Followers

Tuesday, 18 February 2025

1983 मुस्लिम नेल्ली नरसंहार एक दुखद अध्याय असम के इतिहास ।



नमंगली 1983 में नेल्ली (Assam) में हुआ नरसंहार एक अत्यंत दुखद और महत्वपूर्ण घटना थी। इस नरसंहार में हजारों मुसलमानों की हत्या हुई, और यह घटना असम की राजनीति और सामाजिक तनाव के कारण सामने आई थी।

1983 के नेल्ली नरसंहार का मुख्य कारण उस समय के असम आंदोलन से जुड़ी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ थीं। इस आंदोलन का उद्देश्य असम में विदेशी घुसपैठ को रोकना था, जिसमें विशेष रूप से बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को निशाना बनाया गया था। इस दौरान एक अफवाह फैल गई कि लाखों अवैध प्रवासी मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं, जिससे एक भय और घृणा का माहौल पैदा हुआ।

घटना का विवरण:

तारीख: 18-19 फरवरी 1983

स्थल: नेल्ली, असम

मृतकों की संख्या: अनुमानित 2,000 से अधिक मुसलमान मारे गए थे, हालांकि कुछ रिपोर्टों में यह संख्या 10,000 से अधिक बताई जाती है।

कारण: असम आंदोलन और विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ चल रही राजनीति। इस घटना को उस समय के कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने आयोजित किया, जो मानते थे कि मुस्लिम समुदाय असम में अवैध तरीके से बसने वाले बांग्लादेशी प्रवासी हैं।

घटनाक्रम: अफवाह फैलने के बाद, हिंसक भीड़ ने स्थानीय मुस्लिम आबादी को निशाना बनाना शुरू किया। अधिकांश हत्याएं अवैध प्रवासियों के खिलाफ थीं, जो मुस्लिम समुदाय से संबंधित थे।


इस नरसंहार की व्यापक आलोचना की गई थी और इसे असमिया समाज में मुस्लिमों के खिलाफ घृणा और भेदभाव की एक भयावह मिसाल माना गया। इसके परिणामस्वरूप, असम समझौता (1985) हुआ, जिसमें इस तरह के मुद्दों को सुलझाने के लिए सरकार और विभिन्न समुदायों के बीच समझौता हुआ।

नेल्ली नरसंहार को लेकर अभी भी असम और भारत के विभिन्न हिस्सों में विवाद है, खासकर जब यह मुद्दा मतदाता पंजीकरण और अवैध प्रवासियों के संदर्भ में सामने आता है।


Sunday, 16 February 2025

भारतीय मुस्लिम समाज की 6 पार्टियां ।


भारत में सक्रिय 6 प्रमुख मुस्लिम राजनीतिक पार्टियाँ:

1. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) – असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में।


2. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) – केरल में प्रभावी, 1948 में स्थापित।


3. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) – असम में बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में।


4. पीस पार्टी ऑफ इंडिया (PPI) – उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित राजनीति पर केंद्रित।


5. सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) – पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ी मानी जाती है।


6. मजलिस-ए-मुशावरत और अन्य क्षेत्रीय मुस्लिम संगठन – तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में सक्रिय।



ये पार्टियाँ अलग-अलग राज्यों और मुद्दों पर केंद्रित हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक समस्याएँ शामिल हैं।


Friday, 14 February 2025

हजरत मोहानी और संविधान।

मौलाना हसरत मोहानी: स्वतंत्रता संग्राम के सिद्धांतवादी योद्धा और भारतीय संविधान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे महानायक हुए, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी देश की आज़ादी और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित कर दी। इन्हीं में से एक थे मौलाना हसरत मोहानी—एक स्वतंत्रता सेनानी, शायर, पत्रकार, और समाजवादी विचारक। उन्होंने जहां "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा दिया, वहीं भारतीय संविधान को लेकर भी अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं किया।


---

मौलाना हसरत मोहानी: एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व

जन्म: 1 जनवरी 1875, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

मृत्यु: 13 मई 1951


मौलाना हसरत मोहानी का असली नाम सैयद फज़ल उल हसन था। वे एक विद्वान, कट्टर स्वतंत्रता सेनानी और एक प्रखर लेखक थे। उनके लेखन और भाषणों ने ब्रिटिश सरकार को इतना परेशान किया कि उन्हें कई बार जेल भेजा गया। 1921 में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार "पूर्ण स्वराज" की मांग की थी, जो बाद में कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य बना।

