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Friday, 31 July 2020

ठेले पर आम बेचती इंदौर की डॉक्टर रईसा अंसारी हमारी व्यवस्था का वो सच हैं .

ठेले पर आम बेचती इंदौर की डॉक्टर रईसा अंसारी हमारी व्यवस्था का वो सच हैं जिसे जानते तो सब हैं लेकिन जिस पर बात कोई नहीं करना चाहता. फ़िज़िक्स में पीएचडी इस महिला पर आज सबको तरस आ रहा है. लेकिन मुझे उन पर तरस नहीं आ रहा, बल्कि गर्व हो रहा है. क्योंकि मैं जानती हूं रईसा को फल बेचते हुए शर्म नहीं आ रही है और ना ही उन्हें ये काम छोटा लग रहा है. बल्कि शर्म उस समाज और व्यवस्था को आनी चाहिए जो डॉ. रईसा अंसारी जैसी प्रतिभा को सड़क पर ला देता है. 

इंदौर की देवी अहल्या बाई यूनीवर्सिटी से फ़िज़िक्स में मास्टर और पीएचडी रईसा को बेल्जियम से रिसर्च करने का ऑफ़र मिला था. लेकिन उनके रिसर्च हेड ने उनके रिकमेंडेशन लेटर पर हस्ताक्षर नहीं करे. थीसिस सबमिट होने के दो साल बाद तक उनका वाइवा नहीं किया गया और फिर प्रशासनिक दख़ल के बाद उनका वाइवा हो सका. 

रईसा ने सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ़ साइंटीफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) की फेलोशिप पर कोलकाता के आईआईएसईआर (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च) से रिसर्च की है. एक दस्तख़त की वजह से रईसा शोध करने के लिए बेल्जियम नहीं जा सकीं. 2011 में पीएचडी करने वाली रईसा को एक बार जूनियर रिसर्च के लिए अवार्ड मिला था. मीडिया उनका साक्षात्कार लेने उनके पास पहुंची. उनके गाइड का नाम पूछा लेकिन गाइड सामने नहीं आना चाह रहे थे. रईसा ने किसी और का नाम ले दिया. यही बात गाइड को चुभ गई. फिर आगे की कहानी आप जान ही चुके हैं. 

रईसा को एसोसिएट प्रोफ़ेसर की नौकरी भी मिल गई थी लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. वो अब फल बेच रही हैं. एक पढ़ी लिखी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलने वाली महिला को फल बेचते हुए देखकर बहुत से लोगों को अफ़सोस हो रहा है. मुझे भी कहीं न कहीं अफ़सोस हो रहा है. लेकिन इस बात का फ़क्र भी है कि एक महिला ने अपने सम्मान से समझौता नहीं किया. 

रईसा जैसी महिलाएं हार नहीं मानती हैं. वो मुश्किल चुनौतियों को अवसर में बदल देती हैं. रईसा को मौका मिलेगा और वो अपना मुकाम हासिल कर लेंगी. उनके रिकमेंडेशन लेटर पर साइन न करने वाला उनका गाइड कहीं न कहीं मन-मन में कुढ़ रहा होगा. सबकुछ होते हुए भी उसके पास कुछ नहीं होगा।

Poonam Kaushal ✍️

भारत देश के संविधान और जनता की आजादी को हिंदुरिजम से खतरा,और एजुकेशन क्षेत्रों मे हिंदूरिजम की साजिश .



भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है हमारी गंगा- जमनी तहजीब को कौन नहीं जानता पीछले कुछ सालों से देश में जो घटनायें घट रही है चाहे वह राजकीय स्तर पर हो या सामाजिक स्तर पर हो इससे तो यही लगता है कि क्या घर्मनिरपेक्षता अब सिर्फ संविधान की किताब में ही सिमित रह गई है आपको नहीं लगता कि हम अब धीरे-धीरे एक धर्म आधारित समाज की और बढ़ते जा रहे हैं !

