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Monday, 13 August 2018

WhatsApp vairal Masej

*हाँ❗हमने ही किया❗*
*हमने ही बांग्लादेश को बनाया*

*१९४८ में अपना आधा कश्मीर गँवाने का बदला लिया किसने❓हमने*

*अंदमान से लेकर कोलकता, रामेश्वरम तक पूरे हिंद महासागर पर निरंकुश वर्चस्व साबित किया किसने❓हमने*

*समुद्री क्षेत्र पर एकाधिकार से आर्थिक, सामरिक, नौदल कि मजबूती हासिल हुई किसको❓हमको*

*बाबासाहेब आम्बेडकर को संविधान समिति में चुननेवाले बंगाल के जिलों को पूर्व पाकिस्तान में शामिल किया किसने❓हमने*

*बांग्लादेशीयों को धोबी का कुत्ता न घर का ना घाट का बनाया किसने❓हमने*

*पूर्व और पश्चिमी दिशा से घेराबंदी से भयमुक्त हुआ कौन❓हम*

        सबसे पहले बता दें कि 1962 में चीन से युद्ध में भारत को 1383 जवानों के साथ-साथ अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन भी खोनी पड़ी थी। राजनीतिक कमजोरी के चलते सेना को हार का सामना करना पड़ा था। तब IPS ऑफिसर रामनाथ काओ उस समय लिए गए कई गलत फैसलों की समीक्षा करते हुए इस नतीजे पर पहुंचे कि देश को अब ऐसे संगठन की जरूरत है जो देश के सामरिक हितों का ध्यान रखे।

         फिर उसके बाद 1965 में पाकिस्तान ने भारत को ऑपरेशन जिब्राल्टर के जरिए वॉर के लिए मजबूर कर दिया था।
तीन साल पहले ही भारत चीन से युद्ध हारने के बाद अब इस हालत में नहीं था कि फिर से एक युद्ध झेल सके। इसी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया। और उसमें काफी हद तक सफल भी हो गया। खुफिया तौर पर पूरी तरह फेल होने के चलते 62 और 65 में लगातार दो बड़े युद्ध झेलने के बाद रॉ यानि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग की स्थापना की गई। इस खुफिया विंग की कमान रामनाथ काओ को सौंपी गई।
ये काओ ही थे जिनकी अगुवाई में भारत ने बांग्लादेश के फ्रीडम फाइटर्स मुक्ति वाहिनी की पकिस्तान से लड़ने में सहायता की। फिर 1971 के युद्ध में भारत की रणनीति में रॉ ने बड़ी भूमिका अदा की। 71 में पाकिस्तान की हार के बाद काओ का कद दिल्ली में और बढ़ गया। काओ की दूरदर्शिता का ही नतीजा था कि 62 में हार के बाद भी चीन को सिक्किम हड़पने से बचा लिया और पाकिस्तान का आधा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान को अलग कर बांग्लादेश का निर्माण कर दिया। जितना इलाका पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा किया है उससे ज्यादा इलाका यानी पूर्व पाकिस्तान को आजाद करवाकर बदला ले लिया। समुद्री मार्ग, समुद्री क्षेत्र पर एकाधिकार प्रस्तापित किया। समुद्र में स्थित खनिज , क्रूड ऑयल, नैचरल गैस , थोरियम,..... वगैरह पर हक स्थापित हुआ।
         अपने बंगाली भाषा बोलनेवाले ब्राह्मणों द्वारा पश्चिमी पाकिस्तान सरकार के बारे में नफरत फैलाई। पूर्व पाकिस्तान के नागरिकों को सशस्त्र मुहिम के लिए उगसाया। रॉ एजेंटों ने उन्हें हथियार मुहैया कराए। भारत में लाखों मुक्तिसेना के सैनिकों को प्रशिक्षण दिया गया। यह बात गौर करने वाली है: जब कोई भी मुसलमान अपना राजनीतिक दल, पार्टी, एनजीओ, आंदोलन शुरू किया है तब उनके नाम उर्दू, अरेबिक रहे है। मुक्ति सेना के प्रमुख शेख मुजीब उर रहमान का *मुक्ति बाहिनी* यह नाम चुनना ही साबित करता है कि यह आंदोलन भारतीय सेना का कठपुतली था।
              (पूर्व पाकिस्तानीयों) बांग्लादेशीयों को हमने बुलाया, उन्हें मिलिटरी ट्रेनिंग दी, उन्हें हथियार दिए, भारतीय सेना ने युद्ध करके उन्हें नया कठपुतली देश बनाकर दिया। हमारे खुफिया एजेंसियों के लाखों एजेंट वहाँ निवासी बन गए। उनका नेटवर्क बर्मा में भी फैला हुआ है।
हमने तिब्बतीयों को बुलाया , उन्हें शरण दी । ताकि भविष्य में चीन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दावपेच खेल सक और तिब्बत पर भारत कब्जा कर सकेंं। २००० साल पहले बौद्धधर्मियों का नरसंहार करके दोबारा भारत को मनुवादी देश बनाने वाले लोग बौद्ध लामा और लाखों तिब्बती को मेहमान क्यों बनाए हुए है? एक दिन आएगा जब दलाई लामा इस हुकूम के इक्के से अमेरिका कि लड़ाई चीन के साथ हम लडेंगे।
               हमने हमारी लड़ाई के लिए बांग्लादेशीयों का इस्तेमाल किया, जबरन उन पर युद्ध थोपा, उन्हें आजादी के नाम पर कठपुतली बनाया, जो हालात अपनेे स्वार्थ के लिए हमने पैदा किए उसके पीड़ितों का उत्तरदायित्व हमारी जिम्मेदारी नहीं है❓
               बचपन में मैंने स्कूल के किताबों में एक कहानी पढ़ी थीं। जिसमें एक व्यक्ति लकड़ी को आसानी से तोड़ देता है। लेकिन कई लकड़ीयों को इकट्ठा बांधने पर नहीं तोड पाता।
         *बांग्लादेशीयों ने क्या पाया और क्या खोया? जरूर आज वो बांग्लादेश बनाकर पछता रहे होंगे, सोच रहे होंगे कि हम पूर्व पाकिस्तान में ही शामिल रहते तो ठीक होता ,आज हमारी नस्ल हमें नही कोसती*  भारत में इस्लामोफोबिया फैलाने में रोडा बननेनाले डॉक्टर जाकिर नाईक को फसाने के लिए बांग्लादेश में विस्फोट कराया जाता है; इससे हम रॉ एजेंटों कि   बांग्लादेश में  ताकत,सक्रियता का महज अंदाजा ही लगा सकते है।
           *बांग्लादेशीयों कि ५ प्रतिशत जनता अपना घरभार छोड़कर भारत आने के लिए मजबूर करने के लिए कारणीभूत हमारा थोपा हुआ गृहयुद्ध जिम्मेदार नहीं है क्या*?