वे भारतीय उपमहाद्वीप में उर्दू साहित्य और क्रांतिकारी राजनीति के संगम का एक महत्वपूर्ण चेहरा थे। उनकी ग़ज़ल "चुपके चुपके रात दिन" आज भी लोकप्रिय है।


---

संविधान सभा और मौलाना हसरत मोहानी की भूमिका

भारत की स्वतंत्रता के बाद जब संविधान सभा का गठन हुआ, तो मौलाना हसरत मोहानी इसके सदस्य बने। लेकिन जब संविधान का अंतिम मसौदा तैयार हुआ, तो उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। इसके पीछे कई कारण थे:

1. संविधान का स्वरूप: वे एक ऐसे संविधान के पक्षधर थे, जो अधिक न्यायसंगत, गरीबों के अनुकूल और पूर्ण स्वराज की अवधारणा को समाहित करता। उनका मानना था कि भारतीय संविधान ब्रिटिश शासन के ढांचे को पूरी तरह नहीं तोड़ पाया।


2. धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता: वे चाहते थे कि सभी धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक कानूनों के पालन की अधिक स्वतंत्रता मिले। वे इस बात पर जोर देते थे कि संविधान को इस्लामी कानूनों के प्रति अधिक सहिष्णु होना चाहिए, लेकिन वे किसी विशेष प्रावधान के सीधे विरोध या समर्थन में सक्रिय नहीं थे।


3. पूंजीवाद के खिलाफ रुख: वे समाजवाद के समर्थक थे और मानते थे कि संविधान में श्रमिकों और किसानों के अधिकारों को और मजबूती से शामिल किया जाना चाहिए।


4. सरकारी भत्तों का विरोध: उन्होंने सरकारी वेतन और सुविधाओं को अस्वीकार कर दिया। वे संसद आने के लिए साझा तांगे का उपयोग करते थे और सरकारी आवास के बजाय मस्जिद में रहते थे।


5. ब्रिटिश प्रभाव का विरोध: मौलाना मोहानी इस बात से असंतुष्ट थे कि संविधान में अभी भी कई ब्रिटिश कानूनी प्रथाओं का प्रभाव था। वे भारत के लिए पूरी तरह स्वदेशी, स्वतंत्र और क्रांतिकारी संविधान चाहते थे।




---

संविधान पर हस्ताक्षर करने से इनकार: एक साहसिक कदम

जब भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया गया, तो जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि यह संविधान भारत के भविष्य को दिशा देगा। लेकिन मौलाना हसरत मोहानी ने अपने सिद्धांतों से समझौता करने से इंकार कर दिया और अंतिम मसौदे पर हस्ताक्षर नहीं किए।

उनका यह फैसला कोई व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं था, बल्कि उनकी विचारधारा और संघर्ष का हिस्सा था। उनका मानना था कि यह संविधान भारत को उस दिशा में नहीं ले जा पाएगा, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी।


---

निष्कर्ष: मौलाना हसरत मोहानी की विरासत

मौलाना हसरत मोहानी एक ऐसे योद्धा थे, जो कभी सत्ता और लाभ के लिए नहीं झुके। उन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष किया, संविधान सभा में अपनी असहमति दर्ज कराई और जीवनभर समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाते रहे।

वे "इंकलाब जिंदाबाद" के वास्तविक जनक थे, जो बाद में भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों के संघर्ष का प्रतीक बन गया।

वे साहित्य, राजनीति और समाज सुधार तीनों मोर्चों पर संघर्ष करने वाले विरले व्यक्तित्वों में से थे।

उनकी ग़ज़लें आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं, और उनकी विचारधारा से प्रेरणा लेने वालों की कमी नहीं है।


आज भी उनका योगदान हमें याद दिलाता है कि सच्चा क्रांतिकारी वही होता है, जो अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं करता।

"इंकलाब जिंदाबाद!" का नारा देने वाले इस महान स्वतंत्रता सेनानी को भारत हमेशा याद रखेगा।