                     एक आई पी एस अफसर जो पहले सी.बी.आइ डायरेक्टर के पद पर भी रह चुके हैं जिनका नाम एम.नागेश्र्वरम राव है उन्होंने ट्वीट किया है कि सन् 1947से1977तक जो शिक्षा मंत्री रहे उन्होंने जो इस्लामीक रुल है उस पर कलइ पोथ ने का काम किया है यानी व्हाइट वोश किया इन शिक्षामंत्रीओं ध्वारा भारतीय इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया, हिन्दुओं को उनके ज्ञान से दूर रखा गया,हिन्दु धर्म रुढ़िवादी है ऐसा दिखाया गया और हिन्दू धर्म को हिन्दुरीजम से अलग कर देना जैसे आरोप लगाये है अब इन का यह ट्वीट कीतना कम्युनल है इस का अंदाज आपको इस बात से लग जायेगा उन्होंने जो 30 साल का जिक्र किया है उनमें से 10 साल मौलाना आजाद और बाकी दो और मुस्लीम शिक्षामंत्री रहे और पीछे 10 साल जो शिक्षा मंत्री रहे उन्हें वामपंथी बताया गया है !
                          अब सोचिए हमारा देश कीस और अग्रसर हो रहा है यह इल्ज़ाम सीधे तौर पर एक ऐसी शख्सियत की तरफ इशारा करता है जिसका नाम है हमारे देश के प्रथम शिक्षामंत्री रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद जो हमेशा हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक रहे हैं, मौलाना आजाद जो राष्ट्र निर्माता है भारत के चार पीलर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू,बाबा साहेब आंबेडकर और मौलाना आजाद जिन्होंने आजाद भारत की नीव रखी मौलाना आजाद जिन्होंने आई आई टी,युटीसी,ललीत कला एकेडमी, साहित्य अकादमी जैसे बड़े संस्थान बनाये और यहां तक कि जिसने महाभारत और रामायण जैसे हिन्दू ग्रंथों को फारसी में लिखवाया ताकि भारत के बहार रहने वाले भी भारतीय संस्कृति को समझ सके ऐसी शख्सियत को साम्प्रदायिक बताया जाना उचित है !

                         एक सर्वे अफसर जो की सर्विस रुल पर चलता है जिस की भारतीय संविधान को स्थापित करने की जिम्मेदारी बनती हैं ऐसा अफसर क्या इस कदर कोमवादी सोच रख सकता है ऐसे लोग बदनुमा धब्बा है लोकतंत्र पर लोग इस नौकरीयों में देश की सेवा के लिए आते हैं यहां अब सवाल यह भी उठता है कि क्या अब आईएएस आईपीएस अधिकारियों को भी इसी तरह तैयार तो नहीं कीया जा रहा और हां तो फिर हमारा लोकतंत्र,हमारा संविधान सिर्फ किताबों में किस्सा बनकर रह जायेगा दुसरा यह की क्या नागेश्र्वरम जैसे कोमवादी और निम्न कक्षा की मानसिकता वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होगी क्या उन्हें सस्पेंड कीया जायेगा यह सवाल भी अपने आप मे कही सवाल पैदा करता है !

सचेत रहे सुरक्षित रहे अपने एवम अपने परिवार के साथ आने वाली नश्लो को इतिहास का सही ज्ञान प्रदान करे ताकी मानसिक रुपसे आजाद होने में कामयाब हो..!!

                अमीर मलेक...!!
           गुजरात  खंभात तहसील 
            राष्ट्रीय मुस्लिम महासभा

कोरोना मे लोकडाउन के महाकाल मे भारत की एक येभी तस्वीर हे.

कल्पना कीजिए उस देश की, जहाँ दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी, जगमगाता हुआ भव्य राम मंदिर होगा, सरयू में देशी घी के छह लाख दीयों की अभूतपूर्व शोभायमान महा आरती हो रही होगी। सड़कों, गलियों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर जुगाली और चिंतन में संलग्न गौवंश आराम फरमा रहा होगा। धर्म उल्लू की तरह हर आदमी के सर पर बैठा होगा !

लेकिन, अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं होगी, दवाइयां, बेड, इन्जेक्शन नहीं होंगे। दुधमुंहे बच्चे बे-सांस दम तोड़ रहे होंगे। मरीज दर-ब-दर भटक रहे होंगे। देश में ढंग के स्कूल-कॉलेज नहीं होंगे, बच्चे कामकाज की तलाश में गलियों में भटक रहे होंगे। कोविड-19 जैसी महामारियां देश पर ताला लगा रही होगी और देश का प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे सैकड़ों मील की पैदल यात्रा कर रहे होंगे, आम जनता घुट-घुट कर जी रहे होंगे और तिल-तिल कर मर रहे होंगे !