Date:-13/08/2018 एक्टिविटी भरूच

तारख:- 13/08/2018

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग मीटिंग भरुच कलेकटर औफिस

साथे मे जुरे साथियों के नाम

(१) अबदुल कामथी
(२) सलिम गोरदन
(३) अय्यिब भाइ मिशरी
(૪) इक्बाल भाइ भरुच

मे हुजैफा पटेल आज सुबह सबसे पेहले अबदुल कामथी का कोल आने के बाद सबसे पेहेल भरुच नंदेलाव सरकलके  पास आइ स्कुल FAIGH पै सबसे पेहले गये जिसके बाद हमने वंहा के प्रिंसिपल की मुलाकात की जिसमे घटना के बारे मे पता चलाके स्कुल मे अभ्यास करते कुच मुस्लिम बच्चीयां जिनके साथ वंहा की एक टिचर ने मुस्लिम होने पर गलत अलफाज इस्तिमाल किये हे,

Sunday, 12 August 2018

ભરૂચ આવો જાણીએ આપણા અધિકારો, ઝુંબેશ

આજ રોજ ભરૂચમાં #જાણો_આપણા_અધિકાર_ઝુંબેશ_નો_પ્રોગ્રામ_થયો,તારીખ:- ૧૨/૦૮/૨૦૧૮ રવિવારના સવારે  ૧૦:૩૦ થી  ૧:૦૦ વાગા સુધી રહિયો જેમા ઉપસ્થિત તમામ વડિલો અને મિત્રો નો તહે દિલથી સુકરીયા  અદા કરૂ છુ,