---

अब मैं इस विषय से संबंधित एक नई इमेज तैयार करता हूँ।



___________________________________________
मौलाना हसरत मोहानी ने संविधान के अंतिम मसौदे पर हस्ताक्षर नहीं किए और इसके प्रावधानों से असहमति जताई। संविधान स्वीकृत होने के बाद उन्होंने इसे "अधूरी आज़ादी" बताया और कहा कि यह वास्तविक स्वतंत्रता का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि ब्रिटिश शासन के ढांचे का एक नया संस्करण है।

संविधान स्वीकृत होने के बाद मौलाना हसरत मोहानी की प्रतिक्रिया

संविधान को 26 नवंबर 1949 को स्वीकृत किया गया, लेकिन मौलाना हसरत मोहानी ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई और कहा:

1. यह संविधान जनता के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा नहीं करता।

वे मानते थे कि यह संविधान पूंजीवादी और अभिजात्य वर्ग के हितों की रक्षा करता है, जबकि किसानों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।



2. ब्रिटिश प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह संविधान ब्रिटिश शासन के कई कानूनों और ढांचों को बनाए रखता है, जिससे सही मायनों में भारत की संप्रभुता और स्वराज स्थापित नहीं हो पाता।



3. धार्मिक स्वतंत्रता और इस्लामी कानूनों के प्रति असंतोष।

वे मानते थे कि मुस्लिम समुदाय को अपने धार्मिक कानूनों के पालन की अधिक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए थी, लेकिन संविधान में इसे लेकर संतुलन नहीं बनाया गया।




संविधान पर उनका ऐतिहासिक बयान:

संविधान स्वीकृत होने के बाद, मौलाना हसरत मोहानी ने कहा था:

> "यह संविधान हमारी असली आज़ादी को प्रतिबिंबित नहीं करता। यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का एक नया रूप है, जिसमें शोषित वर्गों की आवाज़ को दबाया गया है।"



> "जब तक इस संविधान में आम जनता—विशेष रूप से किसान और मजदूरों—के लिए सही मायनों में स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह हमारे सपनों का संविधान नहीं हो सकता।"



उनका अंतिम पक्ष और विरोध का स्वरूप

मौलाना हसरत मोहानी संविधान के कुछ बुनियादी प्रावधानों से नाखुश थे, लेकिन उन्होंने संसदीय प्रणाली को पूरी तरह खारिज नहीं किया। वे स्वतंत्र भारत में भी एक सच्चे समाजवादी और क्रांतिकारी बने रहे, और संविधान के तहत जारी प्रशासन की लगातार आलोचना करते रहे।

उनका यह साहसिक रुख भारतीय इतिहास में अद्वितीय है, क्योंकि उन्होंने सत्ता या राजनीतिक पदों की परवाह किए बिना सिर्फ अपने सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लिया।



Thursday, 13 February 2025

कोरोना वायरस एक षडयंत्र और एक सीजनल फ्लू ?


2019 का कोरोना वायरस और 2025 का सीजनल फ्लू: एक विश्लेषण ।

एक षड्यंत्र या संयोग?

2019 में कोरोना वायरस (COVID-19) के प्रकोप ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। महामारी के नाम पर लॉकडाउन, मास्क, वैक्सीन, और सामाजिक प्रतिबंधों ने न केवल आम जनता के जीवन को प्रभावित किया, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक ढांचे को भी हिला दिया। कई लोगों का मानना है कि यह एक प्राकृतिक वायरस नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसका उद्देश्य दुनिया को नियंत्रित करना और वैश्विक शक्तियों को मजबूत करना था।

अब, 2025 में, जब दुनिया धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है— सीजनल फ्लू। सर्दी, खांसी, बुखार और सांस की तकलीफ के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन इसे सिर्फ एक "मौसमी बीमारी" बताकर नजरअंदाज किया जा रहा है। क्या यह सच में एक आम फ्लू है, या फिर यह 2019 की तरह ही एक और प्रयोगात्मक षड्यंत्र है?


⚫ 2019 में कोरोना वायरस: जनता पर नियंत्रण का हथियार?

अगर हम 2019-2021 के दौर को देखें, तो साफ नजर आता है कि COVID-19 के कारण:

1. दुनिया भर में सरकारों ने अपने नागरिकों पर नियंत्रण स्थापित किया।


2. बड़े कॉरपोरेट और फार्मा कंपनियों ने भारी मुनाफा कमाया।


3. डिजिटल ट्रैकिंग और डेटा निगरानी के नए तरीके लागू हुए।


4. मध्यम और छोटे व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ, जिससे सिर्फ बड़ी कंपनियों को फायदा मिला।



⬛ ऐसे में कई लोग मानते हैं कि यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि एक "जैविक युद्ध" था जिसे वैश्विक सत्ता संतुलन बदलने के लिए इस्तेमाल किया गया।


2025 में सीजनल फ्लू: एक नई लहर या नई साजिश?

