Followers

Thursday, 16 April 2020

क्या हमें आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी पर खामोश रह जाना चाहिए ?


14 अप्रैल 2020 को जब देश बाबा साहब अम्बेडकर की 129 वी जयंती मना रहा था, तब नागरिक अधिकार कार्यकर्ता,चिंतक ,आलोचक व लेखक प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े को एनआईए ने हिरासत में ले लिया।

कौन है आनंद ?

आनंद तेलतुंबड़े भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी चर्चित नाम है,वे अपनी तार्किक और सर्वथा मौलिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं,उनकी 30 से अधिक किताबें प्रकाशित हुई है और उनके शोध पत्र,आलेख,समीक्षायें व कॉलम विश्व भर में छपते रहे हैं।

वे महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के राजुर गांव में जन्में,नागपुर के विश्वेश्वरैया नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पढ़े,बाद में उन्होंने आई आई एम अहमदाबाद से प्रबंधन की पढ़ाई की और भारत पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट बने,उनका कारपोरेट जगत से भी जुड़ाव रहा ,वे पेट्रोनेट के मैनेजिंग डायरेक्टर भी रह चुके हैं,उन्होंने आई आई टी खड़गपुर में अध्यापन भी किया और वर्तमान में वे गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में पढ़ाते थे। चर्चित बुद्धिजीवी के साथ ही उनका एक परिचय यह भी है कि वे बाबा साहब अम्बेडकर के परिवार के दामाद भी है,बाबा साहब के पौत्र प्रकाश अम्बेडकर के बहनोई ।

आनंद तेलतुंबड़े ने अपने कैरियर में कभी हिंसा जैसी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया है,वे स्वयं लिखते हैं - " मेरा पांच दशकों का बेदाग रिकॉर्ड है,मैंने कारपोरेट दुनिया मे एक शिक्षक ,नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी के तौर पर अलग अलग भूमिकाओं में देश की सेवा की है।"

निशाने पर रहे हैं तेलतुंबड़े !

चूंकि प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े बेहद मुखर आलोचक रहे हैं,वे हिंदुत्ववादी ताकतों के सदैव निशाने पर रहे है,सत्ता प्रतिष्ठान भी उनसे खफा रहा है,यहां तक कि अम्बेडकरवादी लोग भी उनकी असहमतियों से काफी असहज रहे हैं,ऐसे में आनंद तेलतुंबड़े निरन्तर सर्विलांस के शिकार होते आये हैं,जब वे आईआईटी खड़गपुर में शिक्षक थे,तब भी उनके फोन टेप किये गए है,दीगर वक्त में उनकी जासूसी तो होती ही रही है।

उनके द्वारा की जाने वाली आलोचनाओं और सरकारों पर उठाये जाने वाले सवालों ने उन पर राज्य की निगरानी और प्रताड़ना को भी निरन्तर किया है,लेकिन जिस तरह से उनके घर अगस्त 2018 में पुलिस ने छापा मारा और उनकी अनुपस्थिति में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के परिसर स्थित उनके आवास में पुलिस सिक्योरिटी गार्ड से जबरन डुप्लीकेट चाबी लेकर घुसी,वह स्तब्ध कर देने वाली घटना थी।

जिस वक्त यह छापामारी हुई,आनंद और उनकी पत्नी मुम्बई में थे,बाद में उनकी ओर से गोवा के बिचोलिम थाने में यह शिकायत दर्ज करवाई गई कि उनकी गैरमौजूदगी में उनके घर में घुसी पुलिस ने अगर वहां कुछ भी प्लांट कर दिया तो वे इसके ज़िम्मेदार न होंगे।

31 अगस्त 2018 को पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि उनको भीमा कोरेगांव की यलगार परिषद के आयोजन की साज़िश मामले में गिरफ्तार लोगों में से एक के कम्प्यूटर में एक चिट्ठी मिली है,जिसमें देश के प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र रचा गया है,इस चिट्ठी में कॉमरेड आनंद का नाम है,पुलिस के मुताबिक वह कॉमरेड आनंद दरअसल आनन्द तेलतुंबड़े ही है। जबकि दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि आनंद तेलतुंबड़े के घर या कंप्यूटर से किसी तरह की कोई बरामदगी नहीं हुई है,फिर भी पुलिस ने सिर्फ नाम की साम्यता की वजह से आनन्द तेलतुंबड़े को साज़िश में शामिल मानते हुए पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया,बाद में उच्चतम न्यायालय के दखल के बाद उन्हें और प्रसिद्ध पत्रकार गौतम नवलखा को रिहा किया गया।

आखिर मामला क्या है भीमा कोरेगांव यलगार परिषद का ? 

वो कौन सी साज़िश है,जिसका इतना हल्ला मचाया जाता रहा है ? 
जैसा कि सब जानते हैं कि पुणे के नजदीक भीमा कोरेगांव नामक स्थान पर अंग्रेज़ो व पेशवाओं के मध्य हुई लड़ाई में अंग्रेज फ़ौज की तरफ से अदम्य साहस का परिचय देते हुए महज 500 महार सैनिकों ने हजारों पेशवा सैनिकों को हरा दिया था,इस जंग में 49 लोग शहीद हो गए ,जिनकी याद में 1 जनवरी को हर साल एक उत्सव मनाया जाता रहा है ।

2017 में  भीमा कोरेगांव युद्ध की 200 वी जयंती के मौके पर एक यलगार परिषद का आयोजन हुआ,जो 31 दिसम्बर 2017 को शुरू हुई और 1 जनवरी 2018 को समाप्त हुई,इस यलगार परिषद में शामिल होने आए लोग जब अपने घरों को लौट रहे थे,तब हिंदुत्ववादी भीड़ ने उनपर हिंसा की,इस हिंसा को फैलाने का आरोप दलित समुदाय ने संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे पर लगाया था,लेकिन महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने इन्हें निर्दोष बताया।

इसके बाद पुणे के एक व्यवसायी तुषार तामगुडे ने पुणे यलगार परिषद के आयोजकों के खिलाफ हिंसा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवाई गई,इस पर त्वरित कार्यवाही करते हुए पुणे पुलिस ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ,एक्टिविस्टों व वकीलों को गिरफ्तार कर लिया,जिनमें सुधा भारद्वाज ,सोमा सेन,रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग शामिल थे।

साज़िश का पत्र !

यलगार परिषद मामले में पुणे पुलिस ने साज़िश का एक पत्र मिलने का दावा करते हुए यह सनसनीखेज खुलासा किया कि उसमें भारत के प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश की गई थी। जब इस तरह की बात सामने आई तो मामला अत्यंत संवेदनशील व उच्च स्तरीय हो गया और व्यापक छानबीन के नाम पर माओवादी संपर्कों व अर्बन नक्सल की धरपकड़ का अभियान चलाया गया।

आनन्द तेलतुंबड़े को भी इसी पत्र के आधार पर आरोपी बनाया गया और उस वक्त भी गिरफ्तार किया गया,लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में उनको रिहा करने का आदेश दिया था,अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने द्वारा दी गयी राहत को समाप्त करते हुए आनन्द तेलतुंबड़े व गौतम नवलखा को आत्मसमर्पण करने को कहा है।जिसके फलस्वरूप आनन्द व नवलखा ने 14 अप्रैल को एनआईए के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

जब महाराष्ट्र में विकास अगाड़ी सरकार ने सत्ता ग्रहण की ,तब भीमा कोरेगांव के राजनीति प्रेरित मामले को वापस लेने की बातें सोशल मीडिया में काफी चली ,लेकिन फिर अचानक ही मामला केंद्रीय जांच एजेंसी एनआईए को सौंप दिया गया ,जिसके समक्ष 14 अप्रैल को आत्मसमर्पण किया गया।

अपनी बारी आने का इंतज़ार !