APCR ની ટીમ અહમદાબાદ અને બરોડા ના મિત્રો અને સાથીયો નો ખુબ ખુબ આભારી છુ,

સાથી પ્રોગ્રાના અંતમાં આ ઝુંબેશ ના પ્રોગ્રામ અલગ અલગ ગામમાં કરાવવા માટે ગણા લોકો યે પોતાના ગામ નુ નામ લખાવેલ છે, ઈન્શાઅલ્લાહ આ ઝુંબેશ ભરૂચ શહર ના દરેક ગ મોહલ્લા સુધી લય જવા માટે અમારી #safteam પોતાના તરફથી પુરે પુરી કોશિશ કરતી રેહશે,

#ભરૂચ શહરના તમામ જાગૃત યુવા મિત્રો અને વડિલો જે પન પોતાના મોહલ્લા અને ગામમાં આ ઝુંબેશ નો પ્રોગ્રામ રાખવા ઈચ્છા રાખતા હોય અથવા આ પ્રોગ્રામ બાબત કોઇ પન જાનકારી મેળવવા માટે મારો સંપર્ક કરી સકે છે,મો.૯૮૯૮૩૩૫૭૬૭
સુકરીયા સાથીયો,


*अावो जाने हमारे अधिकार अभियान*
भरूच कार्यक्रम दिनांक: - 12/08/2018 रविवार

*भरूच के कार्यक्रम को गुरुप मेसे मौजूद दोस्तों ओर वडीलों के नाम*

(1)मो. इमरान पटेल कवी वाला
(2) मो.इरफान अमोड वाला और आपके दोस्त
(3) इमरान पथन बरोदा
(4) मुदासिर खान कोसाम्बा और उनके दोस्त
(5) अब्बास भाई मोटा टंकारीया 
(6) हनीफ भाई भरूच
(8) हनीफ भाई हैस्टलोडी
(9) अब्दुल कय्याम पालेज
(10) अबदुल कामथी ओर उनके दोस्त,
(11) यासीन दादा भाई भरूच
(12) जंबुसर से इरशाद भाई गोरी


*उन मित्रों के विशेष धन्यवाद के लिए बहुत बहुत धन्यवाद जिन्होंने समाज को अपनी लापरवाही के लिए अपना समय दिया है,*

जो सभी साथी अपने  व्यक्तिगत काम की वजाहसे  हमारे इस प्रोग्राम मे सिरकत नही कर पाये उनसे अपील हे, आपसे अपील करेंगे, समाज के लिए अपने कीमती समय देने के लिये आगे बरहे , *आवो जाने   हमारे अधिकार अभियान* खुद पहल अपने स्वयं के इलाके और गांव समाज में प्रोग्राम करने के लिए लिये खुद आगे आये अल्लाह की मदद से  insaallaha आपको मदद मिलेगी,