बेटियां  स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल, इंजीनियरिंग संस्थाओं में न होकर सिर्फ़ सड़कों पर दौड़ रहे ट्रकों के पीछे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारों में ही होंगी और न्याय एक महँगा विलासिता की चीज होगा। बेटियों, महिलाओं के हत्यारों, बलात्कारियों और दूसरे जघन्यतम अपराधियों को पुलिस बल गार्ड-ऑफ़-ऑनर पेश कर रहे होंगे। अलग-अलग वेषभूषा में मुनाफ़ाखोर और अपराधी-प्रवृत्ति के लोग देश के सम्मानित और गणमान्य नागरिक होंगे और मीडिया उनका जय-जयकार कर रही होगी !

 विश्व स्तर के उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान नहीं होंगे,अस्पताल नहीं होंगे, बेहतरीन किस्म के शोध संस्थान और प्रयोगशालाएं भी नहीं होंगी. भूख और बेरोजगारी से जूझती जनता के लिए चूरन होंगे, अवलेह और आसव होंगे, सांस रोकने-छोड़ने के करतब होंगे, अनुलोम-विलोम होगा, काढ़े होंगे और इन सबसे ऊपर, कोई तपस्वी उद्योगपति होगा, जो धर्म, अध्यात्म, तप-त्याग, और दर्शन की पुड़ियाओं में भस्म-भभूत और आरोग्य के ईश्वरीय वरदान लपेट रहा होगा।

सुव्यवस्थित और गौरवशाली राष्ट्रीयकृत बैंक भी नहीं होंगे, बीमा कंपनियां नही होंगी। महारत्न और नवरत्न कहे जाने वाले सार्वजनिक उपक्रम नही होंगे। अपनी-सी लगती वह रेल भी गरीबों की पहुँच से दूर होगी !

देश एक ऐसी दुकान में बदल चुका होगा, जिसकी शक्ल-सूरत किसी मंदिर जैसी होगी। देश ऐसा बदल चुका होगा जहाँ युवकों के लिए रथयात्राएं, शिलान्यासें और जगराते होंगे। गौ-रक्षा दल होंगे, और गौरव-यात्राएं होंगी। मुंह में गुटके की ढेर सारी पीक सहेजे बोलने और चीखने का अभ्यास साधे सैकड़ों-हजारों किशोर-युवा होंगे, जो कांवर लेकर आ रहे होंगे या जा रहे होंगे, या किसी नए मंदिर के काम आ रहे होंगे और खाली वक्त में जियो के सिम की बदौलत पुलिया में बैठे IT Cell द्वारा ठेले गए स्रोत से अपना ज्ञान बढ़ा रहे होंगे !

शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक-सामाजिक उन्नति के हिसाब से हम 1940-50 के दौर में विचर रहे होंगे। तर्क, औचित्य, विवेक से शून्य होकर पड़ोसी की जाति, गोत्र जानकर किलस रहे होंगे अथवा हुलस रहे होंगे। हम भूखों मर रहे होंगे परंतु अपने हिसाब से विश्वगुरु होंगे । हमारा आर्थिक विकास इतना सुविचारित होगा कि दुनिया का सस्ता डीजल, पेट्रोल हमारे यहां सबसे महंगा होगा। कोविड-19 जैसे महामारी के दौर में भी हम मास्क, सैनेटाइज़र और किट पर जीएसटी वसूल रहे होंगे !

हमारी ताक़त का ये आलम होगा कि कोई कहीं भी हमारी सीमा में नहीं घुसा होगा, फिर भी हमारे बीस-तीस सैनिक बिना किसी युद्ध के वीरगति को प्राप्त हो रहे होंगे। दुश्मन सरहद पर खड़ा होगा और हम टैंकों को जे.एन.यू. सरीखे विश्वविद्यालयों में खड़े कर रहे होंगे !

कोई खास मुश्किल नहीं है। बस थोड़ा अभ्यास करना होगा, उल्टे चलने और हमेशा अतीत की जुगाली करने और मिथकों में जीने की आदत डालनी होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, न्याय, समानता और लोकतंत्र जैसे राष्ट्रद्रोही विषयों को जेहन से जबरन झटक देना होगा। अखंड विश्वास करना होगा कि धर्म, संस्कृति, मंदिर, आरती, जागरण-जगराते, गाय-गोबर, और मूर्तियां ही विकास हैं। बाकी सब भ्रम है। यकीन मानिए शुरू में भले अटपटा लगे, पर यह चेतना बाद में बहुत आनंद देगी !

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मुसलमान अपने अन्दर 8 बदलाव लाएं.