एनआईए की हिरासत में जाने से पहले प्रोफेसर आनन्द तेलतुंबड़े ने देशवासियों के नाम एक चिट्ठी लिखी,जिसमें उन्होंने लिखा -"बड़े पैमाने पर उन्माद को बढ़ावा मिल रहा है और शब्दों के अर्थ बदल दिये गये हैं,जहाँ राष्ट्र के विध्वंसक देशभक्त बन जाते हैं और लोगों की निस्वार्थ सेवा करने वाले देशद्रोही हो जाते हैं। जैसा कि मैं देख रहा हूँ मेरा भारत बर्बाद हो रहा है।मैं आपको इस तरह के डरावने क्षण में एक उम्मीद के साथ लिख रहा हूँ ।खैर मैं एनआईए की हिरासत में जाने वाला हूँ और मुझे नहीं पता कि मैं आपसे वापस कब बात कर पाऊंगा?हालांकि मुझे उम्मीद है कि आप अपनी बारी आने से पहले बोलेंगे "

अन्ततः 14 अप्रैल 20 को आनंद तेलतुंबड़े हिरासत में ले लिए गए,उन पर यूएपीए जैसा क्रूर कानून लागू किया गया है,यह पता नहीं है कि वे कब वापस लौट पाएंगे, क्योंकि इस तरह के कानूनों में वकील,दलील व अपील की संभावनाएं सीमित स्वरूप ग्रहण कर लेती है और न्यायिक सुनवाई में बहुत देर हो जाती है,इतनी देर की सिर्फ फैसले आते हैं,इंसाफ गौण हो जाता है। ऐसे विकट हालात में हमें प्रोफेसर आनंद तेलतुंबड़े की चिट्ठी के अंतिम शब्दों में प्रकट खतरे को समझना होगा ।

क्या वाकई हमें अपनी बारी आने तक इंतजार करना चाहिए ? या यह खामोशी तोड़कर आनंद जैसी स्वतंत्र आवाज़ों को कुचलने के लिए इस फासीवादी फ़साओ वाद के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए ? मुझे लगता है कि इस उत्पीड़न और दमन के खिलाफ हमें मुखर स्वर में बोलना चाहिये, क्योंकि अपनी बारी आने तक चुप्पी साध लेना ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है,जब राज्य का दमनचक्र आनंद तेलतुंबड़े जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त बुद्धिजीवी तक को कुचलने पर आमादा हो सकता है तो आम दलित वंचित की तो औकात ही क्या बचती है ? 

-भंवर मेघवंशी
( लेखक शून्यकाल डॉटकॉम के संपादक है )

Bhanwar Meghwanshi

#दलाल_मीडिया और #मुसलमान


मैं देख रहा हूं, पढ़ रहा हूं कि कुछ लोग मीडिया को दलाल कह रहे हैं, और दलाल मीडिया मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं। यक़ीनन ये सब मुसलमान कह रहे हैं। बेशक़ मीडिया में बेशूमार कमियां हैं, इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता!!!

लेकिन मेरा सवाल आपसे ही है कि आप अपनी तादाद 20,25 और 30 करोड़ तक बताते हैं, 
आपके पास जमियत उलेमा ए हिंद भी है,
आपके पास #जमात ए इस्लामी हिंद भी है,
आपके पास तो आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी है, #वक्फ बोर्ड भी है 
दारूल उलूम #देवबंद भी है, #नदवतुल उलेमा लखनऊ भी है,
#वक्फ़ बोर्ड भी है,
#बरेली शरीफ भी है, हज़रत #निज़ामुद्दीन भी है, #अजमेर शरीफ़ भी है,
#पापुलर फ्रंट भी है, #सुन्नी युथ विंग भी है 
आपके पास इमाम #बुखारी भी है, मुफती #मुकर्रम भी है,
#गुलाम नबी आजाद 
#अहमद पटेल भी है, #आज़म खान भी है,#फारुक अब्दुल्ला भी है, उमर अब्दुल्ला भी है, #महबूबा मुफ्ती भी है
#सिपला(कम्पनी) भी है, #हमदर्द (कम्पनी)भी है 
#अज़ीम प्रेमजी भी है, असदउद्दीन #औवेसी भी है,
बदरूद्दीन #अजमल भी है,
#शाहरूख खान, #सलमान खान, #आमिर खान भी है,
मोहम्मद #अज़हरूद्दीन भी है,

फिर भी आप अपना नेशनल न्यूज़ चैनल नहीं चालू नहीं कर सके!
चैनल तो दूर, आपसे एक ढ़ंग का राष्ट्रीय अख़बार तो चलाया नहीं ​गया आजतक!
रेडियो स्टेशन तक तो खोल नहीं सके आपलोग!
और अब जबकि डिजिटल मीडिया, न्यू मीडिया का ज़माना आ गया है, बावजूद इसके आप अभी तक एक जानदार या कामचलाऊ वैक्ल्पिक मीडिया ओपन नहीं कर पाऐ हैं।।।

पता है असलियत क्या है...सदियों से जलसों में, इज्तिमो में, उर्स में,कव्वालीयो में, मुशायरो में लाखों-करोडों उड़ाए जाओ और बिरयानी के बाद मीठी सौंफ चबाके, खाट पे पड़ जाओ... अगर इन्हीं पैसों का ढ़ंग का मीडिया हाउस खोला जाता ना, तो आज ये ज़लालत, रूसवाई ना झेलनी पड़ती ...

#ताजमहल, #कुतुबमीनार, #लालक़िले को देखकर कब तक इतराते रहोगे...मियां 

हमारे बुजुर्गों ने विरासत के रूप में वक्फ बोर्ड्स की जो अरबों-खरबों की ज़मीन ...#मस्जिदों, #मदरसों, #क़ब्रिस्तान, #खानकाह, #दरगाह, #मकतब #स्कूल #कालिज के लिए दान की थी उसे कौन डकार गया...बताऊँ ये भी, या फिर...बात करते हैं ...
क्या कुछ नहीं कर सकते थे, क्या कुछ नहीं हो सकता था, लेकिन जब ख़ैरात की गई ज़मीन पर कोठियां बनाओगे, तो होगा क्या, वही होगा, जो मंज़ूर ऐ ख़ुदा होगा...जी हाँ ...

किसे गरिया रहे हैं आप, हां!!!
उस कॉरपोरेट को, उन बिज़नेसमैन को, जिन्हें सिर्फ मुनाफा चाहिये, जिन्हें जर्नलिज़्म से कोई मतलब नहीं।।।

आप अपना मीडिया शुरू करो ना!
किसने रोका है आपको!
#कांग्रेस ने या #बीजेपी ने या #आरएसएस ने या मोदी ने!!!

अगर बस की बात नहीं हैं तो, आपको ​ज़्यादा फड़फड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है, जैसा वो दिखाऐंगे आपको देखना पड़ेगा, और देख रहे भी हैं आप, पढ़ भी रहे हैं, सुन भी रहे हैं।।।

छोड़ दो ये क़ाहिलपन, दूसरों को दोष देना, दिक्क़त कहां है, उसका हल निकालने की कोशिश कीजिए ❤🙏🙏🙏
टेक्नॉलोजी का दौर है, टैक्निकल हो जाओ...

कड़वी बात

👆👆👆👆😞😔

Wednesday, 15 April 2020

lockdown part 2

*कोरोना जिहाद*

सैयद शुजात हुसैनी
शुजात हुसैनी
 
 वैश्विक महामारी के कठिन दिनों के दौरान, नफरत के कुछ व्यापारी मीडिया चैनलों और मनगढ़ंत कहानियों की बाढ़ के माध्यम से सक्रिय हो गए, जिसने मानवता की कई आकर्षक छवियों को छिपा दिया। 
इन सच्चाइयों की एक झलक अधिक तेज़ी से प्राप्त करना महत्वपूर्ण है।

1) मुंबई की उच्च शिक्षित महिला, निकहत मोहम्मदी
, लॉकडाउन के दौरान एक  100,000  लोगों को खाना खिला रही है। वह चाहती है कि इस कठिन समय में कोई भी भूखा न रहे। और वे अपनी पहुँच को पाँच मिलियन तक विस्तारित करना चाहते हैं। सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए, यहां केवल शाकाहारी भोजन तैयार किया जाता है। (ईटीवी इंडिया की रिपोर्ट)