*कार्यक्रम के बारे में किसी भी जानकारी के लिए कृपया मुझसे संपर्क करें,*

हुजयफा पटेल एम 989835767

Friday, 10 August 2018

समाजकी दुर दशाओं ओर वर्तमान समय की सोच मानव भविष्य के लिये खतरा

लड़कियों के नग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रीयां ये कहते है की #कपड़े नहीं सोच बदलो....
उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???
1)हम #सोच क्यों बदले?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपने लोगो की सोच का #ठेका लिया है क्या??
2) आप उन लड़कियो की सोच का #आकलन क्यों नहीं करते?? उसने क्या सोचकर ऐसे कपड़े पहने की उसके स्तन पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक #निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे,वही एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उसे देखे
3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये.....
हत्या ,डकैती, चोरी, बलात्कार, आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों????
4) कुछ लड़किया कहती है कि हम क्या पहनेंगी  ये हम तय करेंगे....पुरुष नहीं.....
जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करे....लेकिन हम पुरुष भी किस लड़की का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रीया नहीं.... और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे
5)फिर कुछ विवेकहीन लड़किया कहती है कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की.....
जी बिल्कुल आज़ादी है,ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो,गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो,वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो,पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो।
6)लड़को को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा की क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे??? क्या ये लड़किया पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से देखती है ??? जब ये खुद पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की "हमें माँ/बहन की नज़र से देखो"
कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती है??? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था....
सत्य ये है कीअश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।।और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करता है।
मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता(सेक्स) भी है।
चाणक्य ने चाणक्य सूत्र में सेक्स को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है।।
अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रीया अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती????
गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।। —
एक मित्र नज़ाकत साहब ने बड़ी अच्छी बात कही
"जब हम अपना मकान बनवाते हैं तो हम ज़रूरत के तहत मकान में दरवाज़े खिड़किया रोशनदान ओपन स्पेस आदि की जगह रखते हैं। मगर हम सुरक्षा के तहत खिड़कियों, दरवाजों, रोशनदान वगैरह में लकड़ी के पल्ले, लोहे की ग्रिल भी लगाते हैं। ओपन स्पेस पर जाल लगाते हैं। खिड़कियों दरवाज़ों में सिटकनी, दंडाले आदि लगते हैं। कभी कभी तो मुख्य दरवाजे पर लोहे का चेंनल गेट भी लगवाते हैं। इतने पर ही बस नही करते बल्कि घर से काम पर जाते वक्त मज़बूत ताले भी लगाते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो हर व्यक्ति (महिला हो या पुरुष) मकान की सुरक्षा के लिए करता है,।
मैंने आज तक ऐसा कोई व्यक्ति नही देखा जो खिड़की, दरवाज़ों को खुला छोड़ देता हो या मकान में ताला न लगाता हो और यह विचार रखता हो कि मैं ये सब क्यों करूँ जो भी समाज मे चोरी की मानसिकता रखने वाले व्यक्ति हैं उन्हें चाहिए कि वह अपनीं मानसिकता बदले।
हम ऐसा नही करते क्योंकि हम ये नही जानते कि कौन सा व्यक्ति चोर हो सकता है और कौन सा नही हो सकता। इसलिए हम हर किसी को संदेह की परिधि में रखते हैं और अपनी और से मकान की सुरक्षा का हर सँभव प्रयास करते हैं।
यह सुरक्षा सिर्फ पेशावर चोरों से ही नही की जाती बल्कि अन्य लोगों से भी की जाती है क्योंकि हम ये भी जानते हैं कि अनुकूल अवसर देखकर पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों के मन मे भी चोरी करने का विचार आ सकता है।
यदि हमारे अडोस पड़ोस में किसी व्यक्ति ने कोई सम्पत्ति बगैर सुरक्षा के ही घर के बाहर या छत पर रख छोड़ी है और वह चोरी हो जाती है तो देखा गया है कि हम उसी व्यक्ति से यह कहते हैं कि वह उसीकी लापरवाही की वजह से चोरी हुई है क्योंकि उसने उसकी सुरक्षा का पर्याप्त प्रबंध नही किया था।

कुछ प्रश्न:
क्या पेशागत चोरों से ये उम्मीद करना कि वह अपनी मानसिकता बदले ठीक होगा। क्या अवसर की अनुकूलता देखकर जो भी सामान्य व्यक्ति कुछ पल के लिए चोर बन जाता है उससे यह उम्मीद रखना ठीक होगा कि वह अपनी मानसिकता बदले, हो सकता है कि ऐसे लोगों में से कुछ के मन में चोरी करने के बाद ग्लानि उत्पन्न हो जाये मागर इस ग्लानि से उस व्यक्ति को क्या लाभ जिसका समान चुराया जा चुका है। रहे मज़बूत चरित्र के लोग तो उनसे मानसिकता बदलने की उम्मीद करने का कोई औचित्य ही नही बनता।

सोचिये-
सार्वजनिक स्थामो पर क्यों लिखा रहता है,  अपने सामान की रक्षा खुद करे।  सावधानी हटी दुर्घटना घटी