आज हम देख रहे हैं कि दुनियाभर में लोगों को सर्दी-खांसी, बुखार और अन्य फ्लू जैसी बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। लेकिन इस बार इसे "सीजनल फ्लू" का नाम दिया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि 2019 में जब कोरोना वायरस फैलना शुरू हुआ था, तब भी लक्षण लगभग ऐसे ही थे।

तो सवाल उठता है:

▪️क्या 2025 का सीजनल फ्लू एक नया जैविक प्रयोग है?

▪️क्या इसे एक नए महामारी चक्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है?

▪️क्या यह भी किसी बड़े राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की भूमिका बना रहा है?


कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, कई देशों में सरकारें और स्वास्थ्य एजेंसियां एक नए "फ्लू वैरिएंट" की चेतावनी दे रही हैं। क्या यह लोगों को फिर से डराने और स्वास्थ्य संबंधी नए प्रतिबंध लगाने की रणनीति हो सकती है?


निष्कर्ष: सतर्क रहने की जरूरत ।

2019-2021 के दौर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े स्तर पर आम जनता को भ्रमित करना, डराना और नियंत्रित करना आसान है। अब 2025 में अगर एक नई बीमारी को "सीजनल फ्लू" के नाम पर सामान्य बनाया जा रहा है, तो यह सोचने का विषय है। हमें सतर्क रहना होगा, जानकारी इकट्ठी करनी होगी, और यह समझना होगा कि क्या यह सच में एक प्राकृतिक घटना है या फिर एक और साजिश।

सवाल यह है: क्या हम फिर से वही गलती दोहराएंगे, या इस बार जागरूक होकर सही निर्णय लेंगे?

Wednesday, 12 February 2025

जमीयते उलमाए हिंद सियासत से अलग होना एक विशेषण।



भारतीय संविधान, जमीयत उलेमा-ए-हिंद का फैसला और डॉ. अंबेडकर की चेतावनी: एक ऐतिहासिक समीक्षा

भूमिका

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ी शासन से आज़ादी का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक नई सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना का भी आंदोलन था। 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को स्वीकृत किया गया, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह संविधान भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद बना, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ—क्या नई व्यवस्था में सभी समुदायों ने अपनी भूमिका को ठीक से समझा?

इस संदर्भ में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) द्वारा 27 दिसंबर 1949 को राजनीति से अलग होने का फैसला ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। यह निर्णय ठीक उस समय लिया गया जब भारत एक नई संवैधानिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था। इस लेख में हम इस निर्णय के दूरगामी प्रभावों और डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा के संदर्भ में इसकी समीक्षा करेंगे।


---

जमीयत उलेमा-ए-हिंद का राजनीति से अलग होने का फैसला

जमीयत उलेमा-ए-हिंद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख संगठन था, जिसने महात्मा गांधी और कांग्रेस के साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद, भारतीय मुसलमानों के सामने नए सामाजिक और राजनीतिक सवाल खड़े हुए।

27 दिसंबर 1949 को रामपुर (उत्तर प्रदेश) में जमीयत के वार्षिक अधिवेशन में मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने घोषणा की कि जमीयत अब सक्रिय राजनीति से अलग होगी और केवल धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक कार्यों पर ध्यान देगी।

यह निर्णय एक ऐसे समय में लिया गया जब भारतीय संविधान स्वीकृत हो चुका था, और देश एक नई लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह फैसला सही था? क्या भारतीय मुस्लिम नेतृत्व को उस समय राजनीति में सक्रिय रहना चाहिए था?