2) हैदराबाद में जमात-ए-इस्लामी हिंद और उससे जुड़े संगठनों ने लॉकडाउन के दौरान सभी चिकित्सा और प्रबंधन सिद्धांतों का पालन किया, अथक सर्वेक्षण के माध्यम से घरों में जा के ज़रुरतमंद लोगों की पहचान की, और इस तरह से एक महीने का राशन दिया  इस मिशन को मुनीरुद्दीन और उनकी टीम ने पुरा किया है, जो अब तक देड़ करोड़  से अधिक का स्रोत रहा है।
3) मुंबई के सलेम कोडिया धर्म और राष्ट्र के 11,000 लोगों का  समर्थन कर रहे हैं। (Maeeshat.in - 7 अप्रैल

4) दिल्ली में जमात-ए-इस्लामी हिंद स्वयंसेवक दंगा राहत कार्य के साथ-साथ लॉकडाउन रिलीफ डबल ड्यूटी में है. दस दिनों में 21 हजार  लोगों को खाना दीया।

5) जमात-ए-इस्लामी हिंद अपने व्यापक नेटवर्क के माध्यम से 250 शहरों में महाराष्ट्र राज्य कार्य कर रहा है और कई परिवारों का समर्थन किया है। (लोकमत समचार - har अप्रैल)

6) कोलार के तजममुल और मुज़ममील औसत घराने से हैं। इस कठिन समय में लोगों की असहायता उनके द्वारा देखी नहीं गई और उन्होंने अपनी जमीन २५ लाख रुपये में बेच दी और 2000 का अनाज का बिना पक्षपात धर्म भेद एक महिने का राशन दिया। (दैनिक सलार - 13 अप्रैल)

7) तालाबंदी के दौरान, जब कोई भी आनंद विहार, बुलंद शहर, गाँव के बड़े बुज़ुग रविशंकर  कि  अर्थी महमूद साहब और उनके लड़कों  ने अंतिम संस्कार किया। (द वायर - 29 मार्च)। 

इसी तरह की एक घटना बांद्रा में हुई जहां प्रेम चंद्र महावीर का अंतिम संस्कार  यूसुफ सिद्दीकी शेख और उनके दोस्तों द्वारा कीया गया 
 (डेक्कन हेराल्ड, मुंबई - 9 अप्रैल)

8) नागपुर के आसिफ शेख ने एक कम लागत वाली सैनिटाइजिंग मशीन विकसित की और प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को उत्कृष्ट राहत प्रदान की। (TNN-Nagpur रिपोर्ट)

 मंदसौर के नाहावर खान ने कुछ अनोखा किया और अस्पताल को एक मूल्यवान उपहार दिया। जिस पर एक राष्ट्रीय चैनल द्वारा एक विस्तृत प्रशंसा रिपोर्ट प्रसारित की गई और इसे एक अद्भुत आविष्कार कहा गया। (एबीपी न्यूज)

9) अज़ीम हाशिम प्रेम जी कोरोना संकट से निपटने के लिए दान में कुल 1125 करोड़ रुपये के दान देने वाला दूसरा सबसे बड़ा नाम है।

 10) इस राष्ट्रीय संकट में दवा के मोर्चे पर देश को यूसुफ हमीद और उनकी दवा कंपनी की ससती दवाएं कोरोना संघर्ष से जुड़ी हैं, जिन्होंने पिछले संक्रामक रोगों और अन्य घातक बीमारियों के लिए प्रभावी और सस्ती दवाओं के साथ देश को योगदान दिया है। (टाइम्स ऑफ इंडिया - 21 मार्च)

11) बैंगलोर में ग्लोबल स्कूल के रियाद सर, अब्दुल रहीम सर और अन्य शिक्षक अपने सीमित आयात के साथ  बंद के दौरान 2,000 लोगों को लंगर चला रहे हैं। (न्यूज 18 की रिपोर्ट)

12) इस संकट में सबसे योग्य लोगों की पहचान करना एक मुश्किल काम है। सबसे बड़ी चुनौती कई आत्मनिर्भर लॉजिस्टिक सुविधाओं की पहुंच है। इस कार्य को असहर फरहान (मुख्य निर्माता) और हैदराबाद के श्रीधर ने सुगम बनाया। उनकी वेबसाइट चुपचाप दाताओं और ज़रुरतमंद को जोड़ रही है, और सेवा मुफ्त है। (तेलंगाना टुडे - 14 अप्रैल)

13) ब्रिटेन में अब तक कोरोना वायरस पीड़ितों का इलाज करते हुए सभी 8 डॉक्टरों की मृत्यु हो गई। इन आठ दुखद शहीदों में निम्नलिखित पांच नाम शामिल हैं:
डॉ। हबीब जैदी,
डा अरिमा नसरीन, 
डॉ। अल्फा साद,
 डॉ। अमजद अल-हवरिन, और
 डॉ। आदिल
दुनिया इन गरीबों की कायल है। (मॉर्निंग क्रॉनिकल - 13 अप्रैल)

14) डॉ। आसिफ चौधरी और डॉ शिरीन रोहानी की शादी 21 मार्च को संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी। न्यूयॉर्क में, मानवता की लालसा उनके द्वारा देखी नहीं गई थी। शादी से 12 घंटे में ही वे सेवा के लिए एक जुनून के साथ अस्पताल लौटे थे। और 22 मार्च को, डॉ शिरीन अस्पताल से घर नहीं लौटे, अपने मालिक से जा मिले। (मॉर्निंग क्रॉनिकल - 13 अप्रैल)
ये केवल कुछ झलकिया हैं। बहुत सारे ऐसे नायाब सच हैं जिनके बारे में नफरत की खुशबू बह रही है। समय के साथ, अगले कुछ महीनों में, हजारों अधिक मानव-मानवता चित्र अंततः सामने आएंगे, जो अंततः मौन को जन्म देगा।

नोट:
यह सूची आपके समर्थन से और अपडेट की जा सकती है। यदि कोई ऐसी अनोखी घटना आपके अध्ययन से गुजरती है, तो कृपया उसे शेअर करें।
 स्थानीय अखबार मे ज़रुर दें...
😢

Thursday, 9 April 2020

CAA અને NPR દ્વારા આવનારા વર્ષ 2020 થી 2024 સુધી

*ખાસ વાંચજો* *મોદી સરકાર તાજેતરમાં લાવેલા NRC, 
CAA અને NPR દ્વારા આવનારા વર્ષ 2020 થી 2024 સુધી 
માં બહુજનો (એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા શીખ,બૌધ,ઈસાઈ ધર્મના પછાત વર્ગના લોકો તથા મુસ્લિમ સમાજના લોકો)* માટે
કયુ ષડયંત્ર રચ્યું છે*
તેની સંપૂર્ણ માહિતી અહીં આપી છે..


સોપ્રથમ સમજીએ
2019 ના સુધારેલા NRC, CAA અને NPR શું છે તથા ડિટેન્શન સેન્ટર શું છે અને તેમાં શું થવાનું છે તથા ઘૂસણખોરો એટલે શું ...???

ચાલો આજે જાણીએ આના વિશે....

*NRC* = ભારતીય નાગરિકોનું નોંધણીપત્રક

નવા સુધારા પ્રમાણે ભારતના દરેક વ્યક્તિએ શહેરી કે ગ્રામ્ય કક્ષાએ લાઈનોમા ઊભા રહીને પોતાના પરિવાર તથા 1971 પહેલાંના પોતાના બાપ દાદાઓના ભારતમાં જન્મેલા હોય એવા જન્મના પ્રમાણપત્રના પૂરાવાઓ અને તેઓ ભારતના નાગરિક હતા એના પૂરાવાઓ રજૂ કરવાના

જે લોકો આ પૂરાવાઓ રજૂ કરી શકે તે ભારતીય નાગરિક છે એમ સાબિત થશે

અને જે લોકો આ પૂરાવાઓ રજૂ ના કરી શકે અથવા જેમના પૂરાવાઓમાં સ્પેલિંગની પણ ભૂલ જણાશે તો તે વ્યક્તિ તે જ સમયથી જ ભારતીય નાગરિક નથી
તેની ભારતીય નાગરિકતા રદ થઈ જશે અને તેને ઘૂસણખોર(ગેરકાયદેસર ભારત માં ઘૂસીને ભારતમાં રહેનાર બહારનો વ્યક્તિ) જાહેર કરી તેને ડિટેન્શન સેન્ટર એટલે અલગ જ પ્રકારની જેલ તેમાં મોકલી આપવામાં આવશે