मुसलमान अपने अन्दर 8 बदलाव लाएं:-
मुसलमानों को अब कुछ बदलाव करना ही पड़ेंगे, सामूहिक तौर से:-

1. मस्जिदों को सभी के लिए आम करदे, जो बंदा आना चाहे आये, जिसे दुआ मांगना हो ख़ुदा से मांगे। सभी मज़हब के लोगों के आने का इंतज़ाम हो। उन्हें जो सवाल पूछना हो इस्लाम या ख़ुदा या रसूल के बारे में उनके जवाब भी कोई समझदार इंसान दे।

2. मस्जिदों को बस नमाज़ पढ़ने की ही जगह न बनाये। वहाँ ग़रीबो के खाने का इंतज़ाम हो, डिप्रेशन में उलझे लोगो की कॉउन्सेल्लिंग हो, उनके पारिवारिक मसलो को सुलझाने का इंतेज़ाम हो, मदद मांगने वालो की मदद की जाने का इंतेज़ाम हो। जब दरगाहों पर लंगर चल सकता हैं तो मस्जिदों में क्यों नहीं, और दान करने में मुस्लिमो का कहा कोई मुकाबला है, हम आगे आएंगे तो सब बदलेगा।

3.मस्जिदों में अगर कोई दूसरे मज़हब के भाई बहन आये तो उनके स्वागत या इस्तक़बाल का इंतज़ाम हो।उन्हें बिना खाना खिलाये हरगिज़ न भेजें।

4.मस्जिदों में एक शानदार लाइब्रेरी हो। जहाँ पर इस्लाम की हर किताब के साथ-साथ दूसरे मज़हब की किताबें भी पढ़ने को उपलब्ध हो। ई-लाइब्रेरी भी ज़रूर हो। बहुत होगये मार्बल, झूमर, ऐ.सी. और कालीनों पर खर्च अब उसे बंद करके कुछ सही जगह पैसा लगाये।

5.समाज या कौम के पढ़े लिखे लोगो का इस्तेमाल करे। डॉक्टरों से फ्री इलाज़ के लिए कहे मस्ज़िद में ही कही कोई जगह देकर, वकील, काउंसलर, टीचर आदि को भी मस्जिद में अपना वक्त देने को बोले और यह सुविधा हर धर्म वाले के लिए बिलकुल मुफ्त हो।इसके लिए लगभग सभी लोग तैयार होजाएंगे, जब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे व्यस्त सर्जन डॉ मुहम्मद सुलेमान भी मुफ्त कंसल्टेशन के लिए तैयार रहते हैं, तो आम डॉ या काउंसलर क्यों नही होंगे? ज़रूरत है बस उन्हें मैनेज करने की।

6.इमाम की तनख्वाह ज्यादा रखे ताकि टैलेंटेड लोग आये और समाज को दिशा दें।

7.मदरसों से छोटे छोटे कोर्स भी शुरू करें कुछ कॉररेस्पोंडेंसे से भी हो। किसी अन्य धर्म का व्यक्ति भी आकर कुछ पढ़ना चाहे तो उसका भी इंतेज़ाम हो।

8.ट्रस्ट के शानदार हॉस्पिटल और स्कूल खोले जहाँ सभी को ईमानदारी और बेहतरीन किस्म का इलाज़ और पढ़ने का मौका मिले, बहुत रियायती दर पर। यह भी हर मज़हब वालो के लिये हो, बिलकुल बराबर।

इनमे से एक भी सुझाव नया नहीं है, सभी काम 1400 साल पहले मदीना में होते थे...हमने उनको छोड़ा और हम बर्बादी की तरफ बढ़ते चले गए... और जा रहे हैं।रुके, सोचे और फैसला ले।
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Thursday, 30 July 2020

अगर उम्मते मुस्लमान का सियासी शुउर (बुलंदी) अगर बैदार नही कया गया जानते हो उस मुल्क मे क्या होगा?


SAFTEAM GUJ.
30 JUL 2020
अगर उम्मते मुसलमान का सियासी शुउर (बुलंद) बैदार (जगाया) नही कया गया जानते हो उस मुल्क मे क्या होगा?

अगर कौमको पंचवक्त नमाज नही बल्के सौ फिसत तहुज्जुद गुजार बना दिया जाये, लेकीन उसके सियासी शुउर को बैदार (जागृत) ना किया जाये, उस मुलक के अहवाल से उनको वाकिफ (मुसलमानो को) ना किया जाये, तो मुन्किन हे, आंइदा (भविष्य) तहुज्जुद तो दूर मगर पांच वक्त की नमाज परभी पाबंदी आइड हो जाये. 

मुफिक्कीरे इस्लाम मोलाना सैयद अबुल हशन नदवी.