---

डॉ. अंबेडकर की चेतावनी और संवैधानिक संघर्ष

जब संविधान तैयार हो रहा था, तब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संविधान की सफलता केवल कागजी नहीं होगी, बल्कि इसे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर लागू करने की जरूरत होगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर लोग केवल संविधान को अंतिम समाधान मानकर बैठ जाएंगे, तो सामाजिक अन्याय और असमानता बनी रहेगी।

डॉ. अंबेडकर ने कहा था:
"हमने संविधान तो बना लिया है, लेकिन यह सिर्फ एक कागज़ी दस्तावेज़ नहीं होना चाहिए। अगर समाज इसे आत्मसात नहीं करता, तो इसका कोई महत्व नहीं रहेगा।"

उन्होंने आगे कहा कि संविधान को लागू करने के लिए सतत संघर्ष की आवश्यकता होगी। लेकिन इसके विपरीत, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने राजनीति से दूरी बनाने का फैसला कर लिया।

अगर हम अंबेडकर की दृष्टि से देखें, तो जमीयत का यह निर्णय एक अहमकाना (बेवकूफी भरा) कदम था, क्योंकि यह भारतीय मुस्लिम समुदाय को संवैधानिक संघर्ष में एक अहम शक्ति बनने से रोकने वाला था।


---

क्या यह फैसला ऐतिहासिक भूल थी?

1. राजनीति से दूरी और मुस्लिम नेतृत्व का पतन

1949 में राजनीति से अलग होने के कारण भारतीय मुसलमानों के पास एक मजबूत नेतृत्व नहीं रहा, जो उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कर सकता।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद अगर राजनीति में बनी रहती, तो वह मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक बेहतरी के लिए एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकती थी।



2. संवैधानिक अवसरों का लाभ न उठाना

भारतीय संविधान ने अल्पसंख्यकों को कई अधिकार दिए, लेकिन उन्हें प्रभावी बनाने के लिए राजनीतिक भागीदारी जरूरी थी।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने राजनीति से हटकर अपने समुदाय को संघर्ष से वंचित कर दिया।



3. डॉ. अंबेडकर का दृष्टिकोण सही साबित हुआ

अंबेडकर का मानना था कि केवल संविधान लिख देने से समानता नहीं आएगी; इसके लिए समाज को लगातार जागरूक और सक्रिय रहना होगा।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद का निर्णय इसके विपरीत था, जिसने राजनीतिक संघर्ष को छोड़कर खुद को सीमित कर लिया।





---

निष्कर्ष: इतिहास से सीखने की जरूरत

आज जब हम भारतीय लोकतंत्र और संविधान की 75 से अधिक वर्षों की यात्रा को देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीति से दूरी बनाना कभी भी किसी समुदाय के हित में नहीं होता। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जिस समय राजनीति से अलग होने का फैसला किया, वह समय वास्तव में संविधान को समझने, अपने अधिकारों को पहचानने और एक मजबूत नेतृत्व विकसित करने का था।

डॉ. अंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। भारतीय संविधान का केवल होना ही काफी नहीं, बल्कि इसे बचाने, लागू करने और सुधारने के लिए सतत संघर्ष की जरूरत है।

आज मुस्लिम समुदाय और अन्य वंचित वर्गों के लिए सबसे बड़ी सीख यही हो सकती है कि अगर वे अपने संवैधानिक अधिकारों को बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से सक्रिय रहना होगा।

संविधान एक हथियार है, लेकिन इसे चलाने के लिए मजबूत नेतृत्व और जागरूक समाज की जरूरत होती है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद का 1949 का फैसला हमें यही सिखाता है कि राजनीतिक भागीदारी से अलग होकर कोई भी समुदाय अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता।


---

क्या अब बदलाव संभव है?

आज के दौर में यह जरूरी हो गया है कि मुस्लिम समाज और अन्य हाशिए पर मौजूद समुदाय संविधान को केवल एक दस्तावेज़ न मानें, बल्कि उसे एक संघर्ष का माध्यम समझें। उन्हें राजनीति में सक्रिय भागीदारी करनी होगी, नेतृत्व विकसित करना होगा और संविधान की सुरक्षा के लिए डॉ. अंबेडकर के विचारों से सीख लेकर आगे बढ़ना होगा।

संविधान केवल तब तक मजबूत है, जब तक उसे लागू करने वाले लोग मजबूत हैं।


Tuesday, 11 February 2025

उत्तराखंड सरकार का UCC कानून पर हाईकोर्ट को लेकर अपडेट ।



वकील ने उत्तराखंड नागरिक संहिता को हाईकोर्ट में चुनौती दी; कहा प्रावधान मुस्लिम, LGBTQ समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं।