આવા લોકો ફકત એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા મુસ્લિમ, શીખ સમુદાય માં છે
અને
આ NRC થી સૌથી વધુ નુકસાન આ લોકોને છે

એટલા માટે જ અત્યારે દેશના દરેક રાજ્યોમાં આ NRC રૂપી કાળા કાયદાનો સખત અહીંસક વિરોધ રેલીઓ દ્વારા થઈ રહ્યો છે

પણ આ વિરોધ ને દબાવવામાં માટે RSS અને ભાજપ ના ગુંડાઓ આ રેલીઓમાં ઘૂસી જઇને પોલીસ પર પથ્થરમારો કરે છે અથવા વિરોધ કરવા વાળાઓને ભડકાવી
આ અહીંસક વિરોધને હિંસક બનાવાનો પ્રયત્ન કરી રહ્યાં છે
અને આ લોકોને કોઈપણ વાંકગુના વગર જેલમાં મોકલી એક ડરનો માહોલ પેદા કરવાનું કામ કરી રહ્યા છે

આવા નીચ કામોમાં આપણી પોલીસ, વહેંચાઈ ગયેલું મીડિયા, ન્યુઝ પેપર વાળાઓ અને ભારતીય ન્યાયતંત્ર તથા સંસદ (લોકસભા અને રાજ્યસભા), રાષ્ટ્રપતિ તથા ભારતની જલસેના, વાયુસેના અને થલસેના ના પ્રમુખ પણ સામેલ છે
જેના કારણે આખા દેશમાં થઈ રહેલા આ વિરોધ ને બીજી રીતે આપણા આગળ બતાવવામાં આવી રહયો છે અને આ કાળા કાયદાઓના વિરોધને દેશદ્રોહ બતાવામાં આવી રહયો છે

આ બધા જ ખાતાઓમાં 95% ભાજપ અને RSS ના સવર્ણો (બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય અને વાણીયા લોકો) છે

જેના કારણે આખા દેશમાં એક પછી એક બંધારણમાં સુધારાને નામે બંધારણ વિરોધી કાયદાઓ બનાવી બંધારણને ખતમ કરવાનું કામ કરી રહયા છે અને આ સવર્ણોની તાનાશાહી (હિટલર શાહી) ચાલી રહી છે

*CAA* =નાગરિકતા સંશોધન કાયદો

આ કાયદામાં એવો ઉલ્લેખ છે કે આ કાયદા દ્વારા આપણા 3 પાડોશી મુસ્લિમ દેશો પાકિસ્તાન, બાંગ્લાદેશ, અફઘાનિસ્તાન માં પિડાતા અલ્પસંખ્યક લોકોને ધર્મ ને આધારે ભારતીય નાગરિકતા આપવી

આ શરણાર્થીઓ પૈકી ફકત
હિંદુ, બૌદ્ધ, ખ્રિસ્તી , જૈન, શીખ ધર્મના હશે એને જ ભારતીય નાગરિકતા મળશે 

પણ આ રીતે જો કોઈ મુસ્લિમ લોકો પિડાતા હોય તો તેને ભારતીય નાગરિકતા ના મળે

(ખરેખર જોઈએ તો ભારતના પાડોશી દેશો ની સંખ્યા 7 છે તો પછી આ કાયદામાં ફક્ત 3 જ દેશો કેમ લીધા..?

અને એ પણ મુસ્લિમ દેશો જ કેમ નક્કી કર્યા..?

એના પાછળ ભારત દેશના નિર્દોષ મુસ્લિમો અને ભારતના એસ.સી, એસ.ટી અને ઓબીસી ના લોકોની નાગરિકતા ની ચકાસણી કરવાને નામે આપણા બહુજનો ને બંધારણીય પાયાના અધિકારોથી હંમેશા માટે વંચિત કરી નાખવાનું બહુ મોટું કાવતરું છે)

આ નાગરિકતા મેળવવા માટે એક ફોર્મ ભરવું પડશે જેના આધારે ભારતની બહારના લોકોને ભારતની નાગરિકતા મળશે. 
પણ મુસ્લિમ લોકોને આ ફોર્મ દ્વારા ભારતીય નાગરિકતા મળશે નહીં.

એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા મુસ્લિમો અને ખ્રિસ્તી અને શીખ ધર્મ ના પછાત વર્ગના લોકો
ભારતના મૂળનિવાસીઓ છે  બંધારણ ને આધારે મળેલા આરક્ષણ, એસ. સી /એસ.ટી એકટ(એટ્રોસીટી કાયદો), વોટીંગનો, સંપતિ રાખવાનો એવા ઘણા બધા કાયદાકીય અધિકારો છે

જેનાથી સવર્ણોને પહેલા થી પ્રોબ્લેમ છે
અને તેઓ પહેલાથી જ આ અધિકારોના વિરોધી છે

આપણને મળેલા આ બધા જ અધિકારો ફકત ને ફકત SC ST OBC ને આધારે મળે છે ના કે હિંદુ ને આધારે

જો નાગરિકતાના ડોક્યુમેન્ટ કે જાતિના ડોક્યુમેન્ટ માં જો
SC ST OBC ને કાઢીને તેની જગ્યાએ ફકત હિંદુ, મુસ્લિમ, શીખ, બૌધ, ઈસાઈ કરી નાખવામાં આવે તો આપણને  બંધારણને આધારે મળેલા બધા જ અધિકારો એક ઝટકા માં જ છીનવાઈ જાય...!!! 

અને જો આમ થાય તો પછી એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તો ફકત હિન્દુ જ બનીને રહી જાય અને અધિકારવિહીન થઈ જાય તથા બીજા ધર્મો ના લોકો પણ અધિકારો વગરના ગુલામ (બ્રાહ્મણવાદી મનુંસ્મૃતીના શૂદ્રો બનીને રહી જાય)
આમ આ રીતે ભારતમાં હિન્દું રાષ્ટ્ર નું નિર્માણ થાય

અને આખા ભારતમાંથી બાબા સાહેબ આંબેડકર નું બંધારણ સંપૂર્ણ પણે નષ્ટ થઈ જાય

અને આ મનુવાદી (બ્રાહ્મણવાદી) સવર્ણો બાબા સાહેબ આંબેડકર ના બનાવેલા બંધારણ ની જગ્યાએ RSS, ભાજપ ના સહકારથી એક જ સાથે આખા દેશમાં મનુંસ્મૃતીને બંધારણ તરીકે લાગું કરી નાખે. આ રીતે બાહ્મણવાદી શાસન ની દેશમાં શરૂઆત થઈ જાય 

જેમાં ફકત બાહ્મણો જ સત્તા પર રહે
અને આખા દેશમાં ફક્ત બાહ્મણો, ક્ષત્રિયો,વૈશ્યો(વાણીયાઓ) અને શૂદ્રો (બહુજનો એટલે એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા મુસ્લિમ,શીખ, બૌધ, ઈસાઈ ધર્મના પછાત વર્ગના લોકો નો સમાવેશ થાય)
અસ્તિત્વમાં આવે.. 

આમ ભારતમાં ફરી થી ગુલામીની શરૂઆત થઈ જાય

પણ ખરેખર CAA લાવવા પાછળનું મુખ્ય કારણ
આ રીતે ભારત થી બહારના લોકો ને ભારતીય નાગરિકતાના બહાને

એક અધિકારવિહીન નાગરિકતા આપવાનું છે

અને
NRC દ્વારા આ દેશ ના હોવા છતાં ઘૂસણખોર જાહેર થયેલા લોકોમાંથી આ દેશના મુસ્લિમો આ CAA નામના કાળા કાયદા થી ભારતીય નાગરિકતાનું ફોર્મ ના ભરી શકવાને કારણે ફરીથી ભારતીય નાગરિક નહીં બની શકે એટલે ભારતના મુસ્લિમો હંમેશા જેલમાં ગુલામનું જીવન જીવશે

રહ્યા આપણા 
એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા શીખ, બૌધ, ઈસાઈ ધર્મ ના પછાત વર્ગના લોકોને અધિકારવિહીન નાગરિકતા આપશે
અને હિન્દું રાષ્ટ્રનું નિર્માણ કરશે. 