Thursday, 9 August 2018

विश्व आदिवासी दिवस

वर्ल्ड इंडिजेनस डे (World Indigenous Day)                             
विश्व मूलनिवासी दिवस  09अगस्त2018
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मूलनिवासियोंं के मानवाधिकारों को लागू करने और उनके संरक्षण के लिए 1982 में UNO (संयुक्त राष्ट्र संघ) ने एक कार्यदल UNWGIP (United Nations Working Group on Indigenous Populations) के उपआयोग का गठन किया जिसकी पहली बैठक 09अगस्त1982 को हुई थी इसलिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को "विश्व मूलनिवासी दिवस" UNO द्वारा अपने कार्यालय में एवं अपने सदस्य देशों को मनाने का निर्देश है। मूलनिवासी समाज की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व के देशों का ध्यानाकर्षण करने के लिए सबसे पहले UNO ने 1982 में होने वाले सम्मेलन के 300 पन्नों के एजेंडे में 40 विषय रखे जो 4 भागों में बांटे गए। तीसरे भाग में रियो-डी-जनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्व के मूलनिवासियों की स्थिति की समीक्षा की और चर्चा कर प्रस्ताव पारित किया। UNO ने यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत मूलनिवासी समाज अपनी उपेक्षा, बेरोजगारी एवं बंधुआ व बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित है। 1993 में UNWGIP कार्य दल के 11वें अधिवेशन में मूलनिवासी घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1994 को "मूलनिवासी वर्ष" व 9 अगस्त को "मूलनिवासी दिवस"घोषित किया। अतः मूलनिवासियों को हक अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा, संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए UNO की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 को जेनेवा शहर में विश्व के मूलनिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का "प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस" का सम्मेलन आयोजित किया गया। मूलनिवासियों की संस्कृति, भाषा, उनके मूलभूत हक अधिकारों को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और उनके सभी हक अधिकार बरकरार रहें इस बात की पुष्टि कर दी गई तथा UNO ने "हम आपके साथ हैं" यह वचन मूलनिवासियों को दिया। UNO ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसंबर 1994 से 20 दिसंबर 2004 तक "प्रथम मूलनिवासी दशक" तथा प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को International Day of the World,s Indigenous Peoples (विश्व मूलनिवासी दिवस) मनाने का फैसला लेकर विश्व के सभी देशों को मनाने के निर्देश दिए। विश्व के समस्त देशों में इस दिवस को मनाया जाने लगा किन्तु अफसोस! भारत की मनुवादी सरकारों ने मूलनिवासियों के साथ धोखा करते हुए न आज तक बताया और न ही आज तक मनाया। जबकि UNO ने पुनः 16 दिसंबर 2004 से 15 दिसंबर 2014 तक को फिर "दूसरा मूलनिवासी दशक" घोषित किया। जेनेवा के सम्मेलन में भारत सरकार ने अपने प्रतिनिधि के रूप में UNO को यह अवगत कराया कि "भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा परिभाषित देशज लोग भारतीय मूलनिवासी या एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि भारत के सभी लोग देशज हैं और न यहाँ के मूलनिवासी या उनसे किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व शैक्षिक पक्षपात हो रहे हैं।" इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ में जो ग्लोबल इकनॉमी में मूलनिवासियों को प्रतिनिधित्व मिलने वाला था उसे मनुवादियों ने समाप्त कर दिया। UNO द्वारा पिछले 24 वर्षों से निरन्तर विश्व मूलनिवासी दिवस मनाया जा रहा है किन्तु भारत के मूलवासियों को इसकी कोई जानकारी नहीं है। इसी के मद्देनजर अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर मूलनिवासियों की समस्याओं को मजबूती के साथ रखने की पूर्व तैयारी के सन्दर्भ में ही *"बामसेफ"* द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन किया जा रहा है। DNA के आधार पर भारत में केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, अन्य पिछडा वर्ग एवं धर्मपरिवर्तित अल्पसंख्यक ही मूलनिवासी हैं। UNO की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई एवं इसका मुख्यालय न्यूयार्क में है तथा वर्तमान में इसके 193 देश सदस्य हैं। भारत UNO का 30 अक्टूबर 1945 से सदस्य है। आओ दोस्तों! विश्व मूलनिवासी दिवस 9 अगस्त को आपस में "हैप्पी मूलनिवासी डे" की हार्दिक शुभकामनाएं एक दूसरे को देते हुए हक अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष का शंखनाद करें।
    09अगस्त को UNO द्वारा world indigenous day मनाया जा रहा है। Indigenous का मतलब होता है मूलनिवासी, परन्तु भारत की ब्राह्मणवादी सरकारें हमारे लोगों में ही भेद करने मतलब, विभाजन करने, मतलब षडयंत्र करने के लिए Indigenous peoples का हिन्दी अनुवाद मात्र आदिवासी के नाम पर करके SC/ST/OBC and Converted minority को अलग-अलग करने का षडयंत्र कर रही है। विज्ञान के अकाट्य प्रमाण DNA test जिसकी रिपोर्ट Times of India में 21 मई 2001 को छपी, जिसके अनुसार SC/ST/OBC और उससे धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यक ही भारत के मूलनिवासी (Indigenous peoples) है और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य विदेशी युरेशियन नस्ल हैं, मतलब विदेशी हैं, परन्तु षडयंत्र यह किया जा रहा है कि जब UNO द्वारा 9 august को World Indigenous peoples day मनाया जा रहा है, परन्तु भारत में उसको विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर मनाये जाने का षडयंत्र किया जा रहा है, ब्राह्मण विदेशी है, उसको कोई मतलब नहीं है कि यहाँ का कौन-कौन मूलनिवासी है, परन्तु वो चाहते हैं कि हम आपस में ही लडते रहें। इसलिए विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर इन जातियों को अलग करने का षडयंत्र किया जा रहा है। *ब्राह्मण जस्टिस मार्कंडेय काटजू व ज्ञान सुधा मिश्रा ने 05जनवरी2011 को एक टिप्पणी द्वारा इसे हवा देने की भरपूर कोशिश की। जबकि केस महाराष्ट्र की एक आदिवासी महिला नंदा बाई के उत्पीड़न का था तो ऐसी टिप्पणी की आवश्यकता क्यों हुई ? उन्होंने यह टिप्पणी जानबूझकर की ताकि लोग भ्रम में पडे रहें। ठीक उसी प्रकार दूसरा मामला महाराष्ट्र का ही, एक अनुसूचित जाति के उत्पीड़न का था और फैसला जस्टिस उदय उमेश ललित व आदर्श कुमार गोयल द्वारा 20मार्च2018 को एससी/एसटी एक्ट को निष्क्रिय करने का था जिसके कारण एससी-एसटी के लोगों द्वारा 02अप्रैल2018 को भारत बंद किया किया।*
     विश्व आदिवासी दिवस का अंग्रेजी अनुवाद होगा World Tribes day, और UNO मना रहा है विश्व मूलनिवासी दिवस मतलब world Indigenous peoples day ! Indigenous मतलब Native, मतलब मूलनिवासी, मतलब मूल रहवासी। इसका असली नाम मूलनिवासी दिवस ही है। किसी प्रकार के भ्रम में न पडें।
   बोल पच्चासी! जय मूलनिवासी!!         
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WhatsApp vairal mesaj bharuch