होम-आइकनशीर्ष समाचारनए अपडेटकॉलमसाक्षात्कारविदेशी/अंतर्राष्ट्रीयसूचना का अधिकारकानून को जानेंकानून स्कूलकानूनी फ़र्मनौकरी अपडेटपुस्तक समीक्षाइवेंट कॉर्नरवीडियोप्रायोजितहमसे संपर्क करेंहमारे साथ विज्ञापन करेंराउंड अपआईबीसी समाचारपर्यावरण कानूनकार्टूनकरमध्यस्थता करनाउपभोक्ता मामले
होम > शीर्ष समाचार > वकील चुनौतियां...
वकील ने उत्तराखंड नागरिक संहिता को हाईकोर्ट में चुनौती दी; कहा प्रावधान मुस्लिम, LGBTQ समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं
द्वारा - लाइवलॉ न्यूज नेटवर्कअपडेट: 2025-02-11 08:42 GMT
राष्ट्रपति ने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता को मंजूरी दी
फेसबुक आइकनट्विटर आइकनलिंक्डइन आइकनtubmlr आइकनपिनटेरेस्ट आइकन
व्हाट्सएप आइकन
लेख सुनने के लिए प्ले बटन पर क्लिक करें
उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर हाल ही में लागू किए गए 'समान नागरिक संहिता उत्तराखंड 2024' को चुनौती दी गई है, विशेष रूप से विवाह और तलाक और लिव-इन रिलेशनशिप को कवर करने वाले प्रावधानों को चुनौती देते हुए दावा किया गया है कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। 

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड विधानसभा द्वारा उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक, 2024 पारित किए जाने के लगभग एक वर्ष बाद, 27 जनवरी को उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता लागू की। यह यूसीसी लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।

एक अधिवक्ता द्वारा दायर याचिका में संहिता के कुछ हिस्सों को चुनौती दी गई है, विशेष रूप से संहिता के भाग-1 अर्थात विवाह और तलाक तथा भाग-3 अर्थात लिव-इन रिलेशनशिप के तहत प्रदान की गई धाराओं के साथ-साथ समान नागरिक संहिता नियम उत्तराखंड, 2025 को भी चुनौती दी गई है।

याचिका में कहा गया है कि यूसीसी उत्तराखंड, 2024 ने महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत नागरिक मामलों से संबंधित विभिन्न चिंताओं पर अंकुश लगाया है, हालांकि ऐसे कई प्रावधान और नियम हैं जो राज्य में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं और उनकी निजता के अधिकार, जीवन के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और बड़े अर्थों में "विवाह और अपने साथी को चुनने" पर निर्णय लेने में व्यक्तियों की स्वायत्तता के अधिकार को छीन लेते हैं।

इसमें कहा गया है कि ये प्रावधान मुस्लिम समुदाय के प्रति भेदभावपूर्ण हैं, क्योंकि ये विवाह और तलाक के संबंध में उनकी कुछ पारंपरिक प्रथाओं की अनदेखी करते हैं तथा उन पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को थोपते हैं।

उदाहरण के लिए, यह दावा किया जाता है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 3(1)(जी) जो विवाह के लिए निषिद्ध संबंधों को परिभाषित करती है, उसे मुस्लिम और पारसी समुदायों पर लागू कर दिया गया है, जबकि इस तथ्य की अनदेखी की गई है कि एक पुरुष और उसके पिता की बहन की बेटी, एक पुरुष और उसके पिता के भाई की बेटी, एक पुरुष और उसके मामा की बेटी तथा एक पुरुष और उसकी मामा की बेटी के बीच विवाह पवित्र कुरान और पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के तहत निषिद्ध नहीं है।

याचिका में दावा किया गया है कि यह इन समुदायों के "प्रचलित रीति-रिवाजों, अधिकारों और प्रथाओं" की घोर अवहेलना है, जिन्हें भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित किया गया है।

यह ध्यान देने योग्य है कि यूसीसी में प्रावधान है कि विवाह के पक्षकार निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में नहीं आएंगे, यदि उन्हें नियंत्रित करने वाली प्रथा दोनों के बीच विवाह की अनुमति देती है। हालांकि याचिका में कहा गया है कि धारा 4(iv) में प्रावधान है कि यदि कोई प्रथा निषिद्ध संबंधों के बीच विवाह की अनुमति देती है तो इसे पंजीकृत किया जा सकता है, लेकिन दूसरी ओर प्रावधान में एक और योग्यता प्रदान की गई है जिसमें कहा गया है कि इसे केवल तभी अनुमति दी जा सकती है जब यह "सार्वजनिक नीति और नैतिकता के विरुद्ध न हो"। याचिका में कहा गया है कि प्रावधान ऐसे विवाहों के पंजीकरण पर अनुचित प्रतिबंध लगाता है। 