એટલા માટે જ અત્યારે દેશના દરેક રાજ્યોમાં આ NRC/CAA રૂપી કાળા કાયદાનો સખત અહીંસક વિરોધ રેલીઓ દ્વારા થઈ રહ્યો છે

આટલા વ્યાપક વિરોધ ને જોતા  હવે સરકારને પણ લાગી રહ્યું છે કે હવે અમે ડાયરેક્ટ આ NRC / CAA કાળો કાયદો લાગું નહીં કરી શકીએ 

તો હવે સરકારે એક નવું પેતરું શોધી કાઢયું છે જેનું નામ 
NPR છે
જે કામ પહેલાં NRC/CAA દ્વારા કરવાનું હતું એ જ કામ હવે NPR દ્વારા થશે

આ NPR એ NRIC મતલબ NRC પ્રક્રિયાની શરૂઆતનું જ પ્રથમ પગથિયું છે 
જે આગળ જતાં NRC તરીકે ઓળખાશે

*NPR* = રાષ્ટ્રીય વસ્તી ગણતરી રેકોર્ડ

તાજેતરમાં વસ્તી ગણતરી કાર્યક્રમ મા પણ નવા સુધારા થયા છે
2010 માં જે વસ્તી ગણતરી વસ્તી ગણતરી થઈ હતી એ વખત ના નિયમો થી બિલકુલ નવા નિયમો

પહેલાં આપણે ઘરે વસ્તી ગણતરી માટે આવેલા અધિકારીને સામાન્ય માહિતી આપતાં હતાં
જેની જગ્યાએ હવે આપણે લોકોએ 20 માહિતી ઘરે આવેલા અધિકારીને આપવી પડશે

જેમાં નવી ઉમેરાયેલ માહિતી આ મુજબ છે

*તમારા દાદાનું પુરૂનામ, સરનામું, જન્મતારીખ
*તમારી દાદીનું પુરૂનામ, સરનામું, જન્મતારીખ
*તમારી રાષ્ટ્રીયતા મતલબ તમે ભારતીય છો કે નહીં તે
*તમારું હાલનું અને કાયમી સરનામું
*તમારો મોબાઇલ નંબર
*તમારો આધારકાડૅ નંબર
*તમારો પાનકાડૅ નંબર
*તમારો પાસપોર્ટ નંબર
*તમારો ધર્મ

જેવા વાહિયાત અને બેબુનિયાદ સવાલો
કરવામાં આવશે

જેની તમારે સાચી માહિતી આપવી જ પડશે અને જો તમે આ માહિતીમાંથી અમુક માહિતી નહીં આપી શકો તો એના આધારે એ અધિકારી તમે ભારતીય નાગરિક છો કે નહીં તે એના રેકોર્ડ માં નોંધણી કરશે

જેના આધારે દરેકે દરેક ઘરનાં વ્યક્તિની વસ્તી ગણતરી કરવામાં આવશે 

આ રીતે સરકાર પોતાના કાળા કાયદા (NRC/CAA) ના અમલનો ખોટો ઈરાદો NPR (નવા સુધારેલા વસ્તી ગણતરી ના ખોટા કાયદા મુજબ)
ના માધ્યમથી પાર પાડશે

આમ NRC / CAA  અને NPRમાં બંધારણ ની 14,15 અને 21 તથા અન્ય કલમો નું સરેઆમ ઉલ્લંઘન કર્યું છે

તો પણ આ ભાજપ સરકાર આ બંધારણ વિરોધી કાળા કાયદા આખા દેશમાં લાગું કરવા માટે તૈયાર છે

*ડિટેન્શન સેન્ટર* =

ડિટેન્શન સેન્ટર એટલે એક વિશિષ્ટ પ્રકારની જેલ
 (જેમાં એક 12 સેમી બાય 12 સેમી નો રૂમ જેમાં 600 માણસોને રાખવામાં આવશે અને તેમાં ફકત 3 સંડાસ/બાથરૂમ હશે અને જેમાં સવારે શાક રોટલી અને રાત્રે ફકત દાળ-ભાત મળશે
અને ત્યાં કોઈપણ જાતની બીજી સુવિધાઓ નહીં હોય તેવી જેની આપડે ક્યારેય સપના મા પણ કલ્પના ના કરી હોય એવી દદૅનાક જેલ. 

*ઘૂસણખોરો*=

ઘૂસણખોરો એટલે એવા લોકો કે જેમની પાસે ભારતીય નાગરિકતા નથી
અને જે ભારતની બહારના છે અને ગેરકાયદેસર રીતે ભારતમાં રહેતા હોય એવા લોકો. 

દરેક એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા અન્ય પછાત વર્ગના લોકો પોતાના મગજમાંથી એક ગેરસમજ જરૂર દૂર કરી નાખે કે મુસ્લિમો આપણા વિરોધીઓ છે આ વાત ખરેખર તદ્દન ખોટી છે

કારણ કે મુસ્લિમો પણ આ દેશના મુલનિવાસીઓ છે અને એમને પણ આપણા સાથે મળીને આઝાદીની લડત લડી હતી

બીજી વાત મુસ્લિમો એ ક્યારેય આપણા આરક્ષણ નો વિરોધ નથી કર્યો પરંતુ હંમેશા આપણા આરક્ષણનો સપોર્ટ કર્યો છે

આરક્ષણ, એસ.સી/એસ.ટી કાયદા અને આપણા બંધારણ ના ખરેખર વિરોધીઓ તો આ સવણૉ(બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રિય અને વાણીયા છે) 

બ્રાહ્મણો એ પહેલાંથી જ એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી ના લોકોને ખોટી રીતે હિન્દુ જાહેર કરીને મુસ્લિમો ની સામે કરીને આપણા લોકો ને અને મુસ્લિમો ને અંદરોઅંદર લડાવ્યા છે જેથી આપણે ક્યારેય એક ના થઈ શકીએ અને તેમની મનુવાદી વિચારધારા અને તેમની ધમૅના નામની ગુલામીમાંથી બહાર નીકળી ના શકીએ 

તો હવે બધા વેરઝેર સાઈડમાં મુકીને
બધાં જ એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી તથા મુસ્લિમો એક થઈને એક મંચ પર ભેગા મળીને આ બાહ્મણવાદી ગુલામીમાંથી બહાર નીકળવા માટે આઝાદી ની લડત લડવા માટે તૈયાર થઈ જાવો

બીજી એક મુદ્દાની વાત
તાજેતરમાં બનેલો કાળો કાયદો  NRC/CAA (નાગરિકતા ધારો) અને 2019 નો NPR (2010 માં વસ્તી ગણતરી જેના આધારે કરવામાં આવતી હતી તેનાથી ટોટલ વિરુદ્ધ
તાજેતરમાં ડિસેમ્બર 2019 ના વસ્તી ગણતરી ના આ ગણતરીમાં કરવામાં પાયાના સુધારા કરવામાં આવેલા છે.
ટૂંકમાં સરકાર વસ્તી ગણતરી ના આ નવા સુધારાઓ દ્વારા જ વસ્તી ગણતરી ના આ પહેલાં પગથિયાં મારફતે જ NRC & CAA ના કાળા કાયદા ની શરૂઆત કરવા માગે છે)
ખરેખર આ કાયદો જેટલો એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી ના લોકો માટે ખતરનાક છે એટલો મુસ્લિમો માટે નથી
કેમકે મોટા ભાગના મુસ્લિમો પાસે તો તેમની નાગરિકતા ના પુરાવા છે જેની સામે આપણા
એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી ના 100% લોકો માંથી ફક્ત 20% લોકો પાસે જ પોતાની નાગરિકતા ના પુરાવા છે
એનો મતલબ આપણી 80% લોકો પાસે તો પુરાવા જ નથી

આ પુરાવાઓ ના હોવા પાછળનું સૌથી મોટું કારણ આપણાં એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી ના લોકો ની ગરીબી, શિક્ષણ નો અભાવ અને જમીન ના હોવી 
ગરીબી ના કારણે આપણા બાપ દાદાઓ 100% શિક્ષણ ના લઈ શક્યા જેથી 80 થી 90% આપણા પૂર્વજો અભણ હતા.
ગરીબી અને જમીનો ના હોવાથી આપણા પૂર્વજો જોડે પોતાની નાગરિકતા ના કોઈ પૂરાવા પણ નહીં હોય.. 