DATE:- 09/08/2018

અસ્સલામો અલયકુમ...
સલામ બાદ આપણો સમાજ ભરૂચી વ્હોરા પટેલ તરીકે જાણીતો છે.
આપણા વડવાઓ અભણ હતા પરંતુ ઘણાજ દુરંદેશી હતા.તેઓ આપણા માટે પુષ્કર વારસો મુકી ગયા.પરંતુ આપણાથી એનો ગમેતે કારણસર સદઉપયોગ  થ
ખેર ૧૯૭૫ થી ૧૯૯૦ સુધી ભરૂચના રાજકારણમાં  તાલુકા પંચાયત,જીલ્લા પંચાયત,ધારાસભા, સંસદસભા અને જીલ્લાની તમામ સહકારી સંસ્થાઓમાં આપણુ પ્રતીનિધિત્વ અને વર્ચસ્વ હતું, ૧૯૯૦ થી કોઈની નઝર લાગી હોય એમ અંદર અંદર કુસુંપ થવાથી આજે થોડુઘણુ પ્રતિનિધિત્વ તો છે. પણ આપણા સમાજની આગેવાની ખતમ થઈ ગઈ. આજે કોઈએવા નેતા નથી જેમનું પોલીટીકલી વજન હોય.
એકબીજાના દોષારોપણમાં આપણા સમાજે આપણી આગેવાની ગુમાવી દીધી છે. ભયંકર શૂન્ય અવકાશ છે.
જેના માટે એકલા નેતા જવાબદાર નથી આપણે આખો સમાજ પણ એટલોજ જવાબદાર છે. કોઈએ ખોટાને ખોટો કે ખરૂ કહેવા કે માર્ગદર્શન આપવાની તસ્દી લીધી નથી.મીઠું પી ગયા હોય એમ સારા દીર્ઘ દ્રષ્ટી વાળા સજ્જન માણસો અપમાન થવાની બીકે ખૂણામાં બેસી ગયા. એવું કહેવાની હીમત પણના કરી કે ભાઈ તમો હમારાથી આગેવાન છો. આ બધુ બંધ કરો નહીતો હમો તમારો બહીષ્કાર કરીશું, તમારે કંઈ ગુમાવવાનું નથી ગુમાવવાનું સમાજે છે.  અને ખરેખર સમાજે ઘણું બધુ ગુમાવ્યુ અને હજુ ગુમાવી રહ્યા છે.
       ખેર હવે જાગ્યા ત્યાંથી સવાર રાજકીય આગેવાનોને એક જુથ થઈ સાચું કહેવાની હીમત કરવી પડશે,
સમાજે ઘણું ગુમાવ્યું છે. માટે રાજકીય આગેવાનોને પણ વિનંતી કે સમાજનો વિચાર પહેલા કરશો. સમાજની બાબતમાં રાજકારણ ના લાવશો. જીલ્લામાં આદિવાસી પછી સૌથી વધુ ધરાવતો આપણો સમાજ આજે અછુત થઈ રહ્યો છે. બીચારો થઈ ગયો છે. આપણો સહકાર મેળવવા બધા તૈયાર પણ આપણને સહકાર આપવા કોઈ તૈયાર નહી. કેટલી બદનશીબી કહેવાય.
આનું કારણ આપણી ના ઈત્તેફાકી.
સમાજને કશુ આપીના શકતા હોયતો કંઈ નહી પણ વ્યક્તિગત લાભ માટે  સમાજનો ભોગ ના લેવા વિનંતી કરૂ છું.
કંઈ ભુલ હોયતો માફ કરશો. વ્યક્તિગત કોઈએ માથે લેવું નહી આ બાબત જનરલ છે અને સો ટકા સાચી છે.
                 આ પોસ્ટ મે કોપી કરેલી છે સમાજના કોઈ સાચા ફિકરમંદ ભાઈ એ લખી છે