याचिका में कहा गया है कि नियम 9 (3) (ई) ii) में प्रयुक्त भाषा यह प्रावधान करती है कि केवल वे बहुविवाही विवाह, जिन्हें किसी कानून द्वारा अनुमति दी गई है, संहिता के तहत अपने आगे के विवाह को पंजीकृत कर सकते हैं, जबकि यह एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, ऐसा कोई कानून नहीं है जो बहुविवाह की अनुमति देता हो; यह केवल मुसलमानों के रीति-रिवाज और प्रथाएं हैं जो बहुविवाह और कुछ रिश्तों (निषिद्ध डिग्री) के बीच विवाह की अनुमति देती हैं।

याचिका में कहा गया है, " इस प्रकार स्पष्ट रूप से, ये प्रावधान मनमानेपन और अविवेक के दोष से ग्रस्त हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करते हैं और तथ्य यह है कि ये प्रावधान किसी व्यक्ति के पिछले लिव-इन संबंधों के संबंध में भी घोषणा की मांग करते हैं, जो समाप्त हो चुके हैं, जो निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन है, जो भारत के संविधान के तहत जीवन के अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है। " 

लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में याचिका में कहा गया है कि धारा 4 (बी) में कहा गया है कि केवल एक पुरुष और महिला जो "विवाह की प्रकृति" के रिश्ते के माध्यम से एक साझा घर में रहते हैं, बशर्ते कि उनका रिश्ता निषिद्ध संबंधों की श्रेणी में न आता हो, उन्हें लिव-इन रिलेशनशिप में कहा जाता है।

याचिका में दावा किया गया है कि अगर इस प्रावधान को शाब्दिक अर्थ में समझा जाए तो यह केवल "जैविक पुरुष या महिला" से संबंधित होगा, जिससे LGBTQ समुदाय से संबंधित व्यक्तियों को उनके लिव-इन संबंधों के पंजीकरण के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा। यह LGBTQ समुदाय के साथ अनुचित व्यवहार होगा।

याचिका में आगे कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप की परिभाषा यह बताती है कि कौन इस तरह के रिश्ते में रह सकता है, लेकिन यह सहवास की न्यूनतम अवधि प्रदान करने में विफल रहता है, जो किसी रिश्ते को लिव-इन रिलेशनशिप मानने के लिए एक आवश्यक शर्त है। इसमें यह भी कहा गया है कि धारा के "केवल गैर-अनुपालन" के लिए निर्धारित दंड भी मनमाना और असंगत है। 

इसमें कहा गया है कि ऐसे मामलों में जहां लिव-इन रिलेशनशिप पंजीकृत नहीं हो सकती, उनमें वह भी शामिल है जहां एक व्यक्ति नाबालिग है और यह मनमाना है क्योंकि 21 वर्ष का पुरुष और 18 वर्ष की महिला एक-दूसरे से विवाह कर सकते हैं, लेकिन 21 वर्ष से कम आयु की महिला लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकती, क्योंकि संहिता इसकी अनुमति नहीं देती। 

इसमें एक ऐसे परिदृश्य की ओर भी संकेत किया गया है, जिसमें दो व्यक्ति स्वयं को "रूममेट" बताते हैं तथा एक ही घर में रहते हैं, लेकिन एक साथ "सहवास" नहीं करते हैं, एक व्यक्ति की शिकायत पर रजिस्ट्रार द्वारा उन्हें उनके लिव-इन संबंध को पंजीकृत करने के लिए नोटिस दिया जाता है, तथा उन्हें लिव-इन संबंध न होने तथा केवल "रूममेट" होने के बारे में आवश्यक जानकारी प्रदान करने के लिए कहा जाता है।

याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या रजिस्ट्रार साक्ष्य की पुष्टि किए बिना सारांश जांच के माध्यम से कोई निर्णय ले सकता है। इसमें दावा किया गया है कि रजिस्ट्रार को संहिता के तहत यह पता लगाने के लिए अत्यधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं कि व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में हैं या नहीं, जो स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है। 

यह 'निवासी' शब्द के दायरे को भी चुनौती देता है, जिस पर संहिता लागू होती है, जहां तक इसमें उत्तराखंड में एक निश्चित समयावधि के लिए निवास करने वाले अन्य राज्यों के स्थायी निवासी भी शामिल हैं।

Thursday, 24 October 2024

વોટસએપ મેસેજ . સહમતી પત્ર. 24/10/24


*વિષય:* મકાન ભાડા કરારો અને સમાજની સુરક્ષા .