નાગરિકતા કાયદા 1955 માં ઘણી વખત સુધારા થયેલા છે પણ 10 ડિસેમ્બર 2019 ના રોજ નવા નાગરિકતાના સુધારા મુજબ (એટલે કે NRC મુજબ)
ભારત ના દરેક નાગરિકે શહેરી કે ગ્રામ્ય વિસ્તારોમાં નીચ ભાજપ સરકાર દ્વારા નક્કી કરેલી કચેરી એ લોકોએ લાઈન મા ઊભા રહીને 1971 પહેલાંના પોતાના અને પોતાના બાપ દાદાઓના પૂરાવાઓ રજૂ કરવા પડશે
અને જો કોઈ પણ વ્યક્તિ પોતાની નાગરિકતાના પુરાવાઓ ના રજૂ કરી શકે અથવા રજૂ કરેલા પૂરાવાઓ માં જો તપાસ કરનાર અધિકારી ને જરાય ભૂલ જણાય તો તેઓ તેવા દરેક વ્યક્તિની ગણતરી ભારતીય નાગરિક નથી એમ કરશે 
અને તેવા લોકોની ભારતીય નાગરિકતા એ જ સમયે ખતમ થઈ જશે અને એવા લોકોને ઘૂસણખોરો જાહેર કરવામાં આવશે અને પહેલા તેમને નાગરિકતા ને આધારે જે હકો અને અધિકારો મળેલા હતા એ બધા જ છીનવાઈ જશે (ભારતીય નાગરિકતાના નહિ રહે તો વોટ આપવાનો અધિકાર અને આપણી સંપત્તિ પર પણ આપણો કોઈ હક નહીં રહે ટૂંકમાં બંધારણ ને આધારે મળેલા બધા જ પ્રકારના અધિકારો છીનવાઈ જશે) તથા તે બધા જ લોકોની બધી જ સંપત્તિ આ નીચ ભાજપ સરકાર દ્વારા જપ્ત કરી લેવામાં આવશે અને એ લોકોની ધરપકડ કરી એમને હાલમાં જેને 
*ડિટેન્શન સેન્ટરમાં* 
મોકલી દેવામાં આવશે.

એકવાર શાંત મગજ થી વિચારો કે આ રીતે જ્યારે દરેકના ઘરોમાંથી 
નાગરિકતા સાબિત નહીં કરનાર માણસો (યુવાન, ઘરડાં, સ્ત્રીઓ, પુરૂષો તથા નાના મોટા  બાળકો એમ દરેક માણસોને) 
બળજબરીપૂવૅક જેલમાં ધકેલી દેવામાં આવશે ત્યારે શું પરીસ્થીતી થશે

એટલે દરે બહુજનો અમીર/ગરીબ, ઊંચનીંચ અને વેરઝેર ની ભાવનાઓ છોડીને એકથઈ જાઓ

મુસ્લિમો અને બહુજનો (એસ.સી, એસ.ટી,ઓબીસી સમાજ બધા લોકો) એક થઈ ઘરોમાંથી બહાર નીકળી રોડ પર આવીને આ કાળા કાયદા નો વિરોધ કરો. 

હજુ આ કાળા કાયદાઓ આખા દેશમાં લાગુ પડે અને આપણા બહુજન સમાજ ના લોકોને પોતાના હકો અને અધિકારોથી વંચિત થવું પડે એના પહેલાં જાગી જાઓ..

આપણે આપણા હકો અને અધિકારોની લડાઈ અને બંધારણ ની રક્ષા જાતે જાગૃત થઈ અને બીજા બહુજન સમાજના લોકો ને જાગૃત કરીને
બધાના સાથ સહકારથી લડવી પડશે..

નહિ તો એક વાત જરૂર યાદ રાખજો કે
👇👇👇
"" હવે કોઈ બાબા સાહેબ આંબેડકર નવો જન્મ લઈને આપણા બંધારણ અને આપણા હકો અને અધિકારોની લડાઈ લડવા ક્યારેય નહીં આવે.."" 
👆👆👆👆
(ઉપર જણાવેલ NRC/CAA અને NPR ની માહિતી 1000% સાચી છે જે બહુ જ મહેનત અને વિશ્ર્લેષણ ના આધારે તૈયાર કરેલી છે) 

બધાં જ બહુજનો એક થઈ આ NRC/CAA અને NPR નો ગુજરાત માં ઠેરઠેર ખુલ્લેઆમ અહીંસક વિરોધ કરો અને ગુજરાતમાં NRC/CAA અને NPR ના બંધારણ વિરોધી કાયદા નો અમલ થતાં રોકો.

હજું પણ આપણી જોડે સમય છે
ગુજરાત ના બહુજનો (એસ.સી, એસ.ટી અને ઓબીસી ના લોકો) જાગો નહિ તો તમારી ગુલામીના દિવસો દૂર નથી

આ મેસેજ ને તમારા દરેકે દરેક બહુજન (એસ.સી, એસ.ટી અને ઓબીસી ના લોકો) લોકો અને દરેકે દરેક જય ભીમ અને બંધારણ ને માનનારા ગ્રુપ અને લોકો સુધી પહોંચાડો જેથી ગુજરાત ના દરેક એસ.સી, એસ.ટી અને ઓબીસી ના લોકો ને આ કાળા કાયદાની સાચી માહિતી મળે અને લોકો ની આ કાળા કાયદા પ્રત્યે ની ગેરસમજ દૂર થાય
અને સરકારના કાળા કારનામા બહાર આવે

ક્રાંતિકારી જય ભીમ
જય ભારત 
નમો બુદ્ધાય

#उम्मत_ए_मुस्लिमा_की_तक़सीम_कब_तक?? Part 1


जंगे अज़ीम अव्वल (first world war) और जंगे अज़ीम दोम (second world war) के बाद अगर्चे की पूरी दुनिया, रंग, नस्ल, ज़बान और इलाके की बुनियाद पर तक़सीम कर दी गई थी, लेकिन वह मग़रिब ताकतें जिन्होंने फ़तह के बाद इस तक़सीम की बुनियाद रखी आज यूरोपीय यूनियन (EU) के नाम एक परचम, एक पार्लियामेंट और सबसे बढ़कर यह कि एक करेंसी "यूरो" की बुनियाद पर एक ईकाई की सूरत मुत्तहिद है...!

बाकी तमाम दुनिया के लिए ये अठाईस (28) मुमालिक एक ऐसा मुत्तहिद खित्ता है कि आप इस में शुमाली कोने फिनलैंड से दाख़िल हो और जुनूब में माल्टा पहुँच जाए, तो आप न कही रोके जाएगे और न ही आप को यह अहसास होने पाएगा कि आप किस दूसरे मुल्क़ में दाख़िल हो रहे है, शानदार मोटरों पर तेज़ रफ़्तार गाड़ियों में बैठे आप को अचानक साइड पर सड़क के ऊपर एक बोर्ड नज़र आएगा कि आप फ्राँस से बेल्जियम, या बेल्जियम से हॉलैंड  में दाख़िल हो रहे है, यहाँ तक कि अगर दो मुल्क़ों के दरमियान समन्दर भी हाईल हो तो एक मुल्क़ से आप ट्रेन में सवार हो साहिले समन्दर पर ट्रेन पूरी के पूरी एक बड़े से बहरी जहांज (Ship) में दाख़िल हो जाती है और आप समन्दर का सिना चीरते दूसरे मुल्क़ में पहुँच जाते है, ट्रेन जहांज से ख़ुश्की पर उतरती है और आप स्वीडन से जर्मनी या नॉर्वे, डेनमार्क पहुँच जाते है...!

यह तमाम अठाईस (28) मुमालिक एक-दूसरे को मुआशी (Economic) तौर पर इस तरह तहफ़्फ़ुज़ देते है कि पुर्तगाल और यूनान जैसे गरीब मुमालिक की करेंसी भी मज़बूत तरीन "यूरो" है, जर्मनी और फ्राँस जैसे अमीर मुल्क भी इस "यूरो" में कारोबार करते है...! 