Wednesday, 8 August 2018

क्या आपको पता है स्मृति ईरानी का धर्म ?

Date:-08/08/2018
खबर कोपी👇

मुस्लमानो पर ऊँगली उठानी वाली स्मृति ईरानी न तो हिन्दू हैं और न ही मुस्लिम…! उनके धर्म के बारे में जानकर आपको यकीन नहीं होगा!

भारत में हर धर्म का तहे दिल से सम्मान किया जाता है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक देश है. यहाँ हर धर्म, जाति के लोगों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता है, सभी को किसी भी सरकारी गतिविधि में भाग लेने का अधिकार है. लेकिन आये दिन कुछ लोग धर्म और जाति को मुद्दा बनाकर हिंसा और दंगे करवाते हैं. लेकिन हालहि में एक खबर ने लोगों को भी सक्ते में डाल दिया है.

धर्म के नाम पर राजनीति source
बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो धर्म के नाम पर राजनीति करके लोगों के वोट अपनी झोली में डालती है, लेकिन उनके लिए कोई काम नहीं करती है. बीजेपी हमेशा हिन्दू धर्म को सबसे ज्यादा बढ़ावा देती है, लेकिन हैरान करने वाली बात ये हैं कि धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले ये लोग अपना ही धर्म लोगों से छुपाते फिरते हैं. ऐसा ही कुछ स्मृति ईरानी ने भी किया.

यह है स्मृति ईरानी का धर्म source

आज हम आपको स्मृति ईरानी के धर्म के बारे में बताने जा रहे हैं. जानकारी के लिए आपको बता दें, कि स्मृति ईरानी ने राहुल गाँधी के ऊपर इल्जाम लगाया था कि वो अचानक हिन्दू कैसे हो गये. लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदूवादी परचम लहराने वाली पार्टी की नेता स्मृति ईरानी कुछ हिन्दू नहीं है. स्मृति ईरानी पारसी धर्म से संबंध रखती हैं.

पति व पिता के अनुसार ही माने जाते हैं धर्म source

हमारा देश जो कि एक पितृसत्तात्मक देश है तो यहां धर्म पति व पिता के अनुसार ही माने जाते हैं. साथ ही ये भी बताते चले कि स्मृति के पति का नाम जुबीन ईरानी है और वो पारसी धर्म से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए स्मृति हिन्दू नहीं पारसी हैं. तो क्या स्मृति को दूसरों के धर्म के ऊपर सवाल उठाना शोभा देता है ?

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