यान.


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Tuesday, 13 April 2021

कोरोना क्या वाकीमे बिमारी हे? षड्यंत्र हे? साजिश हे, कोरोना से गरीबों की क्यु मौत होती हे?

अब दिमाग लगाकर सोचिए :: 

 🛑अगर कोरोना संक्रमित बीमारी है, तो परिंदे और जानवर को अभी तक कैसे नहीं हुआ❓

🛑 यह कैसी बीमारी है जिसमें सरकारी लोग और हीरो ठीक हो जाते हैं और आम जनता मर जाती है❓

🛑 कोई भी घर में या रोड पर तड़प कर नहीं मरता हॉस्पिटल में ही क्यों मौत आती है❓

🛑 यह कैसीबीमारी है, कोई आज पॉजिटिव है तो कल बिना इलाज कराए नेगेटिव हो जाता है❓

🛑 कोरोना संक्रमित बीमारी है:- जो जलसे में / रैली में/ और लाखों के प्रोटेस्ट में नहीं जाता, लेकिन गरीब नॉर्मल खांसी चेक कराने जाए तो 5 दिन बाद लाश बनकर आता है❓

🛑 गजब का कोरोनावायरस है, जिसकी कोई दवा नहीं बनी, फिर भी लोग 99% ठीक हो रहे हैं❓

🛑 यह कौन सी जादुई बीमारी है, जिसके आने से सब बीमारी खत्म हो गई और अब जो भी मर रहा है कोरोना से ही मर रहा है❓

 जरा सोचिये

साबुन और सैनिटाइजर से कोरोना मर जाता है तो इस को मारने की दवाई क्यों नहीं बनाई❓

🛑 यह कैसा कोरोना है? हॉस्पिटल में गरीब आदमी के जिस्म का महंगा पार्ट निकालकर लाश को ताबूत में छुपा कर खोल कर नहीं देखने का हुक्म देकर बॉडी दी जाती है❓

है कोई जवाब ::????

अगर है जरूर देना, अगर नहीं है तो सोचना कि कोरोना की आड़ में क्या चल रहा है

🛑कुछ हास्पिटल से न्यूज आ रहीं हैं कि सुबह मरीज़ को भर्ती किया जाता है और शाम को न्यूज मिलती है कि मरीज़ की करोना से मौत हो गई! (क्या सुबह से शाम तक करोना की रिपोर्ट भी आ गयी और शाम को करोना से डेथ भी हो गयी, और लाश का अंतिम संस्कार भी हो गया)

🛑इनके हिसाब से तो करोना की कोई स्टेज ही नहीं होती, जो पहले पाजिटिव से नेगटीव हुए, वो कैसे ठीक हुए, 15-20 दिन मे तो कनीका कपूर भी ठीक होकर घर चली गयी, आखिर ऐसा कौन सा इलाज था जो कनीका की 5 रिपोर्ट पोजिटिव आई और 6 रिपोर्ट मे नेगटीव आई..... और गरीबो की सुबह रिपोर्ट पोजिटिव आती है और शाम को उसकी डेथ हो जाती है

क्या गरीब और माध्यम बर्ग की सिर्फ एक ही रिपोर्ट आती है positive या negative या डेथ❓❓

🛑हैरानी की बात है की कोई खांसी, जुकाम, बुखार और कोई लक्षण नहीं फिर भी रिपोर्ट पॉजिटिव, कहीं कोई किडनी स्कैम तो नहीं हो रहा है..❓
किडनी ही क्यों आंख, लीवर, ब्लड, प्लाजमा और भी बहुत पार्ट हैं, क्या कोई बहुत बड़ा झोल हो रहा है❓
अंतराष्ट्रीय बाजार में व्यक्ति के पार्टस की कीमत करोड़ो रूपये हैं, क्या कोरोना की आड़ में कोई षड्यंत्र चल रहा है❓

क्योंकि मृत देह को घरवालों को देते नहीं और ना ही कोरोना के नाम से घर वाले बॉडी लेते हैं और बंद लिफाफे में क्या हुआ है बॉडी के साथ किसे पता❓

सबको मिलकर ऐसा कदम उठाना होगा जिससे कम से कम S.C. की निगरानी में जांच हो, ताकी हकीकत सामने आए...

साभार अज्ञात   

अपने हक अपने अधिकार को मत खोइए जागिये 


इस मैसेज को अपने तक मत रखिए आगे भी फॉरवर्ड करते रहिए  🙏🏽

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