हमारी ही सफोमे शामिल है अंधेरा होते ही चराग बुजाकर खेमे बदलने वाले लोग..!

जिन चरागोंने रौशनी बाटने की कसम खाई थी कभी आज वहीं आग लगाए हुए हैं..!
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                  शकील संधी..!

मौजूदा दौर में मुस्लिम समुदाय के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह लेना चाहिए की समुदाय की दशा एवम दिशा कैसे बदली जा सकती है लोगो की मदद करते हुए जीवन कैसे जीना चाहिए समय की मांग के अनुशार जीवन को जिंदा लाश नही जीवंत बनाए जीवन जीने के तरीके एवम सलीके का अभाव दूर करने के लिए स्वभाव बदले समुदाय के पूंजीपति भी समुदायकी फिक्र करे माना की आप की नजर में पैसा बहुत मायने रखता होगा पर जीवन का सत्य यहभी है की पैसा सबकुछ तो नही है.

               समुदायकी आज जो दुर्दशा है उसके लिए जिम्मेदार  हम खुद ही है दुशरो को दोष देनेशे क्या फायदा जब हम खुद दुशरो की छांव में खडे रहना चाहते हो आज तक हमने कभी यह सोचा की हमे आर्थिक उन्नति कैसे करनी चाहिए हमारा समाज शिक्षित कैसे होगा आगे तरक्की के लिए समयकी मांग को लेकर कौनसे अवसर युवाओंको मुहैया कराने चाहिए इन सब कार्य के लिए स्कूल कॉलेज एवम यूनिवर्सिटी बनाना आवश्यक होता है.

       समुदायकी सच्चाई यह है की हम जब भी कहीभी जमा हुए है बस खाने के लिए ही जमा हुए हैं मतलब जिस्म की गीजा के लिए प्लानिंग पर रूह की गीजा का कोई प्लानिंग नही नाही समाजको इसके लिए प्रेरित करना क्योकि समाज के युवा शिक्षित होंगे तब हमारी चैरिटी के काले चिठ्ठों का हिशाब मांगेगेना इस लिए भोली भाली कॉम को भावनात्मक अफीन पिला कर सुलाया जा रहा है !

      आज हमारे समुदाय के हालात यह है की हम खुदको टूटने से नही बचा पा रहे हैं हम अभी भी फिरको में इस तरह बटे हुए है इसी कारण हम बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं गुजरात में अपनी कयादत को मजबूत बनाकर एक मुकम्मल सामाजिक कायद होना समयकी मांग है जिससे समुदायमे राजनैतिक आर्थिक एवम सामाजिक बदलाव को आसानीसे किया जा शके क्या कभी मुस्लिम समुदायमें आर्थिक विकास के साथ साथ सामाजिक बदलाव के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम कभी चलाए गए है अगर किसी के पास जानकारी होतो मुजे साजा कराए अब हमें सबसे पहले समुदाय के बीच जाकर फिरका परस्ती नाबूद करने के लिए एक प्रॉपर प्लानिंग के साथ जमीनी स्तर पर कार्य करने होंगे पूरे समुदायको सामाजिक तौर पर संगठित करना होगा आपसी भेदभाव मिटाने के लिए प्रयास किए जाए उसके बाद हमारा मिशन मुफ्त शिक्षा मुफ्त चिकित्सा हमारे समुदाय से सुरु करना चाहिए आपसी रंजिशें हो सकती है यह मसला घर घर का है कोई नई बात नहीं है इसको अपनी इबादत गाहों एवम घर तक सीमित रखना समय की मांग है आने वाली नश्लो के बहेतर भविष्य के लिए एक प्लेटफार्म बनाना समय की मांग है वर्ना अल्लामा ईकबाल साहब ने जो आजसे नब्वे साल पहले जो बात कही थी वो याद कीजिए "न संभलोगे तो मिट जाओगे ए हिंद के मुसलमानो दास्ता तक न रहेगी तुम्हारी दास्तानो में" उपरोक्त विषय पर विस्तार से विचार विमस कीजिए और युवा पीढी निस्वार्थ भाव से सामाजिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए आगे बढे ताकी स्वार्थी लालची एवम मक्कारी वाली लिडर सीप पर कुछ हद तक प्रेसर बने मौजूद हालात को देखते हुए हर जगह समुदयकी लिडर सिप की एक ही थियरी है "टके सेर भाजी टके सेर खाजा" ज्यादा तर बेईमान एवम मक्कार लीडरशिप ने अपनी मनमानी करते हुए जो नुकशान समुदाय को एवम इस्लाम को पहोचाया है उसकी मिसाल देना भी मुश्किल काम है.

