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Tuesday, 14 May 2024

इस्लाम कुरान और फिरका परसत पैगाम .

*#वाह_रे_नासमझ_मुसलमान!*
क्या ईमान पाया है, चन्द ज़ाहिल आलिमों के चक्कर में अल्लाह का कलाम (क़ुरान ए पाक) को जाने अनजाने में मानने से इन्कार करना शुरू कर दिए...।

*जी हाँ, जहाँ तक दुनिया जानती है कुछ ज़ाहिल टाईप आलिम बड़े शान से उस हदीस के मफ़हूम जिससे रिवायत है "मुसलमानों के 73 फ़िरके होंगे" को फेमस कर अपने फ़िरके की दुकान चमका रहे हैं...।*

लेकिन क्या उन ज़ाहिलो नें कभी क़ुरान की दलील इन आयतों पर दी है?
"सब मिल कर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और फिर्क़ों में मत बटो...।"
*(सुर: आले इमरान-103)*

"तुम उन लोगो की तरह न हो जाना जो फिरकों में बंट गए और खुली-खुली वाज़ेह हिदायात पाने के बाद इख़्तेलाफ़ में पड़ गए, इन्ही लोगों के लिए बड़ा अज़ाब है...।"
*(सुर:आले इमरान -105)*

"जिन लोगों ने अपने दीन को टुकड़े टुकड़े कर लिया और गिरोह-गिरोह बन गए, आपका (यानि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का) इनसे कोई ताल्लुक नहीं, इनका मामला अल्लाह के हवाले है, वही इन्हें बताएगा की इन्होंने क्या कुछ किया है...।"
*(सुर: अनआम-159)*

"फिर इन्होंने खुद ही अपने दीन के टुकड़े-टुकड़े कर लिए, हर गिरोह जो कुछ इसके पास है इसी में मगन है...।"
*(सुर: मोमिनून -53)*

""तुम्हारे दरमियान जिस मामले में भी इख़्तेलाफ़ हो उसका फैसला करना अल्लाह का काम है..."
*(सुर: शूरा -10)*

"और जब कोई एहतराम के साथ तुम्हें सलाम करे तो उसे बेहतर तरीके के साथ जवाब दो या कम अज़ कम उसी तरह (जितना उसने तुम्हें सलाम किया) अल्लाह हर चीज़ का हिसाब लेने वाला है...।
*(सुर: निसा -86)*

"अल्लाह ने पहले भी तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा यही नाम है) ताकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम पर गवाह हों...।"
*(सुर: हज -78)*

"बेशक सारे मुसलमान भाई भाई हैं, अपने भाइयों में सुलह व मिलाप करा दिया करो और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम पर रहम किया जाये...।"
*(सुर: हुजरात -10)*

और जिस हदीस के मफ़हूम को इतनी मेहनत से नफ़रत फ़ैलाने में इस्तमाल करते हैं क्या कभी उस मफ़हूम को पूरा पढ़ के सुनाया इन ढोंगी मौलवीयों ने?
जो पुरी तरह है "मेरी उम्मत के 73 फ़िरके होंगे, पर तुम उन फ़िरकों में मत बंट जाना" और सिर्फ़ पहली लाईन को पकड़ के फ़िरकों में बांटने की ठेकेदारी कर रहे चन्द उलेमाओं ने यह भी नहीं बताया की क़ुरान की एक भी बात को न मानना कुफ्र है...।

तो ज़रा सोचिये और बताईये फ़िरकों के नाम पर लड़ने वाले लोग ऊपर दी गई आयतों को कितना मानते हैं ????
मैं इतना बड़ा आलिम तो नहीं हूँ लेकिन अल्हमदुलिल्लाह मैं क़ुरान की इन आयतों के हवाले से कहता हूँ मैं मुसलमान हूँ और मेरा कोई फ़िरका नहीं है...।
अब आप सोंचे आपको फ़िरकों में बंट के क़ुरान की नाफ़रमानी करनी है 

*#बायकाट_करना_है_जो_फ़िरकों_में_बांटने _की राजनीति_करते_हैं...।*

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