તારીખ : 24 ઓકટોબર 
 ✒️ *Huzaifa Dedicated* 

હમણાં આપણે જોઈ રહ્યા છીએ કે *સરકાર દ્વારા લાગુ કરેલા કાનૂનોએ ભાડે મકાન આપતા માલિકો વચ્ચે ચિંતાનો માહોલ ઉભો કર્યો છે.* આ સખત કાનૂન મકાન માલિકોને ભાડે મકાન આપવાના નિર્ણયમાં સમાજની સુરક્ષા બાબત અને સમયની જરૂરત જોતાં, *દરેક સોસાયટીના રહીશો* અને સોસાયટી કમિટી વિશેષ માંગ કરવા તરફ વિચાર કરવાની જરૂર છે. *અન્યથા આવનાર સમય આપણાં સૌ માટે સંકટનું કારણ બની શકે છે.*

જ્યાં સુધી સરકારના કાયદાનું પાલન કરવાનો પ્રશ્ન છે, *ત્યારે આપણા દરેક સોસાયટીના રહીશો અને જવાબદાર લોકોને પણ આ અંગે જવાબદારી પૂર્વક ચિંતિત રહેવું જોઈએ.* જો મકાન માલિકો અને ભાડુાતાઓ પોતાની માહિતી પોલીસ પ્રશાસનને આપી રહ્યાં છે, *તો સોસાયટીના કમિટીઓના સભ્યોએ પણ પોતાની સોસાયટીમાં ભાડુઆત મકાન બાબત સજાગ થવું જરૂરી છે.*
*મુસ્લિમ વિસ્તારના લોકોમાં જાગૃતિ લાવવાની જરૂર છે.* આપણે આ બાબતે સોસાયટીને અસમાજિક કાર્યોથી બચાવવા અને દુષ્કર્મની ઘટનાઓથી બચવા માટે *સાથે મળીને પ્રયત્નો કરવા જોઈએ.* જો ભાડુાતાઓના મકાનમાં રહેતા ભાડુઆત તરફથી કોઈ દુર્ઘટના સર્જાય, *તો તેની જવાબદારી કોણ લે છે ❓* આ સંદર્ભમાં, દરેક સોસાયટીના રહીશો પાસે પોતાની સુરક્ષા માટે સરકારને *મંડળ રજૂ કરવાનો અધિકાર છે.*
તેથી, ભાડા કરાર દરમિયાન, મકાન માલિક અને *ભાડુઆત બંનેના ડોક્યુમેન્ટમાં સોસાયટી કમિટીની સહમતી પત્રની જરૂરિયાત છે.* આના દ્વારા, સોસાયટીની નીતિઓ અને નિયમોનું પાલન કરવું સરળ બની જશે, અને સોસાયટીના રહીશો માટે સુરક્ષા કરવામાં સોસાયટી કમિટી વચ્ચે વધુ સારી માહિતી વહન થાય તે શક્ય બનશે.
*આ વિષયમાં વધુ મજબૂતીથી અવાજ ઉઠાવવો જરૂરી છે.* જો સરકાર સોસાયટી કમિટીને ભાડુાતાઓના સહમતી પત્રને માન્યતા આપે, તો આથી યોગ્ય નિયંત્રણ અને સોસાયટીની વ્યવસ્થા જાળવવામાં મદદ મળશે.

આ સંદર્ભમાં એકઠા થઈને મજબૂત માંગો પ્રગટ કરીએ અને *એક સુરક્ષિત વાતાવરણની સુનિશ્ચિતતા કરીશું.*


  *મારી વાતથી સહમત હોવ તો આગળ શેર કરશો.*

कच्छ Demolition 2026 Riport।

कच्छ 2026 डिमोलिशन रिपोर्ट । सोशल मीडिया से तथ्य, घटनाक्रम और ज़मीनी चर्चाओं का संकलन .... साथियों,  इस रिपोर्ट को तैयार करने का...