आज बडे अफसोस के साथ कहना पड रहा है की आज हम वो सउर खो चुके हैं जो हमारे अगलोमें था परशो के दिन ईदुल अजहा है उस दिन भी हमारा मकसद तो सिर्फ यही रहेगा की जानवर की गर्दन पर छुरी चलाना यानी कुर्बानी करना बस क्या इससे हमारा रब राजी हो जाएगा क्या यहदिन सिर्फ हलाल जानवरो की गर्दन पर छुरी चलाने लिए ही मुकर्रर किया गया है सायद मेरी बात से चुभन भी मैसूस हो सकती है माफ करना ख्वाहिशो को कुर्बान करना भी कुर्बानी है हम कब तक सिर्फ और सिर्फ अपने जिस्म को मजबूत बनाने के चक्करमे रूह को कमजोर करनेवाले बन कर रहेगे क्या ? अब मौजूदा हालात को देखते हुए इस्लामकी बुनियादी बातों पर अमल करते हुए हमें अपनी बीमार रूहों का ईलाज करने की जरूरत नहीं है....!!


Monday, 27 July 2020

Corona kal

24 Jul 2020 

દુનિયાભરમાં ભારતના લગભગ 2,81,98,352 લોકો છે. જે પાસપોર્ટ સાથે દુનિયાના અલગ અલગ દેશોમાં રહે છે.

યુનાઇટેડ અમિરાતમાં 34લાખ;
સાઉદી અરેબિયામાં 25,94,947;
કુવૈતમાં   10,29,861; 
ઓમાનમાં 7,81,141; 
કતારમાં  7,45,775;
બેહરીનમાં 3,26,658;
કુલ મળીને 89,03,526 ભારતીય લોકો અરબ વર્લ્ડમાં કામ કરે છે.

અમેરિકામાં રહેતા લોકોની સંખ્યા સાડા ચાર લાખ છે.
બ્રિટનમાં લગભગ 17,64,000
સિંગાપોરમાં 6,50,000
મલેશિયામાં 2,27,950
ઈટાલીમાં 2,03,000
જર્મનીમાં 1,85,000
ફિલિપિન્સમાં1,20,000  ભારતીય લોકો રહે છે.

2018 ના યુનાઈટેડ માઇગ્રેશન રિપોર્ટ મુજબ;
689બિલિયન ડોલર માત્ર માઇગ્રન કમાતા હતા.
તેમા સૌથી વધુ ભારતીય કમાતા હતા જે લગભગ 1.6 બિલિયન ડોલર જેટલું.

2020 ના રિપોર્ટ મુજબ,
પાછલાં વર્ષે દુનિયાના તમામ માઇગ્રેન વર્કરની લગભગ 714 બિલિયન ડોલરની કમાણી હતી.
જે ઘટીને 572 બિલિયન ડોલર થઈ ગઈ.

અમેરિકમાં 2020 માં 370લાખ નોકરીઓ જતી રહેશે. તેના વિવિધ ફિલ્ડમાં કામ કરતાં લોકોની સંખ્યા આ મુજબ છે:
ક્લોથિંગ એન્ડ રિટલ સેક્ટરમાં 65લાખ વર્કર 
સપોર્ટ એન્ડ એકૉમેડેશન સર્વિસમાં 58લાખ
ઓટોમોબાઇલ સર્વિસમાં 44લાખ
એજ્યુકેશન ફિલ્ડમાં 37લાખ
ટ્રાવેલ ફિલ્ડમાં 32લાખ
મેમ્બરશીપ એસોસિયેશન એન્ડ ઓર્ગેનાઇઝેશનમા 30લાખ
સ્પોર્ટ્સ એન્ડ એન્ટરટેઇનમેન્ટશિપમાં 20લાખ
રિયલ સ્ટેટમાં 14લાખ જેટલા વર્કર્સ કામ કરતા હતા.જેમા સૌથી વધુ ભારતીય છે.

બાંગ્લાદેશમાં લગભગ 10000 ભારતીયો કામ કરે છે.

7/11 मुंबई विस्फोट: यदि सभी 12 निर्दोष थे, तो दोषी कौन ❓

सैयद नदीम द्वारा . 11 जुलाई, 2006 को, सिर्फ़ 11 भयावह मिनटों में, मुंबई तहस-नहस हो गई। शाम 6:24 से 6:36 बजे के बीच लोकल ट्रेनों ...