लेकिन यूरोप ने अपने बड़े इत्तेहादी अमेरिका के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका के बर्रेआज़मो की एक नाहमवार और ज़मीनी हक़ाईक़ से मावरा तक़सीम करके ज़मीन के सीने पर जो लातादाद लकीरें खींची थी और जो मुल्क़ तख़लीक़ किए थे, आज इनमें नफ़रत के बीच बोकर और लड़ाईयों के ख़ारदार दरख़्त लगाकर इन्हें मुत्तहिद नही होते दिया जाता, असल मसअला यह है कि इन तमाम मुमालिक के वसाइल पर मग़रिबी मुमालिक के कॉरपोरेट कम्पनियों का क़ब्ज़ा है, तेल हो या मादनीयात, ज़रई पैदावार हो या समुन्द्रीय हयात सब के सब इन मल्टीनेशनल कम्पनियों के शिकंजे में है, अफ्रीका के तक़रीबन डेढ़ अरब आबादी और तीन करोड़ मुरब्बा किलोमीटर रकबे, 52 मुल्को में तक़सीम कर दिया गया।

वसाइल के एतबार से अमीर तरीन बर्रे आज़म अफ्रीका का हाल यह है कि मुमालिक की फ़हरिस्त में आख़री चौबीस गरीब मुमालिक का ताल्लुक़ अफ्रीका से है, यही हाल एशिया का किया गया, यानी साढ़े चार अरब की आबादी और एक करोड़ 72 लाख किलोमीटर रकबे को पचास मुमालिक में तक़सीम कर दिया गया, इस तक़सीम में शुमाली वियतनाम/जुनूबी वियतनाम और शुमाली कोरिया/जुनूबी कोरिया जैसी ख़ालिसतन जंगी सरहदें भी शामिल थी..!

लेकिन सबसे बदतरीन तक़सीम दो बर्रे आज़मो पर फैली उम्मत-ए-मुस्लिमा की गई... एक ऐसी उम्मत जो तेरह सौ सदियों से न सिर्फ मज़हबी बल्कि तहज़ीब व सकाफत और मरकज़ियत के हवाले से भी एक मुश्तरक विरसे पर क़ाबिज़ थी....इंसानी तारीख़ का सबसे बड़ा मोज्ज़ा यह है कि रसूल-ए-करीम ﷺ के ज़ेरे तरबियत सहाबा किराम رضي الله تعالى عنهما जिन खित्तों में इस्लाम का पैग़ाम लेकर पहुँचे इनकी तहज़ीब, सकाफत, कल्चर यहाँ तक कि इनकी मादरी ज़बान तक तब्दील हो गई। लीबिया, मिस्र, सूडान, शाम, ईराक़ और उरदन जैसे मुमालिक में कभी अरबी नही बोली जाती थी, लेकिन आज यह अरब दुनिया का हिस्सा है, यहाँ तक कि आज इनकी क़दीम ज़बानों के आसार तक ढूंढना मुश्किल है।

"उम्मत ए मुस्लिमा" की इस तक़सीम का आगाज़ जंगे अज़ीम अव्वल के बाद ही कर दिया था, इसकी दो बुनियाद वुजूहात थी, पहली और अहम तरीन बात यह थी कि गई गुज़री ही सही "ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया" मुसलमानों को एक मरकज़ियत फ़राहम करती थी और इसके ज़ेरे नगीन अफ्रीका और मशरिक़-ए-वुस्ता के वह मरकज़ी सरज़मी थी जहाँ पर क़ायम हुक़ूमत की वजह से ही तेरह सौ साल की तसलसुल के साथ उम्मत मुत्तहिद थी, दूसरी वजह यह थी कि दुनिया में तेल दरयाफ़्त हो चुका था और तमाम बुनियादी सर्वे यह ख़बर दे रहे थे कि #अल्लाह ने मुसलमानों की सरज़मीन को इस दौलत से मालामाल किया है..!

आप सिर्फ इस बात गौर करें कि बोस्निया से लेकर लीबिया तक कि ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया अगर तेल की दौलत भी इसकी मईशत (Economy) में शामिल हो जाती है तो आज वह दुनिया को अपने इशारों पर चला रही होती, यही वजह है कि इस उम्मत को इस तरह तक़सीम किया गया को जिसके पास जितना ज़्यादा तेल का ज़खीरा था, इसका इतना ही छोटा मुल्क बना दिया गया, क़तर, बहरीन, कुवैत, अबुधाबी, दुबई, मसक़त वगैरह इसकी मिसाल है। ईराक़, शाम, उरदन और लेबनॉन को ऐसे तक़सीम किया कि अगर कुर्दो से जंग ख़त्म हो तो शिया-सुन्नी लड़ाई हो जाए और अगर दोनों अमन से रहने लगे तो इस्राइल में यहूदियों को बैठा कर पूरे खित्ते को बदअमनी का शिकार और मुसलसल जंग में उलझा दिया गया।

आज इस तक़सीम को तक़रीबन एक सदी होने को आई है, क़ौमी रियासती अपने-अपने इलाकों में अपने-अपने मफ़ादात के किलों में कैद हो चुकी है, हर किसी का अपना मुल्क़ है जिसे वह "सबसे पहले" के नारे के साथ तहफ़्फ़ुज़ देता है, अगर इस खित्ते में इस्राइल न होता तो शायद यह मुल्क, अफ़वाज और दीग़र तनाज़ियात (Conflict) के बगैर ज़िन्दगी गुज़ार रहे होते, क्यूँकि जिस तरह दौलत की कसरत ने इन खानाबदोशो को ऐश की ज़िन्दगी अता की थी और वह सब इख्तिलाफ़ात फ़रामोश करके ऐसी ऐश-ओ-इशरत में ग़र्क़ रहने लगे है ऐसे में इन्हें गफ़लत की नींद से कौन जगा सकता था..!

लेकिन कौन जानता था की इस खित्ते को आख़री आलमी जंग के लिए तैयार किया जा रहा है जिसका एक फरीक़ (गिरोह) अपने लाव-लश्कर के साथ इस्राइल में आकर पड़ाव डाल चुका है और बाकी यहूदी आबादी भी इस आख़री मारके तक वापस लौटने के अज़्म से भरी हुई है, यही वजह है कि 9/11 के बाद अठ्ठारह साल से यह सरज़मीन कशमकश और जंग के शोलों से आतिश फ़िशा बन चुकी है....

जारी...Aadil Nizami

Wednesday, 8 April 2020

लॉक डाउन अभिशाप या वरदान:-क्या यह बिना तैयारी के किया गया लॉक डाउन नहीं है ?



24 मार्च को शाम जब 8 बजे प्रधानमंत्री जी हम सबसे रूबरू हुये और हमारी चिंता करते हुए अचानक 21 दिन के तालाबंदी लॉक डाउन की जब घोषणा कर दी तो क्या पहले सरकार ने यह नहीं सोचा था कि, 

● देश मे तमाम पर्यटन स्थलों, मंदिरों, दरगाहों, तीर्थों, और भारत भर में तमाम जगहों पर तीर्थ यात्री, पर्यटक, और अन्य जनता भी रात 12 बजे के बाद जहां है वहीं फंस जाएगी तो उनको वहां से निकलने की सरकार की कोई कार्ययोजना है भी या नहीं ? 

● ऐसे लोगों के पास सीमित धन होता है जो अनजान शहरों में होते हैं, अलग जगह, अलग भाषा आखिर ऐसे कठिन समय मे कैसे उन्हें उनके घर पहुंचाया जाएगा, जबकि यातायात के सारे साधन यकायक बंद हो गए हैं ? 

● बहुत से लोग छोटे छोटे शहरों से दिल्ली मुम्बई चेन्नई कोलकाता आदि बड़े शहरों में इलाज के लिये गए हैं। वहां उनके पास गंभीर रोग से पीड़ित मरीज हैं। उनको आसानी से घरों पर लाना भी आसान नहीं है। कभी मरीज जब गंभीर रोग से अस्पताल में हो तो उसके तीमारदार से मिल कर बात करे तो इस व्यथा का अंदाज़ा होगा आप को। कभी आप सबको ऐसी कठिन परिस्थिति में पड़ने का दुर्भाग्य न हो, यह मेरी प्रार्थना है। पर ऐसी स्थिति में सरकार के पास कोई कार्ययोजना थी या यह सब दिमाग मे ही नहीं यह निर्णय घोषित करते आया था ?

● सीमित पर्यटन वीसा पर भारत में आये विदेशी लोग, जो किसी भी कार्य से आये होंगे और जिनकी वीज़ा अवधि 25 मार्च के बाद खत्म हो रही है और जिन्हें यह पता ही नहीं था कि 25 से 21 दिनी लॉक डाउन शुरू हो जाएगा, और जब ऐसी स्थिति में सारे आवागमन बंद हो जाएंगे तो जब उनके वीसा की अवधि बीत जाएगी, जिसमे उनकी कोई गलती नहीं है तो वे अपने वीसा की अवधि को बढ़वाने के लिये क्या करेंगे ? क्या सरकार ने ऐसी परिस्थिति की कल्पना की थी और अगर की भी थी तो इससे निपटने के लिये कोई कार्ययोजना सरकार द्वारा बनाई गयी थी ? 

आप इस पर विचार करें और यह खुद सोंचे कि क्या इतना बड़ा निर्णय लेने के पहले जनता को क्या क्या कष्ट झेलना पड़ सकता है, यह सोचा गया था ? कोरोना का मामला 30 जनवरी को केरल में पहला मामला मिलने के समय से ही, चल रहा है। जबकि यह लॉक डाउन 22 मार्च को पहली बार और 24 मार्च की रात 12 बजे से अब तक चल रहा है। इतना समय किसी भी व्यवस्था के लिये कम नहीं होता है। हम किसी  राजतंत्र से शासित देश में, नहीं रह रहे हैं कि सम्राट ने ताली बजाई और कहा तखलिया और सब सिर झुका कर चले गए। 

देश के हर थाने मे होटल, सराय, धर्मशाला आदि की सूची होती है। वहां से यह सूची जिले स्तर पर एकत्र कर के उन सबको कहा जा सकता था कि घर जाओ लम्बा लॉक डाउन चलेगा। विदेशी पर्यटकों का विवरण इम्मीग्रेशन में होता है। विदेशी नागरिकों के आने आने रुकने की सूचना अनिवार्यतः होटल, धर्मशाला वालों को स्थानीय थानों में देनी पड़ती है। वहां से भी सारी सूचनाएं मिल सकती हैं। यह कवायद जब 22 मार्च का थाली ताली मार्का जनता कफ्यू लगा था, के पहले से ही क्यों नहीं शुरू कर दिया गया ? 

हमको और आप को यह भले ही पता न हो कि कब यह लॉक डाउन लगेगा और कब तक प्रभावी रहेगा, पर सरकार को तो यह बात पहले से ही पता होगी कि ऐसा निर्णय हो सकता है। तभी यह सब होमवर्क कर लिया जाना चाहिए था, जो नहीं किया गया। आखिर, चुनाव,  कुंभ मेले, अन्य बड़े अधिवेशन आदि की तैयारियां हम करते ही है। वे सब शानदार तरह से निपटते भी हैं। फिर इसमें बिना तैयारियों के, कैसे यह घोषणा 24 मार्च की रात में 12 बजे से 21 दिन का लॉक डाउन हो जाएगा, कर दी गई ?

यही कारण है कि सभी राज्य सरकारों के अधिकारी अब किसी तरह से यह सब सम्भाल रहे हैं। वे रातदिन सड़कों पर है। उनकी मेहनत में कोई कमी नही। लेकिन, इतने बड़े और पूरे देश को एक साथ बंद करने के पहले समस्त राज्यो के मुख्य सचिवों और डीजीपी साहबान की मीटिंग होनी चाहिए थी और एक एक सम्भावना पर विचार कर उसके समाधान की तैयारी कर लेनी चाहिए थी। न तो अफसरों की काबिलियत में कमी है और न ही किसी के इरादे में कोई  खोट है, बस एक एडवांस प्लानिंग की ज़रूरत थी, जहां सरकार चूक गयी । 
आज लॉक डाउन का 15 वा दिन है,अमेरिका और ब्रिटेन जैसे समृध्द देश जिनकी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है लंबे लॉक डाउन को सहने की ताकत रखते है परंतु हमारे देश की अर्थव्यवस्था जो पहले ही बहोत कमज़ोर स्तिथि में थी वह लंबे लॉक डाउन के सहने की स्थिति में नही है,भले ही हमारे लिए एक तरफ कुवा हो एक तरफ खाई हो पर हमारी अर्थव्यवस्था 21 दिन से लंबे लॉक डाउन को सहने की स्थिति में नही है,क्यूंकि  इससे जो व्यपार की स्तिथि बिगड़ेगी और जो बेरोज़गारी,भुखमरी और अपराध बढेगे उसे हमारी सरकारें कभी नही संभाल पाएगी और देश 50 साल पीछे चला जायेगा।उदयोग नही संभाल पाएंगे,क्यूंकि जो श्रमिक इस लॉक डाउन के भगदड़ में अपने गाँव लौट गए है वो इस वातावरण में अभी लौटना नामुमकिन है।
अतः सरकार से यही निवेदन है की वो उपरोक्त बातों पर विचार करते हुए 15 अप्रैल से लॉक डाउन को समाप्त करने पर गंभीरतापूर्वक विचार करे।

Monday, 6 April 2020

lockdown part -1

PM ने कहा ,लड़ाई लंबी है ..मतलब लॉक डाउन भी लंबा हे ..अगर सिर्फ21 दिन का होता तो ये कहते 10 ही दिन की बात है ..
 दोस्तों,बहोत हुआ मज़ाक ..कुछ ज़रूरी बातें आपको बताती चलु..
1_ MOST IMPOTANT ..फ़िज़ूल खर्ची बिलकुल,बिल्कूल ना करे ,चाहे आपके अकाउंट में लाखों रूपये क्यों ना हो,कैश की प्रॉब्लम हुई तो वो लाखो रूपये कोई काम के नही ..
2_  प्रशाशन पर भरोसा ना करे,सामने रमजान हे आपकी जितनी कैपेसिटी हे राशन भरवा ले ..अचानक ये लोग कोई भी फैसला ले लेते है 
3_ मिल्क पाउडर का स्टॉक रखे
4_ दवाइयों का स्टॉक रखे जो रेगुलर लेते हो,बीपी, सुगर,थायरॉइड etc
5_ खाना बिलकुल वेस्ट ना करें ,बिलकुल भी नही ..
 लंच का बचा है तो डिनर में यूज़ कर ले .. रोटियां बची है तो चाय के साथ तल के खा ले 
चावल ज्यादा बचे हे तो पुलाव बना ले .
6- दही के बड़े पैकेट्स भी स्टॉक में रख सकते हे
7_ बच्चों की पॉकेट मनी पर लगाम लगाये,उनको बुरे वक़्त के बारे में बताये .. लड़ने की हिम्मत दे उन्हें ,"तुम स्ट्रांग हो..,समझदार हो .." ऐसे लफ़्ज़ों से उन्हें स्ट्रांग बनाये ..
 8_ जहा ज़रूरत है वही खर्च करें (नाश्ता ,फ्रूट्स,स्नैक्स पर रोक लगाए)
9_ सिंपल खाना खाएं (वक़्त बदलेगा तो खा लेना)
10_ अपने गरीब रिश्तेदार और पड़ोसियों का खास ख्याल रखे ..
11_ घर में 1st aid किट की दवाइयां ज़रूर रखे ,जैसे बुखार,जुखाम,टॉयलेट,उल्टियां,pain किलर ,iodex ,sofromycin , 
12 _ अंडों का स्टॉक करे,और फ्रिज में ही रखें .
 And last but not least.अल्लाह से नमाज़ों के बाद और चलते फिरते दुआ मांगते रहे ।
 अल्लाह हम सब की इस मुश्किल घड़ी में जल्दी छुटकारा दे ।

#Nusrat की छोटी सी कोशिश ..आपके माइंड में कुछ suggestion हो तो msg करें

7/11 मुंबई विस्फोट: यदि सभी 12 निर्दोष थे, तो दोषी कौन ❓

सैयद नदीम द्वारा . 11 जुलाई, 2006 को, सिर्फ़ 11 भयावह मिनटों में, मुंबई तहस-नहस हो गई। शाम 6:24 से 6:36 बजे के बीच लोकल ट्रेनों ...